बोरा चट्टी के स्कूल से ब्रिटिश पार्लियामेंट तक का सफर, राजमिस्त्री के बेटे ने रच दिया इतिहास
कभी घर में इतनी गरीबी थी कि दो वक्त की रोटी भी सोच-समझकर जुटानी पड़ती थी। पिता राजमिस्त्री का काम करते थे। ईंट, गारा और सीमेंट से दूसरों के घर खड़े करने वाले उस पिता के मन में एक सपना जरूर था बेटा ऐसा कुछ करे कि दुनिया उसे उसके नाम से पहचाने।

कभी घर में इतनी गरीबी थी कि दो वक्त की रोटी भी सोच-समझकर जुटानी पड़ती थी। पिता राजमिस्त्री का काम करते थे। ईंट, गारा और सीमेंट से दूसरों के घर खड़े करने वाले उस पिता के मन में एक सपना जरूर था बेटा ऐसा कुछ करे कि दुनिया उसे उसके नाम से पहचाने। बेटा भी शायद पिता की हथेलियों पर पड़े मेहनत के निशान पढ़ता था और मन ही मन तय कर चुका था कि जिंदगी चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हो, वह अपनी पहचान खुद बनाएगा। यह कहानी है बिहार के भोजपुर जिले के आरा के बेगमपुरा मोहल्ले से निकलकर दुनिया के मंच तक पहुंचने वाले डॉ. रजनीश कांत की।
रजनीश कांत ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद फिजियोथेरेपी की पढ़ाई की
गरीबी, अभाव और संघर्ष के बीच बोरा चट्टी वाले स्कूल से पढ़ाई शुरू करने वाले रजनीश कांत ने शायद उस समय सपने में भी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उनका नाम ब्रिटिश पार्लियामेंट में सम्मान के साथ लिया जाएगा। लेकिन सपने वही सच होते हैं, जिनके लिए इंसान अपनी पूरी जिंदगी लगा देता है। रजनीश कांत ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद फिजियोथेरेपी की पढ़ाई की। आगे फिजियोथेरेपी में पीएचडी की उपाधि हासिल की। इसके बाद कनाडा में ऑस्टियोपैथी की विशेष शिक्षा और स्वीडन में कायरोप्रैक्टिक की एडवांस ट्रेनिंग ली। पेल्विस मास्टरक्लास समेत कई अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण और प्रमाणपत्र उनके पेशेवर सफर का हिस्सा बने। आज वे फिजियोथेरेपी, ऑस्टियोपैथी और कायरोप्रैक्टिक की मैनुअल थेरेपी के जरिए मरीजों को राहत देने का काम करते हैं। उनका काम मुख्य रूप से शरीर की संरचना, मांसपेशियों और रीढ़ की कार्यप्रणाली से जुड़ी मैनुअल तकनीकों पर आधारित है। सर्वाइकल, कमर दर्द, सायटिका और स्पाइन से जुड़ी परेशानियों को लेकर बड़ी संख्या में लोग उनसे संपर्क करते हैं।
रजनीश कांत की कहानी सिर्फ महंगी फीस और सेलिब्रिटी मरीजों की कहानी नहीं है
पटना के बेउर जेल रोड, कुशवाहा चौक के समीप स्थित Back To Nature Spine Clinic से लेकर मुंबई तक उनका काम पहुंच चुका है। एक सेशन की फीस 30 हजार रुपये तक होने के कारण उनके उपचार को लेकर सवाल भी उठते हैं, लेकिन यह भी उनकी कार्यशैली का हिस्सा है कि वे सीमित समय में सीमित मरीजों को ही देखते हैं, क्योंकि उनका उपचार पूरी तरह हाथों से की जाने वाली शारीरिक मेहनत पर आधारित है। लेकिन रजनीश कांत की कहानी सिर्फ महंगी फीस और सेलिब्रिटी मरीजों की कहानी नहीं है। उनकी कहानी का सबसे भावुक अध्याय वहां शुरू होता है, जहां पैसा खत्म हो जाता है और इंसानियत सामने आती है। हर महीने की पहली तारीख को पटना में बड़ी संख्या में जरूरतमंद मरीजों के लिए निःशुल्क चिकित्सा सेवा आयोजित की जाती है। गरीब मरीजों के लिए प्रतिदिन विशेष समय निकालकर मुफ्त सेवा देने का दावा भी उनके सेवा अभियान का हिस्सा है। सेरेब्रल पाल्सी और विशेष जरूरत वाले बच्चों के लिए लंबे समय तक निःशुल्क उपचार उपलब्ध कराने की पहल भी की जाती है। स्वास्थ्य जागरूकता शिविरों के जरिए सेना के जवानों, गरीबों और जरूरतमंद लोगों तक पहुंचने की कोशिश की जाती है।
रजनीश अबतक करीब 50 हजार मरीज उनसे उपचार ले चुके हैं
बताया जाता है कि अबतक करीब 50 हजार मरीज उनसे उपचार ले चुके हैं, जिनमें बड़ी संख्या ऐसे मरीजों की है, जिनका निःशुल्क उपचार किया गया। एक तरफ उनके पास देश के जाने-माने चेहरे उपचार के लिए पहुंचे, तो दूसरी तरफ उसी क्लिनिक में वह गरीब भी पहुंचा जिसके पास इलाज के पैसे नहीं थे। यही विरोधाभास शायद डॉ. रजनीश कांत की असली कहानी है। उनसे इलाज कराने वाले चर्चित लोगों में बॉलीवुड के कलाकारों और फिल्म जगत की हस्तियों के साथ बिहार के राजनीतिक और सामाजिक जीवन से जुड़े कई नाम भी बताए जाते हैं। लेकिन शायद रजनीश कांत के लिए सबसे बड़ा सम्मान किसी सेलिब्रिटी का उनके पास आना नहीं, बल्कि उस गरीब मरीज की आंखों में राहत देखना है जो इलाज के बाद दर्द से मुक्त होकर घर लौटता है।

उनकी उपलब्धियों को लेकर कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी उनके खाते में दर्ज हैं
आपको बता दें कि उनकी उपलब्धियों को लेकर कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी उनके खाते में दर्ज हैं। 29 जून 2024 को दुबई में एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स से सम्मान और 18 जुलाई 2024 को ब्रिटिश पार्लियामेंट में वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स, लंदन से सम्मान मिलना उनके सफर की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है। जिस बच्चे ने गरीबी देखी, जिसने राजमिस्त्री पिता की मेहनत देखी, जिसने अभाव में पढ़ाई की, उसी बच्चे ने आगे चलकर अपने नाम के साथ अंतरराष्ट्रीय पहचान जोड़ ली। यही जिंदगी की सबसे खूबसूरत तस्वीर है।
आज सोशल मीडिया के दौर में किसी व्यक्ति के बारे में कुछ भी लिख देना बेहद आसान है
आज सोशल मीडिया के दौर में किसी व्यक्ति के बारे में कुछ भी लिख देना बेहद आसान है। किसी को महान बना देना भी आसान है और किसी पर गंभीर आरोप लगा देना भी। लेकिन किसी व्यक्ति को लेकर फैसला सुनाने से पहले उसके पूरे सफर को देखना जरूरी है। डॉ. रजनीश कांत को लेकर सोशल मीडिया पर 'झोलाछाप' जैसे शब्दों के इस्तेमाल ने बहस जरूर खड़ी की है। ऐसे किसी भी आरोप की सच्चाई का फैसला तथ्यों, प्रमाणित शैक्षणिक योग्यता, पेशेवर प्रशिक्षण और संबंधित नियामकीय मानकों की जांच के आधार पर ही होना चाहिए। किसी वायरल वीडियो या सोशल मीडिया पोस्ट को अंतिम सत्य मान लेना पत्रकारिता नहीं हो सकता। क्योंकि हर चेहरे के पीछे एक कहानी होती है।
रजनीश कांत की कहानी में गरीबी है, पिता के पसीने की खुशबू है, भूख है, संघर्ष है, छोटे से स्कूल की यादें हैं
रजनीश कांत की कहानी में गरीबी है, पिता के पसीने की खुशबू है, भूख है, संघर्ष है, छोटे से स्कूल की यादें हैं, बड़े सपने हैं और उन सपनों को पूरा करने के लिए वर्षों की मेहनत है। राजमिस्त्री का बेटा जब दुनिया के बड़े मंच पर सम्मानित होता है तो सिर्फ एक व्यक्ति सम्मानित नहीं होता उस पिता का संघर्ष सम्मानित होता है जिसने धूप में खड़े होकर ईंटें ढोईं, उस मां की दुआएं सम्मानित होती हैं जिसने अभाव में भी बेटे के सपनों को मरने नहीं दिया और उस छोटे से बच्चे का हौसला सम्मानित होता है जिसने शायद एक दिन तय कर लिया था कि उसकी पहचान उसकी गरीबी नहीं, उसकी मेहनत होगी। बोरा चट्टी के स्कूल से ब्रिटिश पार्लियामेंट तक का यह सफर सिर्फ डॉ. रजनीश कांत की कहानी नहीं, बल्कि बिहार की उस मिट्टी की कहानी है जो अभाव में भी ऐसे सपने पैदा करती है जिन्हें दुनिया सलाम करती है।
पटना से अनूप नारायण सिंह की रिपोर्ट











