यौन अपराध मामलों पर HC की सख्ती, पीड़ितों की सुरक्षा और त्वरित न्याय के लिए 19 अनिवार्य दिशानिर्देश जारी

यौन अपराध मामलों पर HC की सख्ती, पीड़ितों की सुरक्षा और त्वरित न्याय के लिए 19 अनिवार्य दिशानिर्देश जारी

यौन अपराध मामलों पर HC की सख्ती, पीड़ितों की सुरक्षा और त्वरित न्याय के लिए 19 अनिवार्य दिशानिर्देश जारी
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By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
: Jun 09, 2026, 3:43:00 PM

 झारखंड उच्च न्यायालय ने महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में जांच, न्यायिक प्रक्रिया और पीड़ितों के पुनर्वास को अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से राज्य प्रशासन, पुलिस विभाग और संबंधित एजेंसियों के लिए 19 महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि इन निर्देशों का तत्काल अनुपालन सुनिश्चित किया जाए और किसी भी स्तर पर लापरवाही सामने आने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी।

मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने कहा कि यौन हिंसा और पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में संवेदनशीलता, त्वरित कार्रवाई और पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। अदालत ने संकेत दिया कि निर्देशों की अवहेलना करने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ आपराधिक कार्रवाई भी की जा सकती है।

शिकायत दर्ज करने में देरी नहीं

खंडपीठ ने निर्देश दिया कि यौन अपराध से संबंधित किसी भी शिकायत को क्षेत्राधिकार के आधार पर टालने के बजाय तत्काल जीरो एफआईआर के रूप में दर्ज किया जाए। यदि कोई पुलिस अधिकारी शिकायत लेने से मना करता है या अनावश्यक विलंब करता है, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

इलाज और वैज्ञानिक जांच को प्राथमिकता

अदालत ने कहा कि पीड़ित को बिना देरी चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है। साथ ही मेडिकल परीक्षण और फॉरेंसिक साक्ष्य संग्रह की प्रक्रिया निर्धारित समय के भीतर पूरी की जानी चाहिए। इस दौरान पीड़ित की गरिमा और निजता की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर विशेष बल दिया गया है।

वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में जांच

यौन अपराध मामलों की जांच को प्रभावी बनाने के लिए पुलिस अधीक्षक या अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक स्तर की निगरानी में विशेष जांच अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने कहा कि जांच में देरी से साक्ष्यों के प्रभावित होने की आशंका बढ़ जाती है, इसलिए समयबद्ध कार्रवाई जरूरी है।

जांच और संरक्षण के लिए तय समयसीमा

न्यायालय ने दुष्कर्म से जुड़े मामलों में प्रारंभिक जांच 15 दिनों के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया है। वहीं पॉक्सो मामलों में पीड़ित बच्चे को घटना की जानकारी मिलने के 24 घंटे के अंदर सुरक्षित आश्रय, चिकित्सीय सुविधा और आवश्यक संरक्षण उपलब्ध कराया जाना अनिवार्य होगा।

महिला अधिकारी ही लें बयान

महिलाओं और बच्चों से जुड़े यौन अपराध मामलों में पीड़ित का बयान केवल महिला पुलिस अधिकारी द्वारा दर्ज किए जाने का निर्देश दिया गया है, ताकि प्रक्रिया अधिक संवेदनशील और सहज बन सके।

कानूनी मदद से लेकर पुनर्वास तक व्यापक व्यवस्था

अदालत ने राज्य सरकार को पीड़ितों के लिए निःशुल्क कानूनी सहायता, सुरक्षित आवास, पुलिस संरक्षण और गवाह सुरक्षा जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। इसके अतिरिक्त आर्थिक सहायता, मानसिक स्वास्थ्य परामर्श, रोजगार से जुड़ी मदद और दीर्घकालिक पुनर्वास नीति तैयार कर उसे प्रभावी ढंग से लागू करने को कहा गया है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले के अंतिम परिणाम से अलग, पीड़ित को उचित मुआवजा प्रदान करने की प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए।

पीड़ितों की पहचान को गोपनीय बनाए रखने के लिए अदालत ने मीडिया, पुलिस और न्यायिक तंत्र से जुड़े सभी व्यक्तियों को सर्वोच्च न्यायालय के स्थापित मानकों का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया है। पहचान सार्वजनिक होने की स्थिति में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी और विभागीय कार्रवाई की जाएगी।

हेल्पलाइन सेवाओं को और प्रभावी बनाने पर जोर

न्यायालय ने महिला सहायता हेल्पलाइन 181 और आपातकालीन सेवा 112 की कार्यक्षमता बढ़ाने तथा दोनों सेवाओं के बेहतर समन्वय की संभावनाओं पर काम करने का सुझाव भी दिया है, ताकि पीड़ितों को त्वरित सहायता मिल सके।

झारखंड हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता धीरज कुमार ने इन निर्देशों को न्याय प्रणाली में पीड़ितों के हितों को केंद्र में रखने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया है। अदालत का मानना है कि इन उपायों के प्रभावी क्रियान्वयन से यौन अपराध मामलों में जांच और न्याय प्रक्रिया अधिक जवाबदेह, संवेदनशील और परिणामोन्मुख बन सकेगी।