जैन मंदिर में हर्षोल्लास से मना संवत्सरी पर्व, मिच्छामि दुक्कड़म के साथ गूंजा क्षमा का संदेश
जामताडा जिले सालकुंडा जैन मंदिर जामताड़ा में मंगलवार को जैन धर्म के सबसे पवित्र पर्व संवत्सरी का समापन श्रद्धा और भक्ति के साथ हुआ।

जामताडा: जिले सालकुंडा जैन मंदिर जामताड़ा में मंगलवार को जैन धर्म के सबसे पवित्र पर्व संवत्सरी का समापन श्रद्धा और भक्ति के साथ हुआ। पर्युषण महापर्व के आठवें और अंतिम दिन मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना, प्रार्थना सभा और क्षमायाचना कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जैन धर्म में संवत्सरी को आत्मशुद्धि, आत्ममंथन और क्षमा का सर्वोच्च पर्व माना जाता है। इस दिन जैन धर्मावलंबी जाने-अनजाने में हुई अपनी भूलों के लिए सभी जीवों से क्षमा मांगते हैं।
इस अवसर पर समाजसेवी सुप्रिया माजि ने कहा कि संवत्सरी सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और भाईचारे का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि क्षमा मांगने और क्षमा करने से ही रिश्ते मजबूत होते हैं और समाज में शांति स्थापित होती है। यह पर्व हमें क्रोध, द्वेष और अहंकार को त्याग कर करुणा और प्रेम का मार्ग अपनाने की प्रेरणा देता है। पूजा के दौरान जैन धर्म के मूल सिद्धांतों पर प्रकाश डाला गया।
बताया गया कि जैन धर्म अहिंसा, सत्य और संयम पर आधारित है, जिसके पाँच मुख्य व्रत हैं - अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह। इसके साथ ही शुद्ध शाकाहारी भोजन, रात्रि भोजन का त्याग और जीव रक्षा के लिए छना हुआ जल ग्रहण करने के नियमों का पालन किया जाता है। कार्यक्रम के अंत में सभी श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे से मिच्छामि दुक्कड़म् कहकर क्षमायाचना की, जिसका अर्थ है - यदि मेरे मन, वचन और कर्म से आपको किसी प्रकार का कष्ट पहुँचा हो तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। इस पावन अवसर पर मंदिर के पुजारी तपन माजि के साथ वरुण माजि, सजल माजि, रुबी माजि, राज माजि, कौशिक माजि, निठुरा माजि, आभा माजि, रुपाली माजि, सुप्रिया माजि सहित सालकुंडा गांव के सैकड़ों ग्रामीण और श्रद्धालु उपस्थित थे।
जामताड़ा से संतोष की रिपोर्ट










