विधान परिषद चुनाव : BJP-JDU के रिश्तों में बढ़ी तल्खी, 2 निर्दलीय MLC की भाजपा से नजदीकी ने NDA के भीतर खड़े किए गठबंधन धर्म पर सवाल

बिहार में सत्ता की साझेदार भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल यूनाइटेड (JDU) के बीच विधान परिषद चुनाव (MLC) के बाद राजनीतिक तल्खी खुलकर सामने आने लगी है।

विधान परिषद चुनाव : BJP-JDU के रिश्तों में बढ़ी तल्खी, 2 निर्दलीय MLC की भाजपा से नजदीकी ने NDA के भीतर खड़े किए गठबंधन धर्म पर सवाल

पटना : बिहार में सत्ता की साझेदार भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल यूनाइटेड (JDU) के बीच विधान परिषद चुनाव (MLC) के बाद राजनीतिक तल्खी खुलकर सामने आने लगी है। मामला सिर्फ सारण शिक्षक और तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में जदयू प्रत्याशियों की हार का नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक घटनाक्रम का है जिसने एनडीए के भीतर आपसी भरोसे, चुनावी तालमेल और गठबंधन धर्म को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से जदयू के आनंद पुष्कर को हराने वाले राहुल राज और तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से जदयू के अभिषेक झा को पराजित करने वाले बंशीधर ब्रजवासी का चुनाव परिणाम आने के कुछ ही दिनों बाद भाजपा के साथ खड़ा होना जदयू को नागवार गुजर रहा है। 

इस घटनाक्रम ने एक असहज राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी है

इस घटनाक्रम ने एक असहज राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी है। दोनों सीटों पर भाजपा और जदयू एक ही गठबंधन के हिस्से थे। उम्मीदवार जदयू के थे, लेकिन जीत निर्दलीय प्रत्याशियों की हुई। अब उन्हीं विजयी निर्दलीय नेताओं का भाजपा के साथ जुड़ना जदयू के लिए केवल चुनावी हार का मामला नहीं रह गया है। पार्टी के नेताओं के सवालों में यह चिंता भी दिखाई दे रही है कि जब गठबंधन के उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे, तब सहयोगी दल के नेताओं की भूमिका क्या थी और चुनाव के बाद विजयी प्रत्याशियों को अपने साथ जोड़ने का राजनीतिक संदेश क्या है?

आनंद पुष्कर ने उठाए BJP के सांसदों और विधायकों की भूमिका पर सवाल

सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जदयू प्रत्याशी आनंद पुष्कर की हार के बाद उनकी नाराजगी सार्वजनिक हो गई है। आनंद पुष्कर ने चुनावी अभियान के दौरान गठबंधन के भीतर हुए तालमेल पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि एनडीए के स्तर पर यह सहमति बनी थी कि गठबंधन के सभी नेता और जनप्रतिनिधि विद्यालयों में जाकर शिक्षकों से मिलेंगे तथा अधिकृत उम्मीदवार के पक्ष में समर्थन जुटाएंगे। इसके बावजूद भाजपा के कई सांसदों और विधायकों ने अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखाई। आनंद पुष्कर ने भाजपा सांसद राजीव प्रताप रूडी और राधा मोहन सिंह की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए। उनका आरोप है कि चुनाव के दौरान उन्हें लगातार भरोसा दिलाया जाता रहा कि मौजूदा विधान पार्षद राहुल राज चुनाव नहीं लड़ेंगे और गठबंधन के फैसले का सम्मान करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और राहुल राज निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतर गए।

आनंद पुष्कर ने इस पूरे घटनाक्रम को गठबंधन की राजनीति में भरोसे का सवाल बताया है

आनंद पुष्कर ने इस पूरे घटनाक्रम को गठबंधन की राजनीति में भरोसे का सवाल बताया है। उन्होंने यह भी कहा कि वे जदयू के पुराने कार्यकर्ता हैं और पहले भी नीतीश कुमार के साथ थे, आज भी हैं और आगे भी रहेंगे। अपने पिता स्वर्गीय केदारनाथ पांडेय के शिक्षक समाज के लिए किए गए कार्यों का उल्लेख करते हुए उन्होंने चुनाव को केवल व्यक्तिगत हार-जीत के बजाय शिक्षक समाज के प्रतिनिधित्व से जोड़कर देखा है। उनके सवाल का राजनीतिक महत्व इसलिए भी है कि यदि गठबंधन के स्तर पर साझा चुनावी रणनीति बनी थी, तो उसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी भी दोनों दलों की थी। ऐसे में चुनाव के बाद जीतने वाले प्रत्याशी को भाजपा का समर्थन मिलना जदयू के भीतर स्वाभाविक रूप से असहजता पैदा कर रहा है।

अभिषेक झा ने भी खोला मोर्चा, चुनावी चक्रव्यूह का लगाया आरोप

तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में जदयू प्रत्याशी अभिषेक झा की हार ने भी गठबंधन के भीतर असंतोष को हवा दी है। निर्दलीय प्रत्याशी बंशीधर ब्रजवासी ने उन्हें 9,147 मतों के अंतर से पराजित किया। घोषित आंकड़ों के मुताबिक बंशीधर ब्रजवासी को 31,832 मत मिले, जबकि अभिषेक झा को 22,685 मत प्राप्त हुए। हार के बाद अभिषेक झा ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने एनडीए के कुछ नेताओं की भूमिका पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि चुनाव में उन्हें गठबंधन के भीतर से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। 

इस पूरे मामले में अभिषेक झा का असंतोष केवल चुनावी परिणाम तक सीमित नहीं रहा

उन्होंने चुनावी प्रक्रिया में करीब 4,700 मतों के रद्द होने का भी मुद्दा उठाया और अपनी हार को राजनीतिक चक्रव्यूह से जोड़कर देखा। इस पूरे मामले में अभिषेक झा का असंतोष केवल चुनावी परिणाम तक सीमित नहीं रहा। जिस बंशीधर ब्रजवासी ने उन्हें हराया, उनके भाजपा के साथ आने से जदयू खेमे में यह सवाल और गहरा हुआ कि क्या चुनाव के समय गठबंधन की प्रतिबद्धता और चुनाव के बाद की राजनीतिक रणनीति में कोई अंतर है? 

उमेश कुशवाहा की कड़ी प्रतिक्रिया, भाजपा नेतृत्व को आत्ममंथन की सलाह

जदयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने भी इस घटनाक्रम पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने विशेष रूप से राहुल राज की भाजपा में वापसी के समय और परिस्थितियों पर सवाल उठाए। राहुल राज पहले भाजपा से जुड़े रहे थे और निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ने के कारण उन्हें छह वर्षों के लिए पार्टी से निष्कासित किया गया था। उमेश कुशवाहा का सवाल है कि जिस व्यक्ति को पार्टी ने छह वर्षों के लिए निष्कासित किया था, उसे चुनाव जीतने के तत्काल बाद इतनी जल्दी वापस लेने का औचित्य क्या है? उन्होंने भाजपा के केंद्रीय और प्रदेश नेतृत्व को इस पूरे मामले पर गंभीरता से विचार करने की सलाह दी। उनकी प्रतिक्रिया में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश छिपा है। जदयू इसे भाजपा का आंतरिक संगठनात्मक फैसला मानकर चुप रहने के बजाय एनडीए के आपसी संबंधों से जोड़कर देख रहा है। राहुल राज को निष्कासित करने और फिर चुनाव जीतने के बाद भाजपा में वापस लेने की प्रक्रिया ने जदयू के असंतोष को और बढ़ाया है। 

BJP का पक्ष : पार्टी में शामिल नहीं, केवल समर्थन देने की बात

विवाद बढ़ने के बाद भाजपा की तरफ से भी सफाई सामने आई है। 31 अक्टूबर को प्रदेश भाजपा कार्यालय में दोनों नेताओं के पहुंचने, भाजपा नेताओं के साथ तस्वीरें सामने आने और पार्टी की ओर से सदस्यता ग्रहण करने की घोषणा के बाद राजनीतिक विवाद तेज हुआ था। हालांकि, बाद में भाजपा ने अपनी शुरुआती घोषणा से पीछे हटते हुए कहा कि दोनों नेताओं ने औपचारिक रूप से भाजपा की सदस्यता नहीं ली है, बल्कि पार्टी और सरकार को समर्थन देने का निर्णय किया है।

प्रदेश BJP अध्यक्ष संजय सरावगी ने भी यही रुख रखा 

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष संजय सरावगी ने भी यही रुख रखा। भाजपा की दलील है कि दोनों नेता एनडीए की कार्यशैली और सरकार के विकास संबंधी दृष्टिकोण से प्रभावित हैं। बंशीधर ब्रजवासी ने शिक्षकों की समस्याओं के समाधान के आश्वासन को समर्थन का आधार बताया, जबकि राहुल राज ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और नीतीश कुमार के विकास दृष्टिकोण के प्रति समर्थन जताया। यहां एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि दोनों नेताओं ने केवल सरकार को समर्थन दिया है तो फिर शुरुआती तौर पर भाजपा में शामिल होने की घोषणा क्यों की गई? सदस्यता पर्ची और भाजपा नेताओं के साथ तस्वीरें सामने आने के बाद पार्टी के रुख में बदलाव ने पूरे प्रकरण को और पेचीदा बना दिया है। 

निर्दलीय एमएलसी की सदस्यता पर भी संवैधानिक सवाल

इस राजनीतिक विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून से जुड़ा है। संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 2(2) के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति निर्दलीय सदस्य के रूप में निर्वाचित होने के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करता है तो वह सदन की सदस्यता से अयोग्य घोषित किए जाने के दायरे में आ सकता है। इसमें निर्दलीय निर्वाचित सदस्यों के लिए राजनीतिक दल में शामिल होने पर विशेष रोक है।

राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी ने चुनाव निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीता है

इस मामले में राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी ने चुनाव निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीता है। यदि यह स्थापित होता है कि उन्होंने निर्वाचित होने के बाद औपचारिक रूप से भाजपा की सदस्यता ग्रहण की है, तो दल-बदल कानून के तहत उनकी विधान परिषद की सदस्यता पर सवाल खड़े हो सकते हैं। इसी आधार पर राजद और जनसुराज ने दोनों की सदस्यता समाप्त करने की मांग उठाई है। जनसुराज के नेताओं ने विधान परिषद के सभापति रामबचन राय से मुलाकात कर शिकायत भी की है। राजद की ओर से भी भाजपा पर संविधान की दसवीं अनुसूची की भावना के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।

सरकार को समर्थन देना और किसी राजनीतिक दल की औपचारिक सदस्यता लेना दो अलग-अलग बातें हैं

हालांकि, केवल सरकार को समर्थन देना और किसी राजनीतिक दल की औपचारिक सदस्यता लेना दो अलग-अलग बातें हैं। इस मामले में वास्तविक स्थिति, उपलब्ध दस्तावेज और दोनों नेताओं के आधिकारिक बयान महत्वपूर्ण होंगे। अयोग्यता पर अंतिम निर्णय विधान परिषद के सभापति को करना है और उनका निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन भी हो सकता है। इसलिए अभी दोनों की सदस्यता समाप्त होने को तय मानना उचित नहीं होगा। 

5 नवंबर की बैठक पर टिकी जदयू की निगाहें

इस पूरे विवाद के बीच जदयू ने पांच नवंबर को पार्टी नेताओं की बैठक बुलाने का निर्णय लिया है। माना जा रहा है कि विधान परिषद चुनाव के नतीजों, दोनों सीटों पर हार, गठबंधन के भीतर चुनावी तालमेल और भाजपा के साथ पैदा हुई असहजता पर चर्चा हो सकती है। आनंद पुष्कर और अभिषेक झा की प्रस्तावित संयुक्त प्रेस वार्ता भी चर्चा में रही। सोमवार को दोनों नेताओं को एक साथ मीडिया के सामने आना था, लेकिन जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से बातचीत के बाद यह प्रेस वार्ता रद्द कर दी गई। इसे फिलहाल गठबंधन के भीतर संवाद के जरिए स्थिति संभालने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। 

BJP-JDU के रिश्तों में खटास का असली कारण क्या है?

बिहार में भाजपा और जदयू का गठबंधन केवल सत्ता में भागीदारी का समीकरण नहीं है। दोनों दलों के बीच सीटों का बंटवारा, संगठनात्मक प्रभाव, स्थानीय नेतृत्व की भूमिका और चुनावी क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं का आपसी तालमेल भी गठबंधन की स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। विधान परिषद की इन दोनों सीटों पर सामने आए घटनाक्रम ने तीन बड़े सवाल खड़े किए हैं। पहला, जब दोनों सीटें एनडीए के भीतर जदयू के हिस्से में थीं, तब भाजपा के स्थानीय नेताओं और जनप्रतिनिधियों की चुनावी भूमिका क्या रही? दूसरा, क्या गठबंधन के किसी अधिकृत प्रत्याशी को हराने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों को चुनाव के तत्काल बाद सहयोगी दल में जगह देना गठबंधन की साझा राजनीतिक प्रतिबद्धता के अनुकूल है? तीसरा, यदि दोनों निर्दलीय विधान पार्षदों को भाजपा का औपचारिक समर्थन प्राप्त है, तो क्या पार्टी उनके राजनीतिक भविष्य और संवैधानिक स्थिति को लेकर स्पष्ट रुख अपनाएगी? इन सवालों के जवाब केवल भाजपा और जदयू के शीर्ष नेतृत्व के बयानों से नहीं, बल्कि दोनों दलों के बीच होने वाली अगली राजनीतिक बातचीत से सामने आएंगे।

बिहार की राजनीति में यह प्रकरण एक बड़ी राजनीतिक परीक्षा बन गया है

यह भी ध्यान रखना होगा कि दोनों निर्दलीय प्रत्याशियों की अपनी चुनावी राजनीतिक पहचान और समर्थन का आधार रहा है। बंशीधर ब्रजवासी पहले भी शिक्षक समुदाय के बीच सक्रिय रहे हैं और दूसरी बार विधान परिषद पहुंचे हैं। राहुल राज भी भाजपा के संगठन से पहले जुड़े रहे हैं। इसलिए उनके चुनावी प्रदर्शन को केवल भाजपा-जदयू के आपसी विवाद के नजरिए से देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। फिलहाल बिहार की राजनीति में यह प्रकरण एक बड़ी राजनीतिक परीक्षा बन गया है। भाजपा के लिए चुनौती है कि वह अपने संगठनात्मक फैसलों और गठबंधन की मर्यादा के बीच संतुलन स्पष्ट करे। जदयू के सामने सवाल है कि वह अपने उम्मीदवारों की हार और सहयोगी दल के नेताओं की कथित निष्क्रियता पर किस तरह जवाबदेही तय कराता है। नीतीश कुमार और सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के लिए भी यह जरूरी है कि चुनावी प्रतिस्पर्धा का असर सरकार के कामकाज और गठबंधन के आपसी समन्वय पर न पड़े।

बिहार की राजनीति में सहयोगी दलों के बीच मतभेद कोई नई बात नहीं है

बिहार की राजनीति में सहयोगी दलों के बीच मतभेद कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार मामला कुछ अलग है। दो सीटों पर जदयू प्रत्याशियों की हार, विजयी निर्दलीयों का भाजपा के साथ जुड़ने का ऐलान, भाजपा का बाद में केवल समर्थन की बात कहना और जदयू प्रदेश अध्यक्ष की सार्वजनिक नाराजगी ये सभी घटनाएं एक ही राजनीतिक सवाल की ओर इशारा कर रही हैं कि एनडीए में गठबंधन धर्म की व्याख्या आखिर कौन और किस परिस्थिति में तय करेगा? आने वाले दिनों में पांच नवंबर की जदयू बैठक, भाजपा का आधिकारिक रुख और विधान परिषद के सभापति के समक्ष चल रही शिकायतें इस विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगी।

पटना से अनूप नारायण सिंह की रिपोर्ट

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