संजय झा को JDU में शामिल कर नीतीश कुमार ने भी तोड़ा था गठबंधन धर्म! आज भाजपा पर सवाल उठा रही जदयू
बिहार में एमएलसी चुनाव के नतीजों के बाद जदयू और भाजपा के बीच गठबंधन धर्म को लेकर सियासी तल्खी बढ़ती दिख रही है। जब भाजपा ने खुद नीतीश कुमार पर गठबंधन धर्म तोड़ने का आरोप लगाया था।

पटना : बिहार में एमएलसी चुनाव के नतीजों के बाद जदयू और भाजपा के बीच गठबंधन धर्म को लेकर सियासी तल्खी बढ़ती दिख रही है। निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल करने वाले बंशीधर ब्रजवासी और डॉ. राहुल राज के भाजपा के प्रति समर्थन जताने पर जदयू ने सवाल उठाए हैं। जदयू नेताओं का आरोप है कि भाजपा ने सहयोगी दल के हितों का ख्याल नहीं रखा। लेकिन इस विवाद के बीच करीब 14 साल पुराना एक राजनीतिक घटनाक्रम भी चर्चा में आ गया है, जब भाजपा ने खुद नीतीश कुमार पर गठबंधन धर्म तोड़ने का आरोप लगाया था।
यह मामला JDU के मौजूदा राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा से जुड़ा है
यह मामला जदयू के मौजूदा राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा से जुड़ा है। कभी भाजपा में रहे संजय झा को 2006 में भाजपा ने बिहार विधान परिषद का सदस्य बनाया था। उस समय वह भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली के करीबी माने जाते थे। हालांकि, बाद में नीतीश कुमार से उनकी नजदीकियां बढ़ीं और वर्ष 2012 में उन्होंने भाजपा छोड़कर जदयू का दामन थाम लिया।
संजय झा की एंट्री पर BJP ने नीतीश को घेरा था
संजय झा का भाजपा से जदयू में जाना उस दौर में सामान्य राजनीतिक दल-बदल की घटना नहीं थी। बिहार में भाजपा और जदयू की सरकार जरूर थी, लेकिन दोनों दलों के बीच रिश्ते लगातार बिगड़ रहे थे। नरेंद्र मोदी का भाजपा में बढ़ता प्रभाव और राष्ट्रपति चुनाव में नीतीश कुमार का कांग्रेस उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को समर्थन देना पहले से ही दोनों दलों के बीच तनाव की वजह बन चुका था। इसी राजनीतिक माहौल में भाजपा नेता संजय झा ने जदयू की सदस्यता ग्रहण कर ली। भाजपा ने इस फैसले को गठबंधन की मर्यादा के खिलाफ बताया था।
पार्टी के तत्कालीन मीडिया प्रभारी राकेश कुमार सिंह ने जुलाई 2012 में सवाल उठाया था
पार्टी के तत्कालीन मीडिया प्रभारी राकेश कुमार सिंह ने जुलाई 2012 में सवाल उठाया था कि एक पार्टी से इस्तीफा देकर उसी गठबंधन की दूसरी पार्टी में शामिल होना गठबंधन का मजाक उड़ाने जैसा है। उन्होंने जदयू को संजय झा को पार्टी में शामिल करने के फैसले पर दोबारा विचार करने की नसीहत भी दी थी। भाजपा नेताओं विनोद नारायण झा और विजय मिश्र ने भी इस घटनाक्रम पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि एनडीए में इस तरह की घटना पहले कभी नहीं हुई।
2014 में BJP के खिलाफ चुनाव भी लड़े थे संजय झा
संजय झा के जदयू में शामिल होने के बाद राजनीतिक विवाद यहीं नहीं थमा। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू ने उन्हें दरभंगा सीट से उम्मीदवार बनाया। इस चुनाव में उन्हें भाजपा के खिलाफ मैदान में उतरना पड़ा था। हालांकि, वह चुनाव हार गए थे। संजय झा ने उस समय अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा था कि उन्होंने भाजपा के बड़े नेताओं को अपने निर्णय की जानकारी दे दी थी और उनकी सहमति भी प्राप्त कर ली थी। लेकिन भाजपा की सार्वजनिक नाराजगी ने उस समय गठबंधन के भीतर अविश्वास को उजागर कर दिया था।
आज BJP पर सवाल, तब नीतीश पर लगे थे आरोप
राजनीतिक समीक्षक विजय नारायण का तर्क है कि गठबंधन धर्म की बात करने वाली जदयू को अपने पुराने राजनीतिक घटनाक्रमों पर भी नजर डालनी चाहिए। उनका सवाल है कि जब 2012 में भाजपा के एक विधान पार्षद को जदयू में शामिल कराया गया था, तब गठबंधन की मर्यादा का सवाल क्यों नहीं उठाया गया? वर्तमान विवाद की जड़ एमएलसी चुनाव में भी दिखाई दे रही है। जदयू के उम्मीदवारों को हराकर निर्दलीय जीत दर्ज करने वाले बंशीधर ब्रजवासी और डॉ. राहुल राज के भाजपा के प्रति समर्थन ने दोनों सहयोगी दलों के बीच असहजता बढ़ा दी है। जदयू इसे अपने राजनीतिक हितों के खिलाफ देख रही है।
2012 और 2026 के घटनाक्रमों की परिस्थितियां अलग-अलग हैं
हालांकि, 2012 और 2026 के घटनाक्रमों की परिस्थितियां अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों ने गठबंधन के भीतर सहयोगी दलों के राजनीतिक हित, आपसी सहमति और मर्यादा को लेकर सवाल जरूर खड़े किए हैं। अब सवाल यह है कि गठबंधन धर्म का पैमाना क्या सिर्फ आज की राजनीतिक सुविधा के हिसाब से तय होगा? जब भाजपा ने संजय झा के जदयू में जाने पर नीतीश कुमार को घेरा था, तब भी गठबंधन की मर्यादा का सवाल था। आज निर्दलीय एमएलसी के भाजपा के करीब आने पर जदयू वही सवाल उठा रही है। बिहार की राजनीति में पुरानी घटनाएं एक बार फिर नए विवाद के बीच आईना बनकर सामने हैं।
पटना से अनूप नारायण सिंह की रिपोर्ट











