जब पटना की दुर्गा पूजा में जुटते थे देश के संगीत सम्राट, मोहम्मद रफी से बिस्मिल्लाह खान व सितारा देवी तक सजाते थे महफिल

पटना की दुर्गा पूजा का इतिहास केवल भव्य पंडालों, आकर्षक प्रतिमाओं और श्रद्धालुओं की भीड़ तक सीमित नहीं रहा है। एक दौर ऐसा भी था, जब शारदीय नवरात्र के अवसर पर बिहार की राजधानी देश के सांस्कृतिक नक्शे पर अपनी अलग पहचान रखती थी।

जब पटना की दुर्गा पूजा में जुटते थे देश के संगीत सम्राट, मोहम्मद रफी से बिस्मिल्लाह खान व सितारा देवी तक सजाते थे महफिल

पटना : पटना की दुर्गा पूजा का इतिहास केवल भव्य पंडालों, आकर्षक प्रतिमाओं और श्रद्धालुओं की भीड़ तक सीमित नहीं रहा है। एक दौर ऐसा भी था, जब शारदीय नवरात्र के अवसर पर बिहार की राजधानी देश के सांस्कृतिक नक्शे पर अपनी अलग पहचान रखती थी। 1950, 1960 और 1970 के दशक में दुर्गा पूजा की सप्तमी, अष्टमी और नवमी की रातें संगीत, नृत्य और शास्त्रीय कलाओं के नाम होती थीं। पूजा समितियां और सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएं देश के नामचीन कलाकारों को आमंत्रित करती थीं। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई, पंडित रविशंकर का सितार, उस्ताद अल्ला रक्खा की तबला वादन कला, मोहम्मद रफी की आवाज और सितारा देवी के घुंघरुओं की झंकार से पटना की रातें गुलजार होती थीं। पुराने पटना के बुजुर्गों की यादों में आज भी उस सांस्कृतिक स्वर्णिम युग की तस्वीर जीवंत है।

शाम ढलने के बाद शुरू होने वाले कार्यक्रम कई बार सुबह तक चलते थे

उस दौर में दुर्गा पूजा का मतलब केवल मां दुर्गा के दर्शन करना और पंडालों की सैर करना नहीं था। लोगों के लिए यह देश के महान कलाकारों को सामने बैठकर सुनने और देखने का दुर्लभ अवसर भी होता था। गांधी मैदान, हार्डिंग पार्क, पटना कॉलेजिएट स्कूल, लंगरटोली, गोलघर के आसपास, मच्छुआटोली, मिलर स्कूल, गोविंद मित्र रोड, गर्दनीबाग, पटना जंक्शन और मुसल्लहपुर हाट जैसे इलाकों में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। पटना सिटी के मारूफगंज इलाके में भी संगीत की महफिलें सजती थीं। शाम ढलने के बाद शुरू होने वाले कार्यक्रम कई बार सुबह तक चलते थे। लोग एक आयोजन से दूसरे आयोजन तक पहुंचते थे। आसपास के जिलों और दूसरे शहरों से संगीत प्रेमी विशेष रूप से पटना आते थे।

पटना के दुर्गा पूजा सांस्कृतिक आयोजनों में प्रस्तुति देने वाले दिग्गजों की सूची बेहद समृद्ध थी

पटना के दुर्गा पूजा सांस्कृतिक आयोजनों में प्रस्तुति देने वाले दिग्गजों की सूची बेहद समृद्ध थी। शहनाई के जादूगर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, सितार वादक पंडित रविशंकर और उस्ताद विलायत खान, तबला वादक उस्ताद अल्ला रक्खा, पंडित किशन महाराज और सामता प्रसाद मिश्र, जिन्हें गोदई महाराज के नाम से भी जाना जाता था, वायलिन वादक वी.जी. जोग और सरोद वादक उस्ताद अली अकबर खान तथा उस्ताद अमजद अली खान जैसे नामों का उल्लेख पुराने सांस्कृतिक आयोजनों की स्मृतियों में मिलता है। शास्त्रीय गायन की दुनिया से किशोरी अमोनकर, परवीन सुल्ताना, बेगम अख्तर और दूसरी दिग्गज हस्तियों ने भी पटना की संगीत परंपरा को समृद्ध किया। कथक की महान नृत्यांगना सितारा देवी और पंडित बिरजू महाराज जैसे कलाकारों की प्रस्तुतियां दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण हुआ करती थीं।

फिल्मी संगीत के प्रशंसकों के लिए भी ये आयोजन किसी उत्सव से कम नहीं थे

फिल्मी संगीत के प्रशंसकों के लिए भी ये आयोजन किसी उत्सव से कम नहीं थे। पुराने निवासियों की स्मृतियों में मोहम्मद रफी, मुकेश, मन्ना डे, महेंद्र कपूर और सुलक्षणा पंडित जैसे लोकप्रिय गायकों की प्रस्तुतियों का उल्लेख मिलता है। गजल गायकों में अनूप जलोटा, पंकज उधास, जगजीत सिंह और तलत अजीज जैसे नाम भी पटना के दुर्गा पूजा सांस्कृतिक कार्यक्रमों से जुड़ी यादों में शामिल हैं। इन प्रस्तुतियों ने शास्त्रीय संगीत और लोकप्रिय संगीत के बीच एक सुंदर सेतु बनाया था। हालांकि, इन सभी कलाकारों के कार्यक्रम हर वर्ष या एक ही पूजा समिति के मंच पर हुए हों, ऐसा प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इनका उल्लेख अलग-अलग वर्षों के आयोजनों और पुराने लोगों की स्मृतियों के आधार पर किया जाता है।

कार्यक्रम में महान नृत्यांगना सितारा देवी ने लगभग 13 घंटे तक लगातार नृत्य किया था

उस दौर की एक घटना आज भी लोगों को रोमांचित करती है। पटना जंक्शन के निकट आयोजित एक कार्यक्रम में महान नृत्यांगना सितारा देवी ने लगभग 13 घंटे तक लगातार नृत्य किया था। उनके साथ तबला वादन में पंडित किशन महाराज ने संगत की थी। दर्शक रात भर अपनी जगह पर बैठे रहे और कलाकारों की प्रस्तुति में खोए रहे। यह घटना बताती है कि उस समय पटना के श्रोताओं में संगीत और नृत्य के प्रति कितनी गहरी रुचि थी। दानापुर से साइकिल रिक्शे पर पटना आकर कार्यक्रम देखने वाले संगीत प्रेमियों की यादें भी इस सांस्कृतिक दीवानगी की गवाही देती हैं।

आयोजनों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि संगीत आम लोगों के लिए उपलब्ध था

इन आयोजनों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि संगीत आम लोगों के लिए उपलब्ध था। अधिकांश कार्यक्रम खुले स्थानों पर होते थे और कई आयोजनों में प्रवेश के लिए टिकट या विशेष पास की जरूरत नहीं पड़ती थी। पूजा समितियों के बीच अच्छे कलाकारों को आमंत्रित करने की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा रहती थी। कलाकारों को सुनने के लिए समाज के अलग-अलग वर्गों के लोग एक साथ बैठते थे। वहां न कोई वीआईपी दीर्घा संगीत के आनंद को बांटती थी और न ही किसी कलाकार की प्रस्तुति केवल चुनिंदा लोगों तक सीमित रहती थी। सुर और ताल सबको एक सूत्र में बांध देते थे। पटना की इस सांस्कृतिक परंपरा को लेकर 18 अक्टूबर 2023 को प्रकाशित एक रिपोर्ट में भी पुराने निवासियों ने अपने अनुभव साझा किए थे। इससे पहले 24 अक्टूबर 2001 और 13 अक्टूबर 2021 की रिपोर्टों में भी पटना के दुर्गा पूजा समारोहों में देश के दिग्गज संगीतकारों और कलाकारों की प्रस्तुतियों का विस्तार से उल्लेख किया गया था। इन विवरणों से स्पष्ट होता है कि 1970 के दशक तक शास्त्रीय संगीत और नृत्य दुर्गा पूजा के प्रमुख आकर्षणों में शामिल थे।

समय के साथ यह परंपरा कमजोर पड़ने लगी। वर्ष 1975 की भीषण बाढ़ ने शहर के जनजीवन को प्रभावित किया

समय के साथ यह परंपरा कमजोर पड़ने लगी। वर्ष 1975 की भीषण बाढ़ ने शहर के जनजीवन को प्रभावित किया। बाद के वर्षों में कानून-व्यवस्था की चिंताएं, कलाकारों की बढ़ती फीस, आयोजकों की आर्थिक चुनौतियां और कार्यक्रमों के प्रबंधन से जुड़ी समस्याएं भी सामने आईं। 1980 के दशक के उत्तरार्ध में बड़े सांस्कृतिक आयोजनों का आकर्षण घटने लगा और 1990 के दशक की शुरुआत तक पुराने स्वरूप के कई कार्यक्रम बंद हो गए। कुछ संस्थाओं ने इस परंपरा को पुनर्जीवित करने की कोशिश भी की, लेकिन पहले जैसा माहौल कायम नहीं हो सका।

आज दुर्गा पूजा में भव्य पंडाल, आकर्षक रोशनी और आधुनिक संगीत का अपना आकर्षण है

आज दुर्गा पूजा में भव्य पंडाल, आकर्षक रोशनी और आधुनिक संगीत का अपना आकर्षण है। लेकिन सवाल यह है कि क्या नई पीढ़ी को पटना की उस सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराया जा रहा है, जिसने कभी इस शहर को देश के संगीत प्रेमियों का पसंदीदा ठिकाना बनाया था? क्या आज की पूजा समितियां अपने आयोजनों में शास्त्रीय संगीत, गजल, लोकगीत और पारंपरिक नृत्य को पर्याप्त जगह दे रही हैं? पटना की पूजा समितियां चाहें तो इस विरासत को नए रूप में जीवित कर सकती हैं। प्रत्येक वर्ष कुछ मंच महान कलाकारों की स्मृति और भारतीय शास्त्रीय संगीत को समर्पित किए जा सकते हैं। पुराने कलाकारों, आयोजकों और प्रत्यक्षदर्शियों की यादों को संकलित किया जा सकता है। इससे आने वाली पीढ़ी को यह समझने का अवसर मिलेगा कि दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आस्था का उत्सव नहीं, बल्कि कला, संस्कृति और सामाजिक एकता का भी महापर्व है। कभी पटना की दुर्गा पूजा में रात भर संगीत की महफिलें सजती थीं। शहनाई की आवाज के साथ लोग मां के दर्शन करते थे, तबले की थाप पर तालियां बजती थीं और महान गायकों की आवाज लोगों के दिलों में उतर जाती थी। वे रातें केवल मनोरंजन नहीं थीं, वे एक पूरे शहर की सांस्कृतिक पहचान थीं।

पटना की दुर्गा पूजा का वह संगीत भरा स्वर्णिम दौर इतिहास का हिस्सा जरूर बन गया है

आज जरूरत है उस पहचान को फिर से जगाने की। पटना की दुर्गा पूजा में एक बार फिर ऐसे मंच सजें, जहां नई पीढ़ी उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई, मोहम्मद रफी के गीतों, सितारा देवी के नृत्य और भारतीय शास्त्रीय संगीत की महान परंपरा को याद कर सके। क्योंकि शहर केवल अपनी इमारतों से महान नहीं बनते, वे अपनी कला, संस्कृति और उन यादों से महान बनते हैं जिन्हें पीढ़ियां अपने दिलों में संजोकर रखती हैं। पटना की दुर्गा पूजा का वह संगीत भरा स्वर्णिम दौर इतिहास का हिस्सा जरूर बन गया है, लेकिन उसकी गूंज आज भी शहर के बुजुर्गों की स्मृतियों में सुनाई देती है। जरूरत है कि उन यादों को आने वाली पीढ़ियों की सांस्कृतिक विरासत बनाया जाए।

अनूप नारायण सिंह की रिपोर्ट

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