'तेल कंपनियों की तिजोरी हो रही भारी, जनता की जेब में पॉकेटमारी' रोहिणी आचार्य बोली-जनविरोधी मोदी सरकार
आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने एक बार फिर मोदी सरकार पर जमकर हमला बोला है। तेल कंपनियों द्वारा भारी मुनाफा कमाने को लेकर रोहिणी आचार्य ने केंद्र सरकार को जनविरोधी मोदी सरकार बताया है।
आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने एक बार फिर मोदी सरकार पर जमकर हमला बोला है। तेल कंपनियों द्वारा भारी मुनाफा कमाने को लेकर रोहिणी आचार्य ने केंद्र सरकार को जनविरोधी मोदी सरकार बताया है। उन्होंने कहा है कि तेल कंपनियों की तिजोरी भारी हो रही है लेकिन जनता की जेब में मोदी सरकार पॉकेटमारी कर रही है।
रोहिणी आचार्य ने सोशल मीडिया एक्स पर एक अखबार का आर्टिकल शेयर किया है, जिसका हेडलाइन है-कंपनियां 36 दिन से लगातार मुनाफे में...तेल कंपनियां अब ₹11/लीटर कमा रहीं, पर आम लोगों को राहत नहीं। रोहिणी आचार्य ने एक्स पर लिखा है-देखिए .. जनविरोधी मोदी सरकार की कारगुजारी....तेल कंपनियों की तिजोरी हो रही भारी जनता की जेब में पॉकेटमारी...तेल कंपनियों द्वारा भारी मुनाफा कमाने के बावजूद आम जनता को उसका लाभ न मिलना आज के बदहाल आर्थिक और सामाजिक परिदृश्य में आर्थिक असमानता और 'विंडफॉल प्रॉफिट' ( Windfall Profit) का विषय है।
रोहिणी आचार्य आगे लिखती है-तेल कंपनियों को हो रहे मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा कंपनियों के शेयरधारकों और कॉर्पोरेट रिजर्व में चला जाता है, जबकि इसका सीधा लाभ आम उपभोक्ताओं को कीमतों में कटौती के रूप में मिलने, दिए जाने की जरूरत है।
पेट्रोल और डीजल की कीमतें सीधे तौर पर आम आदमी की जेब को प्रभावित करती हैं। जब तेल कंपनियां कीमतें कम नहीं करतीं, तो केवल परिवहन ही नहीं, बल्कि फल, सब्जियां, खाद्यान्न , रोजमर्रा की जरूरतों के सामानों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की लागत भी बढ़ जाती है। एक तरफ तेल कंपनियां समृद्ध हो रही है, वहीं दूसरी तरफ आम जनता रिकॉर्ड तोड़ महंगाई का सामना करने को मजबूर है। ये सीधे तौर पर 'कल्याणकारी राज्य' (Welfare State) की अवधारणा पर चोट है।
रोहिणी ने आगे लिखा है-कंपनियों के मुनाफे को जनहित से ऊपर रखने की मोदी सरकार की नीति की वजह से ही आज देश की अस्सी करोड़ से ज्यादा की आबादी महीने में मिलने वाले पाँच किलो राशन के भरोसे जीवनयापन करने को मजबूर है।
मोदी सरकार के 12 वर्षों के शासनकाल में तेल की कीमतों के निर्धारण (Pricing Mechanism) में पारदर्शिता का अभाव रहा है। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें गिरती हैं, तो उसका लाभ घरेलू उपभोक्ताओं - आम जनता को नहीं दिया जाता है। कंपनियां अपने पिछले घाटे की भरपाई या भविष्य के निवेश का हवाला देकर ऊंचे दाम बनाए रखती हैं, जो कि उपभोक्ता अधिकारों का हनन है।
तेल कंपनियों का असीमित मुनाफा और आम जनता की लगातार घटती क्रय शक्ति (Purchasing Power) इस बात का प्रमाण है कि मोदी सरकार के शासनकाल में बाजार के नियमों और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन बिगड़ चुका है। जब तक मुनाफे का एक हिस्सा सीधे तौर पर आम जनता को राहत देने के रूप में हस्तांतरित नहीं किया जाएगा, तब तक कोई भी विकास का दावा "समावेशी" नहीं कहला सकता है।
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