बिहार MLC चुनाव : जाति के गणित पर भारी पड़ा वोट मैनेजमेंट, 8 सीटों के नतीजों ने खोली सियासत की नई किताब
बिहार विधान परिषद की चार शिक्षक और चार स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव परिणाम ने राज्य की सियासत में एक दिलचस्प बहस छेड़ दी है। नतीजों को केवल किसी दल की जीत या किसी दूसरे दल की हार के रूप में देखना चुनाव की पूरी तस्वीर को नजरअंदाज करना होगा।

पटना : बिहार विधान परिषद (MLC) की चार शिक्षक और चार स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव परिणाम ने राज्य की सियासत में एक दिलचस्प बहस छेड़ दी है। इन नतीजों को केवल किसी दल की जीत या किसी दूसरे दल की हार के रूप में देखना चुनाव की पूरी तस्वीर को नजरअंदाज करना होगा। आठ सीटों के परिणाम में जातीय समीकरण, उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पकड़, संगठन की सक्रियता, मतदाता संपर्क और वोट मैनेजमेंट की भूमिका पर नए सिरे से विचार करने का अवसर है। इस चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि सीमित मतदाता वर्ग वाले मुकाबले में केवल पार्टी का नाम या पुराना राजनीतिक प्रभाव ही जीत की गारंटी नहीं बन सका।
पटना में 5 बार MLC पहुंच चुके BJP के नवल किशोर यादव की हार ने सबसे अधिक ध्यान खींचा
शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में पटना से राजद के डॉ. संजीव कुमार, तिरहुत से भाजपा के नरेंद्र प्रसाद सिंह, दरभंगा से जन सुराज के सुरेश प्रसाद राय और सारण से निर्दलीय राहुल राज की जीत ने अलग-अलग राजनीतिक संदेश दिए। चारों सीटों पर अलग-अलग राजनीतिक धाराओं के उम्मीदवारों की सफलता ने मुकाबले को बहुकोणीय बना दिया। पटना में पांच बार विधान परिषद पहुंच चुके भाजपा के नवल किशोर यादव की हार ने सबसे अधिक ध्यान खींचा। दूसरी ओर, दरभंगा में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मदन मोहन झा को पराजित कर जन सुराज के सुरेश राय ने विधान परिषद में अपनी पार्टी का खाता खोला। सारण में भाजपा के बागी निर्दलीय प्रत्याशी राहुल राज की जीत ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ और स्थानीय संपर्क कभी-कभी पार्टी के आधिकारिक समर्थन से भी अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं?
इस चुनाव का जातीय गणित भी चर्चा के केंद्र में है
इस चुनाव का जातीय गणित भी चर्चा के केंद्र में है। एक जातीय आकलन में आठ विजेताओं के बीच पांच भूमिहार, एक राजपूत, एक साहनी और एक यादव का वर्गीकरण सामने रखा गया है। हालांकि, प्रकाशित जातीय विश्लेषणों में भूमिहार विजेताओं की संख्या को लेकर अंतर है। इसलिए इस आंकड़े को अंतिम सत्य मानने के बजाय सभी आठ विजेताओं की सामाजिक पहचान का स्वतंत्र सत्यापन जरूरी है। फिर भी, जातीय प्रतिनिधित्व का सवाल इस चुनाव की समीक्षा में महत्वपूर्ण बना रहेगा। बिहार की राजनीति में जाति सामाजिक संपर्क, संगठन और राजनीतिक लामबंदी का एक कारक है, लेकिन किसी उम्मीदवार की जाति को उसके सभी मतदाताओं की जाति मान लेना विश्लेषण की भूल होगी। जीत के पीछे अपने समुदाय का समर्थन हो सकता है, मगर दूसरे समुदायों के मत, पेशेवर नेटवर्क, स्थानीय मुद्दे और व्यक्तिगत स्वीकार्यता भी परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।
इन चुनावों की असली कहानी वोट मैनेजमेंट के उस पहलू में छिपी है
इन चुनावों की असली कहानी वोट मैनेजमेंट के उस पहलू में छिपी है, जो आम चुनावों की बड़ी रैलियों और नारों के बीच अक्सर नजरअंदाज हो जाता है। शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाता अपेक्षाकृत सीमित और विशिष्ट होते हैं। यहां मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने से लेकर मतदान केंद्र की जानकारी देने, व्यक्तिगत संपर्क बनाए रखने और मतदान के दिन मतदाताओं को सक्रिय करने तक की प्रक्रिया अहम हो सकती है। बड़े राजनीतिक मंच पर दिखाई देने वाली ताकत और मतदाता तक पहुंचने वाली वास्तविक संगठनात्मक क्षमता हमेशा एक जैसी नहीं होती। चुनावी अभियान में किसने अपने समर्थकों से नियमित संपर्क रखा, किसने स्थानीय समस्याओं को समझा और किसका नेटवर्क मतदान के दिन सक्रिय रहा ये ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब चुनाव परिणामों के पीछे छिपे गणित को समझने में मदद कर सकते हैं। हालांकि, केवल जीत-हार के आधार पर किसी प्रत्याशी के प्रबंधन को दूसरे से बेहतर घोषित करना उचित नहीं होगा। इसके लिए मतदान केंद्रवार आंकड़ों और अभियान की तुलनात्मक पड़ताल जरूरी है।
सारण शिक्षक सीट पर राहुल राज की जीत ने पार्टी संगठन और व्यक्तिगत राजनीतिक नेटवर्क के संबंध पर विशेष चर्चा की गुंजाइश पैदा की है
सारण शिक्षक सीट पर राहुल राज की जीत ने पार्टी संगठन और व्यक्तिगत राजनीतिक नेटवर्क के संबंध पर विशेष चर्चा की गुंजाइश पैदा की है। भाजपा से अलग होकर निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले राहुल राज ने जदयू उम्मीदवार आनंद पुष्कर को पराजित किया। दूसरी वरीयता के मतों की गणना ने इस मुकाबले को और दिलचस्प बनाया। यह परिणाम बताता है कि वरीयता आधारित चुनाव में केवल पहली पसंद के मतों को देखकर अंतिम तस्वीर नहीं समझी जा सकती। मतदाताओं की अगली पसंद और मतों का हस्तांतरण भी निर्णायक हो सकता है। इसी तरह, तिरहुत शिक्षक सीट पर भाजपा के नरेंद्र प्रसाद सिंह की जीत और दरभंगा में जन सुराज की सफलता ने दिखाया कि अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में राजनीतिक परिस्थितियां अलग परिणाम पैदा कर सकती हैं।
स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के परिणाम भी इस चुनाव के व्यापक राजनीतिक अर्थ को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं
स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के परिणाम भी इस चुनाव के व्यापक राजनीतिक अर्थ को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। पटना स्नातक सीट पर जदयू के नीरज कुमार, दरभंगा स्नातक सीट पर भाजपा के सर्वेश कुमार, कोसी स्नातक सीट पर भाजपा के डॉ. एनके यादव और तिरहुत स्नातक सीट पर निर्दलीय वंशीधर ब्रजवासी के नाम विजेता सूची में सामने आए। इन नतीजों ने यह भी स्पष्ट किया कि आठ सीटों के चुनाव में एक ही दल या एक ही राजनीतिक धारा का प्रभाव सभी क्षेत्रों में समान नहीं रहा। अलग-अलग सीटों पर प्रत्याशी की पहचान, स्थानीय समीकरण और मतदाताओं के साथ उसके संबंधों की भूमिका का अध्ययन जरूरी है।
मतदान के आंकड़े भी इस चुनाव की प्रकृति को समझने में मदद करते हैं
मतदान के आंकड़े भी इस चुनाव की प्रकृति को समझने में मदद करते हैं। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में 82.85 प्रतिशत और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में 53.42 प्रतिशत मतदान हुआ। शिक्षक सीटों पर अधिक मतदान दर्ज होना उल्लेखनीय है, लेकिन मतदान प्रतिशत अपने आप यह नहीं बताता कि किस दल, जाति या उम्मीदवार का मतदाता सबसे अधिक सक्रिय रहा। इसके लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के अलग-अलग आंकड़ों का अध्ययन जरूरी है। इसी तरह, वरीयता आधारित मतगणना इन चुनावों को सामान्य चुनावी मुकाबले से अलग बनाती है। पहली वरीयता के मतों में बढ़त हमेशा अंतिम जीत की गारंटी नहीं होती, आगे की वरीयताओं के मतों का हस्तांतरण भी परिणाम को प्रभावित कर सकता है।
इन परिणामों का एक दूसरा पहलू उम्मीदवार चयन से जुड़ा है
इन परिणामों का एक दूसरा पहलू उम्मीदवार चयन से जुड़ा है। राजनीतिक दल अक्सर जातीय समीकरण, संगठनात्मक मजबूती और राजनीतिक निष्ठा को ध्यान में रखकर प्रत्याशी तय करते हैं, लेकिन ऐसे चुनावों में मतदाताओं की व्यक्तिगत अपेक्षाएं भी महत्वपूर्ण हो सकती हैं। यदि मतदाताओं को लगता है कि उनका प्रतिनिधि उनसे दूर हो गया है या उनकी समस्याओं को पर्याप्त महत्व नहीं देता, तो चुनाव में इसका असर पड़ सकता है। हालांकि, किसी खास प्रत्याशी की हार का कारण केवल असंतोष या संगठनात्मक कमजोरी बताने के लिए ठोस क्षेत्रीय साक्ष्य आवश्यक हैं। चुनाव परिणाम सवाल जरूर खड़े करते हैं, लेकिन उन सवालों के उत्तर आंकड़ों और जमीनी पड़ताल से ही मिल सकते हैं।
बिहार की राजनीति में जाति एक महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक कारक बनी हुई है
बिहार की राजनीति में जाति एक महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक कारक बनी हुई है, लेकिन इन आठ सीटों के नतीजों को केवल जाति के चश्मे से देखना अधूरा विश्लेषण होगा। यहां पेशेवर पहचान, व्यक्तिगत संबंध, स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार की स्वीकार्यता, संगठनात्मक सक्रियता और मतगणना की पद्धति सभी को साथ रखकर देखना होगा। पांच भूमिहार, एक राजपूत, एक साहनी और एक यादव वाला जातीय आकलन यदि प्रमाणित होता है, तो वह परिणामों की सामाजिक संरचना को समझने का एक आधार जरूर बनेगा; लेकिन जीत के वास्तविक कारणों की पड़ताल के लिए यह जानना भी जरूरी होगा कि प्रत्येक उम्मीदवार को किस तरह का समर्थन मिला और मतों का अंतिम गणित कैसे बना।
8 सीटों के इन परिणामों ने बिहार की सियासत के सामने एक दिलचस्प सवाल छोड़ दिया है
आठ सीटों के इन परिणामों ने बिहार की सियासत के सामने एक दिलचस्प सवाल छोड़ दिया है। क्या अब चुनावी सफलता का रास्ता केवल जातीय समीकरण और पार्टी के प्रभाव से तय होगा, या मतदाताओं के बीच निरंतर मौजूदगी, स्थानीय मुद्दों पर काम और सूक्ष्म चुनावी प्रबंधन भी निर्णायक महत्व हासिल करेंगे? शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के ये नतीजे किसी एक राजनीतिक निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय इस बहस को और गंभीर बनाते हैं। इतना स्पष्ट है कि चुनाव को समझने के लिए जीतने वाले की जाति और पार्टी जान लेना पर्याप्त नहीं, यह भी जानना होगा कि उसने मतदाताओं का भरोसा कैसे हासिल किया।
पटना से अनूप नारायण सिंह की रिपोर्ट













