कोटे में कोटा, छिडा संग्राम, हम पार्टी ने मांगा तेजस्वी से राजद के शासनकाल का हिसाब
आरक्षण में संशोधन और कोटे में कोटा को लेकर राज्य में जारी हुआ राजनीतिक संग्राम फिलहाल थमता हुआ नजर नहीं आ रहा है। अब इसी क्रम में बिहार सरकार में मंत्री और हम पार्टी प्रमुख संतोष कुमार सुमन ने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव पर सीधा निशाना साधा है।

आरक्षण में संशोधन और कोटे में कोटा को लेकर राज्य में जारी हुआ राजनीतिक संग्राम फिलहाल थमता हुआ नजर नहीं आ रहा है। अब इसी क्रम में बिहार सरकार में मंत्री और हम पार्टी प्रमुख संतोष कुमार सुमन ने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव पर सीधा निशाना साधा है। उन्होंने कहा है कि तेजस्वी यादव ज्ञान देने से पहले अपने माता पिता के 15 वर्षों के शासन काल का हिसाब दें।
अपने आधिकारिक एक्स हैंडल पर पोस्ट करते हुए संतोष सुमन ने लिखा कि हमारा सवाल बिल्कुल स्पष्ट है और हमारा आह्वान भी उतना ही स्पष्ट है-आरक्षण रहेगा, मजबूत रहेगा और समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक उसका वास्तविक लाभ पहुंचेगा। इसके लिए दलितों के आरक्षण के भीतर सबसे वंचित समुदायों के लिए “कोटे में कोटा” की व्यवस्था पर गंभीरता से विचार और निर्णय होना चाहिए।
हम आरक्षण समाप्त करने की बात नहीं कर रहे हैं। हम किसी का अधिकार छीनने की बात नहीं कर रहे हैं। हम केवल यह पूछ रहे हैं कि आखिर आरक्षण का लाभ किन जातियों, किन परिवारों और समाज के किन तबकों तक पहुंच रहा है? क्या एक ही आरक्षित श्रेणी के भीतर कुछ अपेक्षाकृत सक्षम जातियां और परिवार लगातार आगे बढ़ रहे हैं, जबकि मांझी, डोम, नट, हलखोर और अन्य सबसे वंचित समुदाय आज भी अपने उचित हिस्से और वास्तविक भागीदारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं? इसलिए हमारा स्पष्ट आह्वान है- दलितों के आरक्षण के भीतर सबसे वंचितों के लिए कोटे में कोटा सुनिश्चित किया जाए। जो सबसे पीछे है, उसे आगे आने का विशेष अवसर मिलना ही वास्तविक सामाजिक न्याय है। सामाजिक न्याय का अर्थ केवल आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाना नहीं है; सामाजिक न्याय का अर्थ यह भी है कि उस आरक्षण का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
लेकिन जैसे ही समीक्षा और “कोटे में कोटा” की बात आती है, कुछ लोग हंगामा शुरू कर देते हैं-“आरक्षण खत्म हो जाएगा!” आखिर समीक्षा से इतना डर क्यों है? जो लोग आरक्षण के लाभ की वास्तविक स्थिति पर चर्चा तक नहीं होने देना चाहते, उन्हें समाज को जवाब देना होगा। तेजस्वी यादव, कठघरे में आप हैं। आप सवालों के जवाब दीजिए, खुद को जज बनाने की कोशिश मत कीजिए। सबसे पहले अपने माता-पिता के 15 वर्षों के शासन का हिसाब दीजिए। उस दौर में दलितों को क्या मिला? दलितों की सुरक्षा, सम्मान, शिक्षा, सरकारी नौकरियों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को मजबूत करने के लिए क्या स्थायी व्यवस्था बनाई गई? उस दौर में दलितों के खिलाफ हुई हिंसा और नरसंहार की घटनाओं पर भी आपकी राजनीति को जवाब देना होगा। और दलितों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने का श्रेय अपने परिवार को देने की कोशिश मत कीजिए। आरक्षित सीटों पर दलित उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने का अवसर आपकी या आपके परिवार की कृपा से नहीं मिला है। यह अवसर बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा दिए गए संविधान और आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था के कारण मिला है।
आरक्षित सीटों पर आपकी जाति या किसी अन्य गैर-अनुसूचित जाति के व्यक्ति के लिए चुनाव लड़ना संभव नहीं है। इसलिए वहां दलित उम्मीदवारों को टिकट देना आपकी महानता या कृपा नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था की अनिवार्यता है। इसे अपनी कृपा बताकर दलितों को भ्रमित करना बंद कीजिए और नकली मसीहा बनने की कोशिश मत कीजिए। अगर वास्तव में दलितों के प्रति इतनी ही प्रतिबद्धता है, तो जवाब दीजिए-सामान्य सीटों पर कितने दलितों को टिकट दिया? यादव बहुल क्षेत्रों से कितने दलित उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा? विधान परिषद में आपकी पार्टी ने कितने दलित नेताओं को भेजा? राज्यसभा में सबसे वंचित दलित समुदायों के कितने लोगों को प्रतिनिधित्व दिया? यहीं से आपकी राजनीति का असली हिसाब शुरू होता है।
राजद की राजनीति शुरू होने के बाद से बताइए कि आपकी पार्टी ने किस दलित नेता को राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर ऐसा राजनीतिक कद दिया, जो पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के बराबर बैठकर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान के साथ बात कर सके? आज राजद में तेजस्वी यादव के बराबर राजनीतिक हैसियत वाला कोई दलित चेहरा है तो बताइए। सवाल यह भी है कि अपनी जाति के नेताओं को चुनाव पर चुनाव हारने के बाद भी बार-बार टिकट देने की उदारता दलित नेताओं के मामले में कहां चली जाती है? अपनी जाति के नेताओं को लगातार राजनीतिक अवसर दिए जाते हैं, लेकिन दलित वर्ग के जीते हुए नेताओं के टिकट भी काट दिए जाते हैं। आखिर क्यों? क्या इसलिए कि उनका राजनीतिक कद बड़ा न हो जाए और वे स्वतंत्र नेतृत्व के रूप में उभर न जाएं?
आपके परिवार और आपकी पार्टी की राजनीति में अपनी जाति तथा अन्य प्रभावशाली समूहों के कई नेताओं को लगातार मंत्री पद और राजनीतिक जिम्मेदारियां मिलीं। लेकिन किसी दलित, अतिपिछड़े या अल्पसंख्यक नेता का नाम बताइए, जिसे उसी तरह लगातार अवसर, जिम्मेदारी और राजनीतिक कद दिया गया हो। दलितों को केवल वोट बैंक समझना आसान है, लेकिन दलित नेतृत्व को मजबूत करना मुश्किल।
असली सामाजिक न्याय का अर्थ केवल आरक्षित सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करना नहीं है। असली सामाजिक न्याय का अर्थ है कि दलितों को सामान्य सीटों से भी चुनाव लड़ाया जाए, राज्यसभा और विधान परिषद में भेजा जाए, उन्हें लगातार मंत्री बनाया जाए और सत्ता तथा संगठन में निर्णय लेने की बराबर की भागीदारी दी जाए। नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया को नई दिशा मिली। जीतन राम मांझी जी जैसे दलित नेतृत्व ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महादलितों के लिए विशेष नीतियों और संस्थागत व्यवस्थाओं के माध्यम से समाज के सबसे कमजोर तबके तक पहुंचने का प्रयास हुआ। पंचायती राज में महिलाओं, दलितों और अतिपिछड़ों की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। यही अंतर है-केवल आरक्षण बढ़ाने की बात करने और आरक्षण का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने की लड़ाई में।
हमारा संघर्ष किसी जाति या व्यक्ति के खिलाफ नहीं है। हमारा संघर्ष उस व्यवस्था के खिलाफ है जिसमें एक ही आरक्षित श्रेणी के भीतर भी कुछ लोग लगातार आगे बढ़ते जाते हैं और सबसे गरीब, सबसे कमजोर तथा अंतिम पायदान पर खड़े परिवार पीछे छूट जाते हैं। इसलिए हमारा संकल्प स्पष्ट है-आरक्षण रहेगा, आरक्षण मजबूत रहेगा और सबसे वंचितों के लिए कोटे में कोटा भी होगा।










