पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में आयुष्मान भारत योजना के तहत बड़े वित्तीय घोटाले का सनसनीखेज मामला सामने आया है। बिना इलाज के ही 45 लाख का बिल आया है। आयुष्मान भारत योजना के तहत इलाज में करीब 45 लाख रुपए की वित्तीय अनियमितता और गबन का मामला सामने आया है। इस बड़े घोटाले के बाद चार आउटसोर्सिंग कर्मियों के खिलाफ शास्त्री नगर थाना में प्राथमिकी दर्ज कराई गई है।
पटना के आईजीआईएमएस अस्पताल में जाली दस्तावेजों और नकली मेडिकल बिलों के जरिए धोखाधड़ी करने वाले चार आउटसोर्सिंग कर्मियों के खिलाफ केस दर्ज कर काम से हटा दिया गया। पिछले दो महीनों के रिकॉर्ड्स की जांच के दौरान अस्पताल प्रशासन को मरीजों के इलाज की दावा राशि में गड़बड़ी का पता चला। मामला सामने आने के बाद आईजीआईएमएस के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी प्रफुल्ल रंजन की लिखित शिकायत पर शास्त्री नगर थाने में नामजद प्राथमिकी दर्ज कराई गई है।
पटना के आईजीआईएमएस में सरकारी राशि की हेराफेरी का मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि मरीजों के इलाज और दवाओं के नाम पर फर्जी दस्तावेज तैयार कर बड़े पैमाने पर सरकारी राशि की हेराफेरी की गई है। आयुष्मान योजना के तहत इलाज कराने वाले मरीजों के नाम पर नकली मेडिकल बिल और फर्जी दवा संबंधी कागजात जमा किए गए थे। शुरुआती जांच में सामने आया कि सरकारी फंड की राशि को बढ़ा-चढ़ाकर दर्शाया गया और गलत तरीके से भुगतान लिया गया। मामला सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई करते हुए संबंधित कर्मियों को कार्य से हटा दिया है।
संस्थान के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी प्रफुल्ल रंजन ने अमरजीत राज, चंदन कुमार, साकेत कुमार और अभिषेक कुमार के खिलाफ FIR दर्ज कराई है। ये चारों कर्मी आयुष्मान भारत योजना से जुड़े कार्यों में तैनात थे और उन्हें आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से अस्पताल में नियुक्त किया गया था। अस्पताल प्रशासन का कहना है कि प्रारंभिक जांच में चार कर्मियों की सीधी संलिप्तता पाई गई है, जबकि अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। संस्थान के डिप्टी डायरेक्टर प्रो.(डॉ.) विभूति प्रसन्न सिन्हा ने बताया कि इस पूरे मामले में करीब 45 लाख रुपए के गबन की आशंका है। यह खेल पिछले 3-4 महीने से चल रहा था।
संस्थान के मीडिया प्रभारी डॉ. विभूति प्रसन्न सिन्हा ने बताया कि अस्पताल प्रबंधन को आयुष्मान योजना के तहत भुगतान प्रक्रिया में गड़बड़ी की शिकायत मिली थी। इसके बाद रिकॉर्ड की गहन जांच कराई गई। जांच समिति ने पाया कि कुछ मामलों में फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर सरकारी राशि निकाली गई। उन्होंने बताया कि गड़बड़ी पकड़े जाने के बाद संबंधित निजी आउटसोर्सिंग कंपनी ने तत्परता दिखाई है। कंपनी ने गबन की गई पूरी 45 लाख रुपये की राशि संस्थान के खाते में वापस जमा करा दी है। हालांकि, कानूनी कार्रवाई और पुलिस अनुसंधान जारी रहेगा।