आखिर बिहार में धार्मिक स्थलों की सुरक्षा किसके भरोसे? शीतला माता मंदिर से अशोक धाम तक भगदड़ ने खड़े किए गंभीर सवाल
बिहार में धार्मिक आस्था के बड़े केंद्रों पर उमड़ने वाली भीड़ अब बार-बार हादसों में बदल रही है, लेकिन सवाल वही है-आखिर धार्मिक स्थलों की सुरक्षा व्यवस्था किसके भरोसे है?

बिहार में धार्मिक आस्था के बड़े केंद्रों पर उमड़ने वाली भीड़ अब बार-बार हादसों में बदल रही है, लेकिन सवाल वही है-आखिर धार्मिक स्थलों की सुरक्षा व्यवस्था किसके भरोसे है? नालंदा के बिहारशरीफ स्थित शीतला माता मंदिर में हुई भगदड़ की घटना के बाद भी अगर कुछ ही महीनों में लखीसराय के प्रसिद्ध अशोकधाम मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ बेकाबू होकर जानलेवा स्थिति पैदा कर देती है, तो यह महज संयोग नहीं बल्कि भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर समीक्षा का विषय है।
31 मार्च 2026 को बिहारशरीफ के मघड़ा स्थित शीतला माता मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे थे। भीड़ के बीच अचानक भगदड़ मच गई और आठ श्रद्धालुओं की मौत की खबर सामने आई। हादसे के बाद मंदिर की व्यवस्था, भीड़ नियंत्रण और दर्शन की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठे। पुलिस ने मामले में चार पुजारियों को गिरफ्तार किया और 40 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की। जांच में यह भी सामने आया कि बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के बावजूद भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त और प्रभावी व्यवस्था नहीं थी।अब 17 अगस्त 2026 को लखीसराय के अशोकधाम मंदिर में सावन के सोमवार के मौके पर उमड़ी भारी भीड़ के बीच भगदड़ की घटना सामने आई है।
शुरुआती सूचनाओं के मुताबिक कई श्रद्धालुओं की मौत हुई है और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए हैं। घटना के कारणों को लेकर अलग-अलग जानकारियां सामने आ रही हैं-कहीं बिजली के तार या पोल से जुड़ी अफरा-तफरी की बात है तो कहीं बैरिकेडिंग टूटने और भीड़ के अचानक दबाव बढ़ने की। अंतिम कारण जांच के बाद ही स्पष्ट होगा, लेकिन इस घटना ने फिर वही पुराना सवाल सामने ला दिया है-जब यह मालूम है कि सावन के सोमवार को अशोकधाम में हजारों श्रद्धालु पहुंचेंगे, तो भीड़ को नियंत्रित करने की तैयारी कितनी थी?सबसे बड़ा सवाल यही है कि बिहार में धार्मिक आयोजनों की भीड़ को प्रशासन अब भी 'अचानक पैदा हुई स्थिति' क्यों मानता है?
सावन का सोमवार अचानक नहीं आता। नवरात्र, शिवरात्रि, चैत्र पूजा और दूसरे बड़े धार्मिक आयोजन भी कैलेंडर में पहले से दर्ज होते हैं। मंदिरों की लोकप्रियता, पिछले वर्षों की भीड़ और संभावित श्रद्धालुओं की संख्या का अनुमान भी लगाया जा सकता है। इसके बावजूद कई बार सुरक्षा व्यवस्था घटना के बाद दिखाई देती है। धार्मिक स्थल पर पुलिस की मौजूदगी केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए नहीं होनी चाहिए। वहां भीड़ की दिशा तय करना, प्रवेश और निकास अलग रखना, बैरिकेडिंग की मजबूती जांचना, आपातकालीन रास्ता खुला रखना, मेडिकल टीम और एंबुलेंस की तैनाती, सीसीटीवी से निगरानी और किसी भी अफवाह या अचानक पैदा हुई स्थिति से निपटने की योजना पहले से तैयार होनी चाहिए।
दूसरी तरफ मंदिर प्रबंधन की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। हजारों श्रद्धालुओं को आकर्षित करने वाले मंदिरों में सिर्फ पूजा और चढ़ावे की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। श्रद्धालुओं की सुरक्षित आवाजाही भी मंदिर प्रबंधन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। अगर कहीं वीआईपी दर्शन, पैसे देकर कतार से अलग दर्शन या अनियंत्रित प्रवेश जैसी व्यवस्थाएं हैं तो उनका सीधा असर भीड़ प्रबंधन पर पड़ता है।शीतला माता मंदिर की घटना में कार्रवाई और गिरफ्तारियां हुईं। लेकिन किसी हादसे के बाद एफआईआर और गिरफ्तारी से ज्यादा जरूरी यह है कि अगला हादसा रोकने की व्यवस्था क्या बदली?
अगर अशोकधाम जैसी दूसरी घटना सामने आ जाती है तो सरकार और प्रशासन को केवल घटना की जांच तक सीमित रहने के बजाय पूरे बिहार के प्रमुख धार्मिक स्थलों की सुरक्षा व्यवस्था का ऑडिट कराना चाहिए।हर बड़े धार्मिक स्थल के लिए यह तय होना चाहिए कि एक समय में परिसर में कितने श्रद्धालु सुरक्षित रूप से रह सकते हैं, कितने प्रवेश और निकास द्वार हैं, आपात स्थिति में भीड़ को किस दिशा में निकाला जाएगा और वहां कितने पुलिसकर्मी, स्वास्थ्यकर्मी तथा प्रशिक्षित स्वयंसेवक तैनात रहेंगे। क्योंकि भगदड़ में मौत अक्सर किसी एक व्यक्ति की गलती से नहीं होती। एक कमजोर बैरिकेड, एक संकरा रास्ता, एक अफवाह, एक गिरा हुआ श्रद्धालु और कुछ सेकंड की अफरा-तफरी मिलकर सैकड़ों जिंदगियों को खतरे में डाल सकती है।
श्रद्धालु भगवान के दर्शन करने मंदिर जाता है, अपनी जान जोखिम में डालने नहीं। आस्था लोगों को मंदिर तक पहुंचाती है, लेकिन उन्हें सुरक्षित घर वापस भेजने की जिम्मेदारी प्रशासन, पुलिस, मंदिर प्रबंधन और आयोजन से जुड़े सभी लोगों की है।शीतला माता मंदिर से अशोकधाम तक दो घटनाएं बिहार की धार्मिक सुरक्षा व्यवस्था के सामने एक बड़ा आईना हैं। अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि भगदड़ क्यों हुई, बल्कि यह भी है कि भगदड़ रोकने के लिए पहले से क्या किया गया था। आखिर कब तक धार्मिक स्थलों की सुरक्षा व्यवस्था भगवान भरोसे चलेगी?
अनूप नारायण सिंह











