13 साल से कोमा में पड़े हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट की अनुमति, एम्स में शुरू होगी पैसिव यूथेनेशिया की प्रक्रिया

13 साल से कोमा में पड़े हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट की अनुमति, एम्स में शुरू होगी पैसिव यूथेनेशिया की प्रक्रिया

13 साल से कोमा में पड़े हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट की अनुमति, एम्स में शुरू होगी पैसिव यूथेनेशिया की प्रक्रिया
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By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
: Mar 13, 2026, 3:09:00 PM

गाजियाबाद के निवासी हरीश राणा, जो पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन बिता रहे हैं, अब इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की प्रक्रिया से गुजरेंगे। सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मिलने के बाद उन्हें दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती कराया जाएगा, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम उनकी देखरेख में लाइफ सपोर्ट सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से हटाने की प्रक्रिया शुरू करेगी।

इस मामले में परिवार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करने वाले अधिवक्ता मनीष जैन ने बताया कि अदालत के निर्देश के अनुसार हरीश राणा को उनके घर से एम्स लाया जाएगा। अस्पताल में भर्ती होने के बाद डॉक्टरों का एक विशेष मेडिकल बोर्ड उनकी मौजूदा स्थिति का मूल्यांकन करेगा और तय दिशानिर्देशों के अनुसार आगे की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

चरणबद्ध तरीके से हटेंगे लाइफ सपोर्ट सिस्टम

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत हरीश राणा के शरीर में लगे सभी कृत्रिम जीवनरक्षक उपकरण धीरे-धीरे हटाए जाएंगे। इनमें गले में लगी श्वसन ट्यूब, पेट के जरिए पोषण देने वाली फीडिंग ट्यूब और यूरिन कैथेटर जैसे उपकरण शामिल हैं, जो फिलहाल उन्हें चिकित्सकीय रूप से जीवित रखने में मदद कर रहे हैं।

अधिवक्ता जैन के अनुसार, इन उपकरणों को हटाने के बाद मरीज को पूरी तरह प्राकृतिक अवस्था में रखा जाएगा, यानी शरीर को किसी भी कृत्रिम चिकित्सा सहायता के बिना रहने दिया जाएगा। इसके बाद शरीर की स्वाभाविक प्रक्रिया के आधार पर आगे की स्थिति तय होगी।

विशेषज्ञ डॉक्टरों की निगरानी में पूरी प्रक्रिया

यह पूरी प्रक्रिया एम्स के वरिष्ठ डॉक्टरों की टीम की निगरानी में की जाएगी। अस्पताल यह सुनिश्चित करेगा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सभी कानूनी और मेडिकल प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन हो। लाइफ सपोर्ट हटने के बाद मृत्यु कब होगी, इसका कोई निश्चित समय नहीं होता; यह मरीज की शारीरिक स्थिति और प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर निर्भर करता है। कई मामलों में यह तुरंत हो सकता है, जबकि कभी-कभी इसमें कुछ दिन भी लग सकते हैं।

गौरतलब है कि हरीश राणा पिछले करीब 13 साल से पूरी तरह अचेत हैं। वे न तो अपने शरीर को नियंत्रित कर सकते हैं और न ही किसी प्रकार की प्रतिक्रिया दे पाते हैं। ऐसी स्थिति में उनके माता-पिता ने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए उन्हें लंबे समय से चल रही पीड़ा से मुक्ति दिलाने की मांग की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाते हुए पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी। यह व्यवस्था उन मामलों में लागू होती है, जब किसी मरीज को लंबे समय तक कृत्रिम चिकित्सा उपकरणों के सहारे जीवित रखा जा रहा हो और उसके ठीक होने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी हो।

परिवार ने यह भी इच्छा व्यक्त की है कि यदि हरीश राणा के कुछ अंग प्रत्यारोपण के लिए उपयोगी हों, तो उन्हें दान किया जाए। हालांकि यह अंतिम निर्णय डॉक्टरों की जांच के बाद ही लिया जाएगा कि कौन-से अंग प्रत्यारोपण के योग्य हैं।

क्या है पूरा मामला

करीब 32 वर्षीय हरीश राणा वर्ष 2013 में पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान एक गंभीर हादसे का शिकार हो गए थे। बताया जाता है कि उन्हें पीजी हॉस्टल की चौथी मंजिल से धक्का देकर नीचे गिरा दिया गया था, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट आई। उस घटना के बाद से वे परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट में हैं और उनके पूरे शरीर में लकवे की स्थिति बनी हुई है।

मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक उन्हें 100 प्रतिशत क्वाड्रिप्लेजिया है। इतने वर्षों से उन्हें सर्जरी के जरिए लगाई गई PEG ट्यूब के माध्यम से पोषण दिया जा रहा था। लंबे समय से कोई सुधार न होने के कारण उनके माता-पिता ने अदालत से पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति मांगी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट और परिवार की सहमति के आधार पर 2018 के ऐतिहासिक ‘कॉमन कॉज’ फैसले में तय दिशानिर्देशों के तहत इस अनुमति को मंजूरी दी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला देश में इच्छामृत्यु से जुड़े महत्वपूर्ण उदाहरणों में शामिल हो सकता है, जहां मरीज को कानूनी और चिकित्सकीय प्रक्रिया के तहत गरिमापूर्ण अंत देने की पहल की जा रही है।