'कहे तोसे सजना… तोहरी सजनिया' से छठ के घाटों तक, शारदा सिन्हा की आवाज में धड़कता है आज भी पूरा पूर्वांचल

छठ का मौसम हो, डूबते सूरज को अर्घ्य देने की बेला हो, घाटों पर जलते दीप हों और हवा में कहीं दूर से शारदा सिन्हा की आवाज तैरती हुई कानों तक पहुंच जाए… तो यकीन मानिए, आंखें नम होने में देर नहीं लगती।

'कहे तोसे सजना… तोहरी सजनिया' से छठ के घाटों तक, शारदा सिन्हा की आवाज में धड़कता है आज भी पूरा पूर्वांचल

पटना : छठ का मौसम हो, डूबते सूरज को अर्घ्य देने की बेला हो, घाटों पर जलते दीप हों और हवा में कहीं दूर से शारदा सिन्हा की आवाज तैरती हुई कानों तक पहुंच जाए… तो यकीन मानिए, आंखें नम होने में देर नहीं लगती। लगता है जैसे कोई अपने गांव की पगडंडी से होता हुआ सीधे बचपन के आंगन में पहुंच गया हो। मां की साड़ी का आंचल, मिट्टी के चूल्हे की महक, घर लौटते परदेसियों की आहट और छठी मइया के सामने हाथ जोड़े खड़ा पूरा परिवार… सब कुछ एक साथ आंखों के सामने उतर आता है।

शारदा सिन्हा सिर्फ गाती नहीं थीं, वह बिहार की मिट्टी को आवाज देती थीं

शारदा सिन्हा सिर्फ गाती नहीं थीं, वह बिहार की मिट्टी को आवाज देती थीं। उनकी आवाज में गांव की सादगी थी, लोकजीवन की मिठास थी, विरह की पीड़ा थी और उस मां की ममता थी, जो अपने बेटे के परदेस से लौटने का इंतजार करती है। यही वजह है कि जब उनके छठ गीत बजते हैं, तो कदम अपने आप ठहर जाते हैं। बाजार की भागदौड़ हो या महानगरों की चकाचौंध, शारदा सिन्हा की आवाज सुनते ही बिहार और पूर्वांचल के लोगों का मन अपने गांव की ओर लौटने लगता है। आज शारदा सिन्हा हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज आज भी जिंदा है। वह हर साल छठ के साथ लौटती हैं, हर आंगन में गूंजती हैं और हर उस दिल को छू जाती हैं, जिसके भीतर बिहार अब भी बसता है।

महुआ चुनने से संगीत के शिखर तक का सफर

शारदा सिन्हा की कहानी सिर्फ सफलता की कहानी नहीं है। यह उस साधना की कहानी है, जिसमें मिट्टी से उठी एक आवाज ने पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाई। उनका बचपन गांव के परिवेश में बीता। लोकजीवन, लोकगीत और ग्रामीण संस्कृति उनके भीतर धीरे-धीरे रचते-बसते गए। महुआ चुनने जैसे ग्रामीण जीवन के अनुभवों से लेकर संगीत की साधना तक, उनकी यात्रा उस मिट्टी से जुड़ी रही, जिसे उन्होंने कभी खुद से अलग नहीं होने दिया।

शारदा सिन्हा ने लोकसंगीत को महज मनोरंजन नहीं माना

उन्होंने लोकसंगीत को महज मनोरंजन नहीं माना। उनके लिए लोकगीत अपनी संस्कृति, अपनी भाषा और अपनी जड़ों को बचाए रखने का माध्यम थे। मैथिली, भोजपुरी और मगही की मिठास से सजी उनकी गायकी ने लोकगीतों को घर-घर पहुंचाया। उनकी आवाज में बनावट नहीं थी, उसमें जीवन था। उसमें गांव की वह सच्चाई थी, जिसे सुनकर लगता था कि यह गीत किसी कलाकार ने नहीं, हमारे अपने घर की किसी महिला ने गाया है। शारदा सिन्हा ने साबित किया कि लोकसंगीत किसी बड़ी इमारत का मोहताज नहीं होता। उसकी असली ताकत लोगों के दिलों में होती है। जब सुर सच्चे हों और आवाज में अपनी मिट्टी की खुशबू हो, तो वह सीमाओं को पार कर जाती है।

'कहे तोसे सजना' और बॉलीवुड में एक अलग पहचान

शारदा सिन्हा की आवाज बिहार के लोकजीवन में पहले ही अपनी जगह बना चुकी थी, लेकिन हिंदी सिनेमा के दर्शकों तक उनकी पहचान को व्यापक बनाने में सूरज बड़जात्या की फिल्म मैंने प्यार किया के गीत 'कहे तोसे सजना, तोहरी सजनिया' की बड़ी भूमिका रही। इस गीत ने देशभर के श्रोताओं को उनकी आवाज की मिठास से परिचित कराया। बॉलीवुड में जहां चमक-दमक और आधुनिक संगीत का अपना संसार था। सिन्हा अपनी लोकगायकी की सहजता लेकर पहुंचीं। उनकी आवाज में एक ऐसी घरेलू आत्मीयता थी, जो सीधे दिल में उतर जाती थी। वहीं शारदा सिन्हा अपनी लोकगायकी की सहजता लेकर पहुंचीं। उनकी आवाज में एक ऐसी घरेलू आत्मीयता थी, जो सीधे दिल में उतर जाती थी। उन्होंने किसी दूसरी गायकी की नकल नहीं की। वह अपनी मिट्टी, अपनी बोली और अपनी पहचान के साथ गाईं और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। एक तरफ फिल्मों के गीतों से उन्हें व्यापक पहचान मिली, तो दूसरी तरफ उनके लोकगीतों ने उन्हें लोगों के जीवन का हिस्सा बना दिया। फिल्मों में उनकी आवाज सुनकर लोग उन्हें पहचानने लगे, लेकिन छठ के गीतों ने उन्हें अपने परिवार का सदस्य बना दिया।

छठ गीत बने इतिहास, आवाज बनी आस्था का हिस्सा

शारदा सिन्हा के छठ गीतों की लोकप्रियता को केवल संगीत की सफलता से नहीं समझा जा सकता। इन गीतों में बिहार की आस्था, परिवार की एकजुटता और लोकपरंपरा की आत्मा बसती है। उनके गीत बजते हैं तो ऐसा लगता है मानो घर की कोई बुजुर्ग महिला पूरे परिवार को छठ की तैयारी के लिए पुकार रही हो। परदेस में रहने वाला बिहारी जब छठ के दिनों में उनकी आवाज सुनता है, तो उसे अपने घर की याद सताने लगती है। किसी को अपनी मां याद आती है, किसी को गांव का तालाब, किसी को बांस की टोकरी में सजाए फल और ठेकुआ, तो किसी को वह घाट याद आता है जहां पूरा परिवार एक साथ खड़ा होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देता था। शारदा सिन्हा ने इन भावनाओं को सुर दिए। उनके गीतों ने छठ को केवल एक धार्मिक पर्व के रूप में नहीं, बल्कि घर-परिवार, रिश्तों और अपनी जड़ों से जुड़े रहने के उत्सव के रूप में भी महसूस कराया। उनकी आवाज की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उसे सुनने के लिए किसी परिचय की जरूरत नहीं पड़ती। गीत शुरू होते ही मन पहचान लेता है कि यह शारदा सिन्हा हैं। और फिर कुछ पल के लिए दुनिया की सारी हलचल पीछे छूट जाती है।

जब पद्मश्री से सम्मानित गायिका का पुरस्कार ही ट्रेन में चोरी हो गया

शारदा सिन्हा की जिंदगी से जुड़ा एक किस्सा अक्सर लोगों को हैरान कर देता है। बताया जाता है कि जब उन्हें पहली बार पद्मश्री सम्मान मिला और वह दिल्ली से पुरस्कार लेकर पटना लौट रही थीं, तब ट्रेन में उनका पद्मश्री पुरस्कार चोरी हो गया। जिस सम्मान तक पहुंचने के लिए एक कलाकार जीवनभर साधना करता है, वही सम्मान यात्रा के दौरान चोरी हो जाए, तो यह घटना किसी को भी भीतर तक झकझोर सकती है। इस प्रसंग को शारदा सिन्हा की जिंदगी के उन अनोखे किस्सों में याद किया जाता है, जो बताते हैं कि बड़े सम्मान मिलने के बावजूद किसी कलाकार का जीवन किस तरह सामान्य यात्राओं, परेशानियों और अप्रत्याशित घटनाओं से जुड़ा रहता है।

शारदा सिन्हा को उनके संगीत योगदान के लिए कई राष्ट्रीय पुरस्कार मिले

हालांकि, इस घटना के विवरण की स्वतंत्र पुष्टि के बिना इसे उनके जीवन का प्रमाणित तथ्य मानने के बजाय प्रचलित किस्से के रूप में ही देखना उचित होगा। शारदा सिन्हा को उनके संगीत योगदान के लिए पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। ये सम्मान उनकी उपलब्धियों का प्रमाण हैं, लेकिन सच तो यह है कि जनता ने उन्हें जो स्थान दिया, वह किसी पुरस्कार से कहीं बड़ा है।

पान की शौकीन, सादगी की मिसाल

शारदा सिन्हा के व्यक्तित्व में एक सहज घरेलूपन था। उनके बारे में पान खाने के शौक का भी जिक्र होता रहा है। उनकी छवि किसी दूर बैठी हुई, पहुंच से बाहर रहने वाली बड़ी कलाकार की नहीं थी। वह अपनी बोली, अपनी संस्कृति और अपनी जमीन से जुड़ी हुई ऐसी शख्सियत थीं, जिनकी आवाज सुनकर अपनापन महसूस होता था। उनकी गायकी में वही सादगी दिखाई देती थी। वह सुरों से चमत्कार दिखाने के बजाय भावनाओं को आवाज देती थीं। यही कारण था कि उनके गीतों में शब्दों का अर्थ ही नहीं, उनके पीछे छिपा दर्द और प्रेम भी सुनाई देता था। लोकगीतों में अक्सर मां-बेटे का रिश्ता, पति-पत्नी का प्रेम, बेटी की विदाई, परदेस गए प्रियजन का इंतजार और परिवार की खुशियां होती हैं। शारदा सिन्हा इन भावनाओं को इस तरह गाती थीं कि सुनने वाला अपने जीवन की कोई न कोई स्मृति उनमें खोज लेता था।

शारदा सिन्हा नहीं रहीं, लेकिन बिहार की आवाज कैसे खामोश होगी?

कुछ आवाजें शरीर के साथ विदा नहीं होतीं। वे समय के पार चली जाती हैं। शारदा सिन्हा उन्हीं आवाजों में से एक हैं। उनका जाना संगीत की दुनिया के लिए एक बड़ी क्षति था, लेकिन उनकी गायकी ने समय को जैसे अपनी मुट्ठी में बांध लिया है। आज भी छठ की तैयारी शुरू होते ही उनके गीत याद आने लगते हैं। रेडियो, मोबाइल, टेलीविजन या किसी गांव की गली में बजता उनका गीत लोगों को एक ही भाव में बांध देता है। 

'उनके सुरों में वह बिहार है, जो अपनी भाषा पर गर्व करता है'

वहीं उनके सुरों में वह बिहार है, जो अपनी भाषा पर गर्व करता है, अपनी परंपराओं से प्रेम करता है और आधुनिकता के बीच भी अपनी जड़ों को नहीं भूलता। शारदा सिन्हा की सबसे बड़ी विरासत उनके पुरस्कार नहीं, बल्कि वह भावनात्मक रिश्ता है, जो उन्होंने करोड़ों लोगों के साथ बनाया। उनकी आवाज सुनकर आज भी किसी को अपनी मां की याद आती है, किसी को अपना गांव याद आता है और किसी को वह बचपन याद आता है, जिसमें छठ के गीतों के बीच पूरा परिवार एक साथ हुआ करता था।

शारदा सिन्हा चली गईं, लेकिन उनके गीतों में बिहार आज भी सांस लेता है

जबतक छठ के घाट सजेंगे, जब तक कोई मां अपने परिवार की सुख-समृद्धि के लिए सूर्यदेव को अर्घ्य देगी, जब तक परदेस में बैठा कोई बिहारी अपने गांव को याद करेगा, तब तक शारदा सिन्हा की आवाज गूंजती रहेगी। क्योंकि कुछ कलाकार गीत गाते हैं, कुछ इतिहास रचते हैं। और कुछ ऐसे होते हैं, जो अपनी आवाज को लोगों की स्मृतियों, आस्थाओं और भावनाओं में हमेशा के लिए बसा देते हैं। शारदा सिन्हा ऐसी ही आवाज थीं बिहार की बेटी, लोकसंगीत की साधिका और करोड़ों दिलों में बसने वाली वह धुन, जो कभी खामोश नहीं होगी।

अनूप नारायण सिंह की रिपोर्ट

Trending News

CM सम्राट चौधरी का आज पटना में व्यस्त कार्यक्रम, PMCH के टावर-3 का उद्घाटन, शाम 4 बजे कैबिनेट की बैठक
CM सम्राट चौधरी का आज पटना में व्यस्त कार्यक्रम, PMCH के टावर-3 का उद्घाटन, शाम 4 बजे कैबिनेट की बैठक
Oct 12, 2026, 12:48:00 PM
गोपालगंज में रिश्तों का खून: जिस नानी ने चलना सिखाया, नाती ने उसी की चाकू से गला काट ले ली जान
गोपालगंज में रिश्तों का खून: जिस नानी ने चलना सिखाया, नाती ने उसी की चाकू से गला काट ले ली जान
Oct 12, 2026, 12:28:00 PM
 'मोदी को जनता कभी माफ नहीं करेगी', RJD बोली-चार दिन बाद प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग की जाएगी
'मोदी को जनता कभी माफ नहीं करेगी', RJD बोली-चार दिन बाद प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग की जाएगी
Oct 12, 2026, 11:43:00 AM
उमराह यात्रियों का जत्था हुआ रवाना, लोगों ने फूल-माला व गले लगाकर किया गया रवाना
उमराह यात्रियों का जत्था हुआ रवाना, लोगों ने फूल-माला व गले लगाकर किया गया रवाना
Oct 12, 2026, 11:39:00 AM
रांची-पटना मार्ग पर चुटूपालू घाटी में भीषण सड़क हादसा, कंटेनर की चपेट में आई बोलेनो, तीन की मौत
रांची-पटना मार्ग पर चुटूपालू घाटी में भीषण सड़क हादसा, कंटेनर की चपेट में आई बोलेनो, तीन की मौत
Oct 12, 2026, 11:20:00 AM
लंबित मांगों को लेकर आज से राज्यव्यापी आंदोलन शुरू करेंगे डॉक्टर
लंबित मांगों को लेकर आज से राज्यव्यापी आंदोलन शुरू करेंगे डॉक्टर
Oct 12, 2026, 11:03:00 AM
दर्शकों के लिए खुला प्रवीण सेवा संस्थान का दुर्गा पूजा पंडाल, उमड़ी भीड़, मंत्री श्रेयसी ने किया उद्घाटन
दर्शकों के लिए खुला प्रवीण सेवा संस्थान का दुर्गा पूजा पंडाल, उमड़ी भीड़, मंत्री श्रेयसी ने किया उद्घाटन
Oct 12, 2026, 10:55:00 AM
'कहे तोसे सजना… तोहरी सजनिया' से छठ के घाटों तक, शारदा सिन्हा की आवाज में धड़कता है आज भी पूरा पूर्वांचल
'कहे तोसे सजना… तोहरी सजनिया' से छठ के घाटों तक, शारदा सिन्हा की आवाज में धड़कता है आज भी पूरा पूर्वांचल
Oct 12, 2026, 10:21:00 AM
शेयर बाजार में तूफानी शुरुआत, सेंसेक्स व निफ्टी में उछाल के बाद गिरावट
शेयर बाजार में तूफानी शुरुआत, सेंसेक्स व निफ्टी में उछाल के बाद गिरावट
Oct 12, 2026, 9:58:00 AM
फिर चली तबादला एक्सप्रेस, 2 IPS समेत 29 पुलिस अधिकारियों का फेरबदल, कई जिलों के SDPO भी बदले
फिर चली तबादला एक्सप्रेस, 2 IPS समेत 29 पुलिस अधिकारियों का फेरबदल, कई जिलों के SDPO भी बदले
Oct 12, 2026, 9:38:00 AM