RMC में नक्शा पास कराने का 'सिंडिकेट'! एक प्लॉट, दो मंजूरी पर बवाल
RMC में नक्शा पास कराने का 'सिंडिकेट'! एक प्लॉट, दो मंजूरी पर बवाल
रांची नगर निगम के टाउन प्लानिंग सेक्शन की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। राजधानी के कडरू स्थित न्यू एजी को-ऑपरेटिव कॉलोनी में एक ही भूखंड से जुड़े दो अलग-अलग भवन मानचित्रों (बिल्डिंग प्लान) को कुछ ही महीनों के अंतराल पर स्वीकृति मिलने के बाद पूरे मामले ने तूल पकड़ लिया है। आरोप है कि इस प्रक्रिया में वार्ड संख्या बदलकर दोबारा नक्शा पास कराया गया, जिससे नगर निगम की ऑनलाइन स्वीकृति प्रणाली और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
मामले में एजी को-ऑपरेटिव सोसाइटी के सचिव आशुतोष गिरी और भाजपा महानगर से जुड़े नेता रोशन शर्मा के नाम चर्चा में हैं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि भवन मानचित्र स्वीकृत कराने की प्रक्रिया में प्रभावशाली लोगों और कथित सिंडिकेट की भूमिका रही। यह भी कहा जा रहा है कि सोसाइटी से जुड़े पुराने विवादों के बाद अब नए सिरे से इसी तरह की गतिविधियों को आगे बढ़ाया जा रहा है। हालांकि इन आरोपों पर संबंधित पक्षों की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
जानकारी के अनुसार, न्यू एजी कॉलोनी के एक ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट का मानचित्र संख्या-215 मार्च 2026 में वार्ड संख्या-25 के तहत स्वीकृत हुआ था। इसके लगभग तीन महीने बाद जून में उसी भूखंड और उसी बिल्डर के नाम से दूसरा ग्रुप हाउसिंग मानचित्र स्वीकृत कर दिया गया। इस बार दस्तावेजों में वार्ड संख्या 26 दर्ज थी। दोनों मामलों में होल्डिंग नंबर 0290005538000A2, प्लॉट संख्या 65 तथा न्यू एजी को-ऑपरेटिव कॉलोनी, कडरू का विवरण समान बताया जा रहा है।
दस्तावेजों की पड़ताल में यह भी सामने आया है कि मार्च में स्वीकृत मानचित्र की भुगतान रसीद में वार्ड संख्या 25 दर्ज थी, जबकि जून में जारी स्वीकृति में उसी संपत्ति को वार्ड 26 के अंतर्गत दिखाया गया। इसी विसंगति ने पूरे मामले को विवाद का रूप दे दिया है।
इस भूखंड की प्रकृति को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि संबंधित जमीन छोटानागपुर काश्तकारी (CNT) अधिनियम के दायरे में आती है, जबकि मानचित्र स्वीकृति की प्रक्रिया में इसे सामान्य श्रेणी की भूमि के रूप में दर्शाया गया। आरोप यह भी है कि यदि पुराने राजस्व अभिलेखों और स्वतंत्रता-पूर्व के दस्तावेजों की जांच कराई जाए तो वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
मामले को लेकर केवल मौखिक आपत्तियां ही नहीं उठाई गईं, बल्कि औपचारिक शिकायतें भी की गईं। आर्किटेक्ट सुजीत भगत ने नगर आयुक्त को पत्र लिखकर कथित अनियमितताओं की ओर ध्यान आकर्षित किया। वहीं आरटीआई कार्यकर्ता रौनक राज ने भी नगर विकास विभाग को लिखित शिकायत भेजकर भवन मानचित्र स्वीकृति प्रक्रिया में संभावित गड़बड़ियों की जांच की मांग की है।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब भवन निर्माण स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन होने का दावा किया जाता है। इसके बावजूद यदि एक ही संपत्ति से जुड़े रिकॉर्ड में वार्ड और भूमि की श्रेणी जैसी मूलभूत जानकारियों में अंतर पाया जाता है, तो इससे पूरी प्रणाली की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि रांची के लिए वर्ष 2015 में 2012-2037 अवधि का मास्टर प्लान तैयार किया गया था, लेकिन अब तक उसका जोनल प्लान लागू नहीं हो सका। नियमानुसार समय-समय पर भूमि उपयोग और विकास योजनाओं की समीक्षा होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं होने से भवन निर्माण और भूमि उपयोग से जुड़े विवाद लगातार बढ़ते रहे हैं। इसी कारण बड़ी संख्या में भवनों की वैधता पर भी प्रश्न उठते रहे हैं।
नगर निगम के अधिकारियों ने संकेत दिया है कि यदि भवन मानचित्र स्वीकृति प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनियमितता या नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच कराई जाएगी। अब निगाहें इस बात पर हैं कि शिकायतों के आधार पर जांच किस स्तर तक पहुंचती है और यदि गड़बड़ियां साबित होती हैं तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है।
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