सलवार उतारना, सीना दबाने की कोशिश रेप नहीं, पटना HC के फैसले पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, CJI सूर्यकांत क्या बोले...
पटना हाई कोर्ट के एक विवादित फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई है। पटना हाई कोर्ट के एक हालिया फैसले, जिसमें कहा गया था कि महिला की सलवार उतारने की कोशिश करना या उसकी छाती दबाना बलात्कार का प्रयास नहीं है।
पटना हाई कोर्ट के एक विवादित फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई है। पटना हाई कोर्ट के एक हालिया फैसले, जिसमें कहा गया था कि महिला की सलवार उतारने की कोशिश करना या उसकी छाती दबाना बलात्कार का प्रयास नहीं है। इस विवादित फैसले पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने बेहद सख़्त टिप्पणी की है और कड़ी आपत्ति जताई है। शीर्ष अदालत ने सख्त नसीहत देते हुए कहा है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में कलम चलाने से पहले पूरी रिसर्च और संजीदगी का होना लाजमी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने न्यायिक संवेदनशीलता की रिपोर्ट सभी हाई कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड करने का निर्देश दिया है।
पटना हाई कोर्ट के विवादित फैसले पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि जजों को फैसले देने से पहले कुछ रिसर्च करनी चाहिए। चीफ जस्टिस ने कहा कि महिलाओं से जुड़े मामलों में जजों को संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। अदालतों को लैंगिक अपराधों के मामलों में ऐसी टिप्पणियां करने से बचना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि यौन अपराधों से जुड़ी इस रिपोर्ट को सभी उच्च न्यायालयों की वेबसाइट पर तुरंत अपलोड किया जाए।
बीते साल मार्च में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी ऐसा ही एक फैसला सुनाया था। तब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि नाबालिग लड़की का पायजामा खोलना और उसकी छाती दबाना रेप का प्रयास नहीं है। सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता ने कोर्ट को बताया कि बीते साल मार्च में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी नाबालिग का पायजामा खोलने' के मामले में ऐसी ही ओछी टिप्पणी की थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (सुओ मोटो) लिया था।
यह पूरा विवाद पटना हाई कोर्ट के जज पूर्णेंदु सिंह के 9 जुलाई के फैसले से शुरू हुआ। उन्होंने बलात्कार के प्रयास के एक मामले में आरोपी की सजा को रद्द कर दिया था। पूरा मामला बांका ज़िले के अमरपुर (2008) के एक वाकये से जुड़ा है, जहां एक स्टूडियो संचालक पर युवती को बंधक बनाने, उसकी छाती दबाने और सलवार उतारने की कोशिश करने का संगीन आरोप था। कोर्ट ने कहा कि महिला की सलवार उतारने का प्रयास करना और छाती दबाना सिर्फ उसकी शालीनता भंग करने का अपराध है। इसे कानूनन बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट का तर्क था कि मेडिकल साक्ष्य की कमी और प्रत्यक्ष कृत्य के अभाव में यह कृत्य महज़ आईपीसी की धारा 354 के तहत महिला की लज्जा भंग करने का अपराध (अपराध की तैयारी) है, इसे कानूनी तौर पर दुष्कर्म का वास्तविक प्रयास नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट के इस तल्ख़ और तकनीकी फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख़ अपनाया है। शीर्ष अदालत ने पटना हाईकोर्ट और इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दी गई ऐसी ही असंवेदनशील दलीलों को सिरे से नकार दिया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि किसी महिला की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ इस हद तक जाना सिर्फ़ तैयारी नहीं, बल्कि सीधे तौर पर रेप की कोशिश ही माना जाएगा।
बता दें कि बांका ज़िले के अमरपुर (2008) के एक वाकये से जुड़ा है, जहां एक स्टूडियो संचालक पर युवती को बंधक बनाने, उसकी छाती दबाने और सलवार उतारने की कोशिश करने का संगीन आरोप था। पीड़िता अपने पिता के साथ बांका जिले के अमरपुर में एक फोटोग्राफी स्टूडियो गई थी। आरोप के मुताबिक, स्टूडियो मालिक ने युवती की तस्वीर लेने के बाद उसके पिता को बाहर भेज दिया। उसने कंप्यूटर पर फोटो देखने के बहाने पिता को बाहर इंतजार करने के लिए कहा था। इसके बाद आरोपी ने अंदर से स्टूडियो का दरवाजा बंद कर दिया। उसने बलात्कार की नीयत से पीड़िता की छाती दबाई और उसकी सलवार उतारने की कोशिश की। युवती की चीखें सुनकर जब उसके पिता दरवाजे की तरफ भागे, तब आरोपी वहां से फरार हो गया था। इसी मामले में पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह की पीठ ने निचली अदालत का फैसला पलटते हुए आरोपी को बरी कर दिया था।
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