झारखंड में JSSC CGL परीक्षा को लेकर विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। परीक्षा में कथित पेपर लीक और अनियमितताओं की जांच CBI से कराने की मांग को पूर्व महाधिवक्ता अजीत कुमार ने भी समर्थन दिया है। उन्होंने कहा कि मामले की केस डायरी में दर्ज तथ्यों के बावजूद परीक्षा को लेकर सरकार की ओर से स्पष्ट निर्णय नहीं लिया जाना गंभीर सवाल खड़े करता है।
अजीत कुमार के मुताबिक, झारखंड हाईकोर्ट ने मामले की जांच छह महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया था। उनके अनुसार, निर्धारित अवधि जून में समाप्त हो चुकी है और जांच की समयसीमा बढ़ाने के लिए अब तक अदालत में कोई शपथपत्र दाखिल नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि छात्र इस आधार पर अवमानना की कार्रवाई की तैयारी में थे, लेकिन फिलहाल उन्हें ऐसा करने से रोका गया है।
पूर्व महाधिवक्ता ने कहा कि सरकार परीक्षा रद्द करने के मामले में न्यायालय के आदेश का हवाला दे रही है, जबकि उनके अनुसार अदालत ने जांच पूरी होने के बाद सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की संभावना खुली रखी थी।
अजीत कुमार ने कहा कि वर्ष 2023 में आयोजित CGL परीक्षा को भी पेपर लीक की खबरों के बाद रद्द किया गया था। इसके बाद 2024 में दोबारा परीक्षा आयोजित हुई। उनका दावा है कि इस बार भी परीक्षा से पहले प्रश्नों के उत्तर उपलब्ध होने की शिकायत सामने आई।
उन्होंने बताया कि जांच के दौरान ऐसे दस्तावेज और बयान सामने आए, जिनसे परीक्षा से पहले अभ्यर्थियों को उत्तर याद कराने का आरोप सामने आया। उनके मुताबिक, नेपाल में एक कैंप लगाए जाने और अभ्यर्थियों को प्रश्नों के उत्तर तैयार कराने की बात जांच के दौरान सामने आई थी। बाद में बंगाल के नयामतपुर में भी इसी तरह की गतिविधि का आरोप लगाया गया।
पूर्व महाधिवक्ता ने केस डायरी में दर्ज जानकारी का उल्लेख करते हुए दावा किया कि एक व्यक्ति द्वारा 28 अभ्यर्थियों को पटना के रास्ते नेपाल ले जाने की बात सामने आई। उन्होंने करीब 8 लाख रुपये के लेनदेन और औरंगाबाद के एक बैंक खाते में राशि भेजे जाने का भी जिक्र किया।
उनके अनुसार, परीक्षा के 135 प्रश्नों में से 120 के उत्तर कथित तौर पर पहले से उपलब्ध कराए गए उत्तरों से मेल खाने की बात जांच में दर्ज है। अजीत कुमार का कहना है कि छात्रों ने CID को कई साक्ष्य उपलब्ध कराए थे, जिनसे परीक्षा में अनियमितता की आशंका मजबूत होती थी।
अजीत कुमार ने आरोप लगाया कि अदालत में दाखिल हलफनामे में उपलब्ध साक्ष्यों को सही तरीके से सामने नहीं रखा गया। उनके अनुसार, CID और राज्य सरकार की ओर से बरामद दस्तावेजों को ‘गेस पेपर’ बताया गया और यह तर्क दिया गया कि अभ्यर्थियों ने स्वयं संभावित प्रश्नों के उत्तर तैयार किए थे।
उन्होंने कहा कि इसी आधार पर अदालत ने बड़े पैमाने पर पेपर लीक की पुष्टि नहीं होने की स्थिति में परिणाम पर लगी रोक हटा दी थी। पूर्व महाधिवक्ता का दावा है कि केस डायरी में दर्ज तथ्यों और अदालत के समक्ष रखी गई जानकारी के बीच अंतर को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अजीत कुमार ने कहा कि यदि जांच में परीक्षा से पहले प्रश्नों या उत्तरों के उपलब्ध होने की पुष्टि होती है, तो परीक्षा की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए CBI जांच की मांग का समर्थन किया।
उन्होंने JSSC और JPSC की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए और कहा कि भर्ती परीक्षाओं से जुड़े नियमों और प्रक्रियाओं में स्पष्टता जरूरी है। इसी संदर्भ में उन्होंने सहायक आचार्य नियुक्ति से जुड़े विवाद का उदाहरण देते हुए कहा कि भर्ती प्रक्रिया में नियमों को लेकर पैदा होने वाली विसंगतियों का सीधा असर अभ्यर्थियों पर पड़ता है।
उनके मुताबिक, B.Ed की अवधि और पात्रता से जुड़े प्रावधानों को लेकर भी झारखंड में विवाद सामने आया है। उन्होंने आरोप लगाया कि नियुक्ति प्रक्रिया में ऐसी शर्तें रखी गईं, जिनसे अभ्यर्थियों के एक वर्ग के आवेदन करने पर ही सवाल खड़े हो गए। पूर्व महाधिवक्ता ने सरकार से भर्ती परीक्षाओं और नियुक्ति प्रक्रियाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की।