केरेडारी। कोयला निकला,भारी वाहन दौड़े और प्रभावित गांवों की सड़कें गड्ढों में तब्दील होती चली गईं। केरेडारी कोल माइंस से कोयला परिवहन में लगी नकाश कंपनी की कार्यप्रणाली को लेकर अब चट्टीबारियातु, जोरदाग और पेटो के ग्रामीणों का गुस्सा खुलकर सामने आने लगा है।
ग्रामीणों का आरोप है कि कंपनी कोयला ढुलाई के नाम पर लगातार भारी वाहनों का परिचालन कर रही है, लेकिन जिस सड़क से रोजाना सैकड़ों वाहन गुजर रहे हैं, उसकी हालत पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। जगह-जगह बड़े-बड़े गड्ढे, धूल का गुबार और लगातार लगने वाले जाम ने ग्रामीणों की परेशानी बढ़ा दी है।सबसे बड़ा सवाल-क्या नियम सिर्फ कागजों पर हैं।
कोयला परिवहन में लगे कुछ भारी वाहनों के चालकों को लेकर ग्रामीणों ने नाबालिग और बगैर वैध लाइसेंस के वाहन चलाने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इसकी सूचना एनटीपीसी के जिम्मेदार अधिकारियों तक भी पहुंचाई गई, बावजूद इसके प्रभावी कार्रवाई नजर नहीं आ रही। अगर शिकायतें गलत हैं तो जांच कर उन्हें खारिज क्यों नहीं किया जाता,और यदि शिकायतों में सच्चाई है तो कार्रवाई क्यों नहीं होती, यही सवाल अब ग्रामीण एनटीपीसी प्रबंधन और संबंधित विभागों से पूछ रहे हैं।
‘अरुण सिंह’ की भूमिका पर भी उठे सवाल
ग्रामीणों ने अरुण सिंह नामक व्यक्ति की भूमिका को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। आरोप है कि विस्थापित एवं प्रभावित ग्रामीणों के साथ कथित दबंगई करते हुए कोयला वाहनों के परिचालन में उनका हस्तक्षेप रहता है।ग्रामीणों का सवाल है कि आखिर अरुण सिंह को कोयला वाहनों के परिचालन में क्या अधिकार प्राप्त है।कंपनी या एनटीपीसी ने उन्हें किस जिम्मेदारी के तहत यह भूमिका दी है। क्या कंपनी के पास उनकी भूमिका से संबंधित कोई अधिकृत दस्तावेज है,इन सवालों का जवाब कंपनी प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों को देना चाहिए।
गड्ढे सड़क पर, धूल हवा में और पैसा कहां
सबसे गंभीर सवाल सड़क और प्रदूषण नियंत्रण को लेकर है। ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क मरम्मत और धूल नियंत्रण के नाम पर खर्च होने वाली राशि का वास्तविक लाभ जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा।यदि सड़क की मरम्मत और नियमित पानी छिड़काव की व्यवस्था है, तो फिर सड़क पर इतने बड़े गड्ढे क्यों हैं,धूल का गुबार क्यों उड़ रहा है, रोजाना जाम की स्थिति क्यों बन रही है। ग्रामीणों ने मांग की है कि सड़क मरम्मत, पानी छिड़काव और प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर कंपनी द्वारा किए गए खर्च का ऑडिट और स्थल निरीक्षण कराया जाए।
एनटीपीसी की भूमिका पर भी उठ रही उंगली
नकाश कंपनी के संचालन की निगरानी आखिर किसकी जिम्मेदारी है।यदि कंपनी के वाहनों और चालकों को लेकर शिकायतें लगातार मिल रही हैं, तो संबंधित अधिकारी कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे,ग्रामीणों का आरोप है कि कंपनी की मनमानी तभी संभव है, जब निगरानी व्यवस्था कमजोर हो या जिम्मेदार लोग आंखें बंद किए बैठे हों।अब जरूरत सिर्फ आश्वासन की नहीं, बल्कि जांच की है। प्रशासन और एनटीपीसी को यह स्पष्ट करना होगा कि कोयला परिवहन में लगे सभी वाहनों के दस्तावेज, चालकों के लाइसेंस, उम्र, फिटनेस, ओवरलोडिंग, सड़क रखरखाव और प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्था की वास्तविक स्थिति क्या है।
ग्रामीणों की सीधी मांग—जांच हो, जिम्मेदारी तय हो
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन, परिवहन विभाग और एनटीपीसी प्रबंधन से पूरे मामले की संयुक्त जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि जांच में यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित कंपनी और जिम्मेदार व्यक्तियों पर कार्रवाई हो तथा प्रभावित गांवों की सड़क और प्रदूषण की समस्या का स्थायी समाधान किया जाए। अब सवाल यह नहीं कि कोयला कितना निकला, सवाल यह है कि कोयले की इस दौड़ में प्रभावित गांवों को आखिर कितना भुगतना पड़ेगा
हजारीबाग से सुनील कुमार ठाकुर की रिपोर्ट