न्यायिक संवेदनशीलता पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, जजों के लिए नई गाइडलाइन जारी

न्यायिक संवेदनशीलता पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, जजों के लिए नई गाइडलाइन जारी

न्यायिक संवेदनशीलता पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, जजों के लिए नई गाइडलाइन जारी
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By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
: Feb 18, 2026, 6:03:00 PM

यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण और संवेदनशीलता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक विवादित आदेश को पलटते हुए स्पष्ट किया कि किसी महिला को गलत नीयत से पकड़ना और उसकी सलवार का नाड़ा खोलना केवल छेड़छाड़ या रेप की तैयारी नहीं माना जा सकता, बल्कि यह सीधे तौर पर बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में आता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के गंभीर कृत्य को हल्के अपराध के रूप में देखना न सिर्फ कानूनी रूप से गलत है, बल्कि यह न्याय की मूल भावना के भी विरुद्ध है। अदालत ने मार्च 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिए गए उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें इस घटना को केवल महिला की लज्जा भंग करने तक सीमित माना गया था।

दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह तर्क दिया था कि आरोपी की हरकत को रेप का प्रयास नहीं कहा जा सकता और इसे केवल तैयारी के स्तर का अपराध माना जाए। इसके बाद कानूनी विशेषज्ञों और महिला अधिकार संगठनों ने फैसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी थी।

मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया। यह कार्रवाई एक गैर-सरकारी संगठन की संस्थापक एवं वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा भेजे गए पत्र के बाद की गई। इसके बाद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की विशेष पीठ ने मामले की सुनवाई की।

सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया और आरोपियों के खिलाफ पोक्सो एक्ट के तहत रेप के प्रयास से जुड़े कठोर आरोपों को बहाल कर दिया।

फैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि यौन अपराधों के मामलों में केवल कानून की शब्दावली पर टिके रहना पर्याप्त नहीं है। न्यायाधीशों को पीड़िता की मानसिक स्थिति, उसकी असुरक्षा और मामले की वास्तविक परिस्थितियों को समझते हुए निर्णय देना चाहिए। अदालत ने टिप्पणी की कि संवेदनशीलता, करुणा और सहानुभूति के बिना न्याय अधूरा रह जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को केवल एक आदेश तक सीमित नहीं रखा, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में सुधार की दिशा में भी बड़ा कदम उठाया। अदालत ने माना कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में निचली अदालतों के न्यायाधीशों को अधिक संवेदनशील बनाने की जरूरत है।

इसी उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी के निदेशक को विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने का निर्देश दिया है। यह समिति यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों की सुनवाई के दौरान न्यायिक व्यवहार और दृष्टिकोण को बेहतर बनाने के लिए दिशा-निर्देश तैयार करेगी। अदालत ने कहा कि ये गाइडलाइंस सरल और स्पष्ट भाषा में हों, ताकि इन्हें जमीनी स्तर पर प्रभावी रूप से लागू किया जा सके और पीड़ितों को वास्तविक न्याय मिल सके।