97 साल की उम्र में भी बिहार की राजनीति का चलता-फिरता इतिहास हैं रमाकांत पांडेय, जिनकी गोद में खेले जेपी नड्डा!

बिहार की राजनीति में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान उनके पद, प्रतिष्ठा और चुनावी जीत से कहीं अधिक बड़ी होती है। वे एक दौर के साक्षी होते हैं, आंदोलनों के सहभागी होते हैं और अपने जीवन में इतिहास को बनते हुए देखते हैं।

97 साल की उम्र में भी बिहार की राजनीति का चलता-फिरता इतिहास हैं रमाकांत पांडेय, जिनकी गोद में खेले जेपी नड्डा!

बिहार की राजनीति में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान उनके पद, प्रतिष्ठा और चुनावी जीत से कहीं अधिक बड़ी होती है। वे एक दौर के साक्षी होते हैं, आंदोलनों के सहभागी होते हैं और अपने जीवन में इतिहास को बनते हुए देखते हैं। सारण जिले के बनियापुर के पूर्व विधायक डॉ. प्रो. रमाकांत पांडेय ऐसी ही एक शख्सियत हैं।पटना के कौटिल्य नगर स्थित अपने आवास पर रहने वाले 97 वर्षीय डॉ. प्रो. रमाकांत पांडेय के बारे में उनके शुभचिंतकों का कहना है कि वे आज भी पूरी तरह स्वस्थ हैं। उम्र के इस पड़ाव पर उनकी जिंदगी का सफर केवल एक पूर्व विधायक की कहानी नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति के कई दशकों की यादों का खजाना है। 

डॉ. प्रो. रमाकांत पांडेय केवल राजनीति से जुड़े व्यक्ति नहीं रहे, बल्कि शिक्षा जगत में भी उनकी अपनी पहचान रही है

अगर आप बिहार की राजनीति को जानते हैं, सारण की सियासत को समझते हैं और बनियापुर विधानसभा क्षेत्र के राजनीतिक इतिहास से आपका परिचय है, तो डॉ. प्रो. रमाकांत पांडेय का नाम आपके लिए अनजान नहीं होगा। वे उस पीढ़ी के राजनेता हैं, जिसने राजनीति को केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि विचार, संघर्ष और सामाजिक बदलाव का रास्ता माना। प्रो. रमाकांत केवल राजनीति से जुड़े व्यक्ति नहीं रहे, बल्कि शिक्षा जगत में भी उनकी अपनी पहचान रही है। वे पटना विश्वविद्यालय के वाणिज्य महाविद्यालय के प्राचार्य रह चुके हैं। एक शिक्षक और शिक्षाविद् के रूप में विद्यार्थियों के बीच उनकी भूमिका रही, तो दूसरी ओर सार्वजनिक जीवन में उन्होंने राजनीतिक जिम्मेदारियां भी निभाईं। उनका जीवन इस बात की मिसाल है कि शिक्षा और राजनीति का रिश्ता केवल भाषणों तक सीमित नहीं होना चाहिए। शिक्षण संस्थानों में भविष्य की पीढ़ी को गढ़ने वाला व्यक्ति जब सार्वजनिक जीवन में आता है तो उसके अनुभव का दायरा भी व्यापक होता है। 

बिहार की राजनीति में जयप्रकाश नारायण का आंदोलन एक निर्णायक अध्याय रहा है

बिहार की राजनीति में जयप्रकाश नारायण का आंदोलन एक निर्णायक अध्याय रहा है। इसी आंदोलन ने देश को अनेक ऐसे नेता दिए, जिन्होंने आगे चलकर राष्ट्रीय और प्रादेशिक राजनीति में अपनी पहचान बनाई। डॉ. प्रो. रमाकांत पांडेय भी उस राजनीतिक दौर से जुड़े रहे, जिसकी स्मृतियां आज भी बिहार के राजनीतिक विमर्श में जीवित हैं। उनसे जुड़ी एक महत्वपूर्ण बात यह कही जाती है कि नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, स्वर्गीय नरेंद्र सिंह और स्वर्गीय सुशील कुमार मोदी जैसे नेताओं के राजनीतिक जीवन की शुरुआती प्रेरणाओं के संदर्भ में उनकी भूमिका रही। इन संबंधों और प्रसंगों का विस्तृत दस्तावेजी सत्यापन आवश्यक है, लेकिन उनके समकालीन राजनीतिक संसार की चर्चा करते हुए ऐसे अनुभवों का उल्लेख अपने आप में उस दौर की तस्वीर सामने लाता है। वह दौर ऐसा था, जब छात्र आंदोलन केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं था। भ्रष्टाचार, व्यवस्था में बदलाव और लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली जैसे सवालों ने युवाओं को सड़कों पर उतारा था। इसी राजनीतिक वातावरण से निकली एक पीढ़ी ने आगे चलकर बिहार की सत्ता और देश की राजनीति को प्रभावित किया। 

रमाकांत पांडेय के जीवन से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प प्रसंग जेपी नड्डा को लेकर भी बताया जाता है

डॉ. प्रो. रमाकांत पांडेय के जीवन से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प प्रसंग भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को लेकर भी बताया जाता है। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने बचपन में जेपी नड्डा को अपनी गोद में खिलाया था। आज जब जेपी नड्डा राष्ट्रीय राजनीति के शीर्ष पदों पर रह चुके हैं, तब इस तरह का पारिवारिक और पुराना संबंध अतीत की एक आत्मीय तस्वीर सामने लाता है। राजनीति में जहां अक्सर रिश्तों की चर्चा पद और प्रभाव के आधार पर होती है, वहीं बचपन की स्मृतियों से जुड़ा ऐसा प्रसंग राजनीति के मानवीय पक्ष को भी सामने रखता है। यह किस्सा केवल एक बड़े नेता और एक वरिष्ठ राजनेता के संबंध का नहीं, बल्कि उस समय की याद दिलाता है, जब आज के राष्ट्रीय नेताओं का जीवन भी सामान्य पारिवारिक परिवेश में आगे बढ़ रहा था। सारण की धरती ने बिहार को अनेक राजनीतिक चेहरे दिए हैं। बनियापुर विधानसभा क्षेत्र का भी अपना राजनीतिक इतिहास रहा है। 

रमाकांत पांडेय ने जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में बनियापुर से जीत हासिल की थी - निर्वाचन आयोग

निर्वाचन आयोग के 1977 के चुनावी रिकॉर्ड के अनुसार, उस वर्ष रमाकांत पांडेय ने जनता पार्टी के उम्मीदवार के रूप में बनियापुर से जीत हासिल की थी। उन्हें 33,336 मत मिले थे, जबकि उनकी निकटतम प्रतिद्वंद्वी उमा पांडेय को 10,529 मत मिले थे। यह जीत उस समय के राजनीतिक बदलाव की एक महत्वपूर्ण तस्वीर पेश करती है। उस दौर की राजनीति को आज के चुनावी समीकरणों से समझना आसान नहीं है। तब विचारधारा, संगठन, जनसंपर्क और आंदोलन की अपनी अलग भूमिका थी। आज राजनीति की भाषा बदल गई है, प्रचार के माध्यम बदल गए हैं और चुनावी लड़ाइयों का स्वरूप भी बदल चुका है, लेकिन पुराने दौर के नेताओं के अनुभव आज भी राजनीतिक इतिहास को समझने में मदद करते हैं।

जीवन के 97 वर्ष पूरे करना अपने आप में एक बड़ी यात्रा है

जीवन के 97 वर्ष पूरे करना अपने आप में एक बड़ी यात्रा है। इस दौरान देश ने अनेक राजनीतिक बदलाव देखे, सरकारें बदलीं, नए दल बने, पुराने समीकरण टूटे और बिहार ने कई ऐतिहासिक मोड़ पार किए। डॉ. प्रो. रमाकांत पांडेय का जीवन इन बदलावों के बीच से गुजरने वाली एक पीढ़ी की कहानी है। आज पटना के कौटिल्य नगर में रह रहे इस वरिष्ठ राजनेता के पास अपने समय की न जाने कितनी स्मृतियां होंगी। छात्र राजनीति के किस्से, आंदोलन के दिन, विश्वविद्यालय के अनुभव, बनियापुर की चुनावी लड़ाइयां और बिहार के अनेक नेताओं के साथ बिताए पल इन सबको सुनना अपने आप में इतिहास की एक जीवंत कक्षा में बैठने जैसा हो सकता है।

ऐसे व्यक्तित्वों का महत्व इसलिए भी है कि उनके साथ एक दौर की यादें जुड़ी होती हैं

ऐसे व्यक्तित्वों का महत्व इसलिए भी है कि उनके साथ एक दौर की यादें जुड़ी होती हैं। समय बीतने के साथ दस्तावेज तो बच जाते हैं, लेकिन उन दस्तावेजों के पीछे की कहानियां अक्सर खो जाती हैं। इसलिए जरूरी है कि बिहार की नई पीढ़ी अपने ऐसे वरिष्ठ जनों से मिले, उनके अनुभव सुने और इतिहास को केवल किताबों में नहीं, लोगों की स्मृतियों में भी खोजे। डॉ. प्रो. रमाकांत पांडेय की कहानी हमें यही याद दिलाती है कि राजनीति का इतिहास केवल मुख्यमंत्री, मंत्री या बड़े पदों पर बैठे लोगों का इतिहास नहीं होता। इसे गढ़ने में उन लोगों की भी भूमिका होती है, जो आंदोलनों के समय साथ खड़े रहे, शिक्षा जगत में योगदान दिया और सार्वजनिक जीवन में अपनी अलग पहचान बनाई। कुछ लोग उम्र से बूढ़े होते हैं, लेकिन उनकी स्मृतियां अपने समय से कहीं आगे तक जीवित रहती हैं। रमाकांत बिहार की उसी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसके अनुभवों को दर्ज करना आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अनमोल विरासत साबित हो सकता है।

अनूप कुमार सिंह की रिपोर्ट

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