झारखंड के जंगलों की बदलेगी तस्वीर! जल्द शुरू होगा मेगा ग्रीन मिशन,
झारखंड के जंगलों की बदलेगी तस्वीर! जल्द शुरू होगा मेगा ग्रीन मिशन,
झारखंड सरकार ने राज्य के वन क्षेत्र को मजबूत करने और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से व्यापक वन विकास अभियान शुरू किया है। वन विभाग ने सिल्विकल्चरल ऑपरेशन योजना और नदी तट वृक्षारोपण योजना के जरिए जंगलों की गुणवत्ता सुधारने, प्राकृतिक पुनर्जीवन को बढ़ावा देने और नदी किनारों को हरित बनाने की रणनीति तैयार की है। इसके तहत कई वन प्रमंडलों में चरणबद्ध तरीके से कार्य किए जाएंगे।
योजना के पहले चरण में धनबाद, देवघर, गोड्डा, मेदिनीनगर, गिरिडीह (पूर्वी एवं पश्चिमी) तथा गढ़वा (उत्तरी एवं दक्षिणी) के वन क्षेत्रों को शामिल किया गया है। इन इलाकों में विरल और सामान्य घनत्व वाले जंगलों को अधिक सघन बनाने के लिए वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाएंगे। विभाग ने यह भी सुनिश्चित किया है कि प्रत्येक कार्य की शुरुआत और समापन के दौरान फोटोग्राफी एवं वीडियोग्राफी कराई जाए, ताकि किए गए सुधारों का वस्तुनिष्ठ आकलन संभव हो सके।
वनों के पुनर्जीवन के दौरान पुराने खूंटों की वैज्ञानिक तरीके से कटाई की जाएगी, जिससे नए पौधों के विकास में बाधा न आए। साथ ही प्रति हेक्टेयर लगभग 200 स्थानीय एवं प्राकृतिक प्रजातियों के पौधे लगाए जाएंगे। ये पौधे स्थायी पौधशालाओं में तैयार किए गए ट्यूब प्लांट्स होंगे और इन्हें गैप-एनरिचमेंट तकनीक के माध्यम से रोपा जाएगा, ताकि खाली स्थानों को भरकर वन क्षेत्र की गुणवत्ता बेहतर की जा सके।
दूसरी ओर, चाईबासा सामाजिक वानिकी प्रमंडल में नदी तटों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया गया है। यहां दूसरे वर्ष के रखरखाव कार्यों के साथ बड़े आकार के पौधों का रोपण किया जाएगा। चार से पांच फीट ऊंचाई वाले ऐसे पौधे चुने जाएंगे जो स्थानीय मिट्टी और नमी के अनुरूप हों। इस अभियान में अर्जुन, सेमल, कदम, करंज, जामुन, आम, बेल, बेर, इमली, पीपल, बरगद, नीम, सिरिस, गम्हार और शीशम जैसी देशज प्रजातियों को प्राथमिकता दी जाएगी। इसका उद्देश्य मृदा कटाव रोकने के साथ नदी तटों की हरियाली और जैव विविधता को बढ़ावा देना है।
भूमि चयन को लेकर भी विभाग ने स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं। प्राथमिकता वनभूमि और गैर-मजरुआ भूमि को दी जाएगी। हालांकि, यदि ऐसी भूमि पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होती है तो कुल क्षेत्रफल के अधिकतम 30 प्रतिशत हिस्से में रैयती भूमि का उपयोग संबंधित भू-स्वामी की स्वैच्छिक सहमति और अनापत्ति प्रमाण पत्र के आधार पर किया जा सकेगा।
योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सभी भुगतान सीधे लाभार्थियों के बैंक अथवा डाकघर खातों में किए जाएंगे। नकद भुगतान पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। इसके अलावा प्रत्येक कार्य का रिकॉर्ड विभाग के 'जोहार' पोर्टल और आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड किया जाएगा। पौधों की जीवित रहने की दर भी वर्षवार फोटो के साथ सार्वजनिक की जाएगी।
वन विभाग ने गुणवत्ता नियंत्रण के लिए थर्ड पार्टी मूल्यांकन और नियमित सोशल ऑडिट को भी अनिवार्य बनाया है। अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (विकास) ने सभी संबंधित वन प्रमंडल अधिकारियों को निर्देश दिया है कि निर्धारित समयसीमा के भीतर कार्य पूरे किए जाएं और प्रत्येक माह की पांच तारीख तक भौतिक एवं वित्तीय प्रगति रिपोर्ट मुख्यालय को भेजना सुनिश्चित किया जाए।
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