PMCH से क्या-क्या छीना गया, मेडिकल कॉलेज को बना दिया गया अस्पताल

पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल बहुत कुछ छीन लिया गया। इसका भान तो सरकार को भी नहीं है। बुनियादी सवाल यह है कि यहां राज्य और देश के लिए नये चिकित्सकों की नयी पौध तैयार की जाती है। न कि सिर्फ मरीजों के इलाज होता है।

PMCH से क्या-क्या छीना गया, मेडिकल कॉलेज को बना दिया गया अस्पताल

पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल बहुत कुछ छीन लिया गया। इसका भान तो सरकार को भी नहीं है। बुनियादी सवाल यह है कि यहां राज्य और देश के लिए नये चिकित्सकों की नयी पौध तैयार की जाती है। न कि सिर्फ मरीजों के इलाज होता है। एमबीबीएस की डिग्री का प्रशिक्षण हो या पोस्ट ग्रेजुएट का प्रशिक्षण। इसी मेडिकल कॉलेज से चिकित्सक शिक्षकों की वह फौज भी तैयार की जाती है जो राज्य और देश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफेसर से एक चिकित्सक शिक्षक के रूप में काम करते हैं। मेडिकल कॉलेज को मूलरूप से शिक्षण संस्थान के रूप में देखा जाना चाहिए न कि एक अस्पताल के रूप में। बिहार में सिर्फ अस्पतालों की बड़ी संख्या है। पर एक मेडिकल कॉलेज को खोलना और संचालित करना कितनी टेढ़ी खीर है, इसका अंदाजा तो सरकार भी है। जिन मेडिकल कॉलेजों को सरकार द्वारा खोला गया है उसका संचालन अब निजी हाथों में देने की कवायद चल रही है। 

देश में सबसे अधिक क्लिनिकल मैटेरियल, पर शोध जीरो 

देश में शायद ही कोई ऐसा राज्य होगा जहां पर पढ़ाई के लिए इतनी अधिक संख्या में क्लिनिकल मैटेरियल उपलब्ध हो. क्लिनिकल मैटेरियल का मतलब है कि छात्रों को अधिकतम प्रकार के मरीजों और बीमारियों को देखने, पढ़ने और समझने के साथ शोध करने का मौका है. पर बिहार आधारित एक भी बीमारी पर यहां शोध नहीं होता है. डा सीपी ठाकुर के कालाजार पर शोध के अलावा यहां शायद ही कोई बुनियादी शोध किया गया हो जिसकी सीधा संबंध बिहार के मरीजों से जुड़ा हुआ हो. पीएमसीएच के छात्रों से क्लिनिकल मैटेरियल होते भी उनसे उसकी समझ छीन गयी है. मैं गवाह हूं कि यहां के कई छात्रों को आइसीयू में राइस ट्यूब डालने की समझ नहीं है. यह उनका दोष नहीं बल्कि यहां दी जानेवाली शिक्षा प्रणाली का दोष है. अगर चिकित्सक साधारण जानकारी नहीं रखेंगे तो उनसे गंभीर मर्ज की दवा की उम्मीद कैसे की जा सकती. 

पीएमसीएच को सिर्फ अस्पताल समझने की भूल

पिछले दो तीन दशकों से पीएमसीएच को मेडिकल कॉलेज की जगह सिर्फ अस्पताल समझने की भूल की जा रही है. सच तो यह है कि मेडिकल कॉलेज एक संस्था है जिसके तहत अस्पताल उसकी लैबोरेट्री के समान होता है. अस्पताल लैबोरेट्री के रूप में ही  काम करता है जहां मेडिकल की पढ़ाई करनेवाले कॉलेज के छात्र पढ़ने के बाद अस्पताल में आकर मरीजों पर प्रैक्टिकल कर बीमारी के बारे में जानकारी लेते हैं.  पीएमसीएच को 5400 बेड का अस्पताल तो बना दिया गया पर किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया कि यहां पर एमबीबीएस और एमडी की पढ़ाई की सीटें बढ़ायी जाये. सीटें अधिक होंगी तो उससे अधिक संख्या में चिकित्सक पैदा होंगे.  सरकार का रोना है कि मेडिकल कॉलेजों के लिए चिकित्सक नहीं मिल रहे हैं तो इसका कारण  बुनियादी है. इसे मेडिकल कॉलेज के रूप में  जिस दिन देखा जायेगा,उसी समय से स्थिति में सुधार होने लगेगा. आखिर पढ़ाई होगी तो ही बेहतर इलाज की उम्मीद की जा सकती है. अगर इसे बेहतर मेडिकल कॉलेज नहीं बनाया गया तो आखिर सरकारी अस्पतालों में चिकित्सक और चिकित्सक शिक्षक कहां से मिलेंगे. 

पीएमसीएच में छात्र परीक्षा का खुलेआम करते है बाइकॉट

पीएमसीएच के छात्र परीक्षा देने से सीधे इनकार करते हैं. आखिर छात्रों को यह नौबत कैसे आयी. इसकी सुध किसी ने नहीं ली. सच्चाई यह है कि पीएमसीएच में सभी विषयों में पर्याप्त संख्या में फैकल्टी नहीं हैं. अगर मरीज के भीड़ को ध्यान में रखा जाएगा और फैकल्टी नहीं हैं तो पढ़ाई कैसे होगी. पढ़ाई नही‍ं होगी तो सिर्फ डिग्री बांटने से समाज का ही नुकसान होगा.  यह कोई पूछनेवाला नहीं है कि पीएमसीएच में कितने विषयों की हर दिन पढ़ाई हुई. छात्रों को कितने क्लास नहीं कराये गये?  छात्रों को बेहतर प्रशिक्षण नहीं मिलेगा तो अस्पतालों कैसे चलेगा. 

प्राचार्य-प्रशासन और सवाल अतिरिक्त प्रभार का

सरकार ने पीएमसीएच के अतिरिक्त प्रभार में काम करनेवाले डा (प्रो) एनपी सिंह को प्रभार से हटा कर नये प्रिंसिपल के रूप में डा (प्रो) गीता सिंह को अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया है. पीएमसीएच के प्रशासन को लंबे समय से वैकल्पिक व्यवस्था को तहत चलाया जा रहा है. आखिर कब तक अतिरिक्त प्रभार से पीएमसीएच को चलाया जायेगा. पीएमसीएच में प्राचार्य और अधीक्षक का पद और दायित्व बंटा हुआ है. इन दोनों पदों पर कई वर्षों से अतिरिक्त प्रभार या कार्यकारी व्यवस्था के तहत चिकित्सकों की तैनाती की जाती रही है.  सत्ता के शीर्ष पर यह समझ कैसे होगी कि यहां पर जिनको भी दायित्व दिया जाये उनको स्थायी रूप से प्राचार्य और अधीक्षक बनाया जाये. नियमित रूप से नियुक्त प्राचार्य ही कॉलेज को जबकि नियमित अधीक्षक ही अस्पताल को बेहतर तरीके से संचालित कर सकते हैं.

अनूप नारायण सिंह 

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