बिहार पंचायत चुनाव में आया नया मोड़, भावी प्रत्याशियों ने खटखटाया हाईकोर्ट का दरवाजा
बिहार में पंचायत चुनाव में संभावित देरी और नए सिरे से परिसीमन लागू किए जाने को लेकर संभावित प्रत्याशियों ने पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उम्मीदवारों की ओर से पटना हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर पंचायत चुनाव को तय समय सीमा में कराने की मांग।

बिहार में पंचायत चुनाव में संभावित देरी और नए सिरे से परिसीमन लागू किए जाने को लेकर संभावित प्रत्याशियों ने पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उम्मीदवारों की ओर से पटना हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर कर पंचायत चुनाव को तय समय सीमा के भीतर कराने की मांग की गई है। बिहार सरकार द्वारा पंचायतों के परिसीमन की घोषणा के बाद राज्य के पंचायत प्रतिनिधियों और आम जनता के बीच असमंजस और सवालों का दौर शुरू हो गया है। सरकार के इस कदम को लेकर जमीनी स्तर पर तीन बड़े प्रश्न उठ रहे हैं, जिनका समाधान किए बिना परिसीमन की प्रक्रिया को जल्दबाजी माना जा रहा है।
आधार का सवाल: 2011 क्यों, 2026 क्यों नहीं?
जनता का पहला और सबसे बड़ा सवाल डेटा को लेकर है। जब 2026 में नई जनगणना प्रस्तावित है, तो 15 साल पुराने 2011 के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन क्यों किया जा रहा है? 1993-95 में हुआ परिसीमन 1991 की ताजा जनगणना पर आधारित था, जिसके कारण वह सफल और स्वीकार्य रहा। यदि अब भी वैज्ञानिक और दीर्घकालिक समाधान चाहिए, तो परिसीमन का आधार 2026 की जनगणना को ही बनाया जाना चाहिए।
समय का सवाल: 5 साल का कार्यकाल, फिर अचानक देरी क्यों?
दूसरा सवाल प्रक्रिया की मंशा पर है। पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। यदि परिसीमन आवश्यक था, तो इसे कार्यकाल के प्रारंभ में ही किया जाना चाहिए था। कार्यकाल के अंतिम चरण में अचानक परिसीमन की घोषणा से संदेह पैदा होता है कि कहीं यह राजनीतिक लाभ-हानि के समीकरण साधने के लिए तो नहीं है।
संसाधन का सवाल: कागज पर पंचायत, जमीन पर क्या?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल संसाधनों का है। सिर्फ प्रस्ताव पारित कर 2000-3000 नई पंचायतें कागज पर बनाना आसान है। लेकिन जमीनी हकीकत क्या होगी? नई पंचायत के लिए पंचायत सरकार भवन, सचिवालय, कर्मचारी, कंप्यूटर, इंटरनेट और अन्य आधारभूत सुविधाओं का रोडमैप क्या है? इसके लिए बजट का प्रावधान कितना है? इन सवालों के जवाब के बिना नई पंचायतें "नाम की पंचायत" बनकर रह जाएंगी और जनता को सुविधा के बजाय भटकाव मिलेगा।
1993 का उदाहरण और जनता की मांग
1993 में बिहार पंचायत राज अधिनियम बनने के बाद वैधानिक आदेश 5608 के तहत 1993 से 1995 तक परिसीमन की प्रक्रिया चली थी। लेकिन पहला चुनाव 2001 में हुआ। इस 6 वर्ष के अंतराल में सरकार ने पंचायत भवनों का निर्माण, स्टाफ की नियुक्ति और फंड का आवंटन पूरा किया। इसी कारण 1993 का परिसीमन आज तक सफल माना जाता है।
इसी अनुभव के आधार पर आम जनता और पंचायत प्रतिनिधियों की एकमात्र मांग है। पहले समय पर पंचायत चुनाव कराए जाएं। इसके बाद सरकार के पास 2026 की जनगणना तक पर्याप्त समय होगा। उस नए डेटा, पूर्ण बजट और स्पष्ट रोडमैप के साथ वैज्ञानिक परिसीमन किया जाए। तभी परिसीमन संतुलित और जनता के हित में होगा।
परिसीमन का उद्देश्य शासन को जनता के करीब लाना है, न कि भ्रम पैदा करना। यदि सरकार वास्तव में पंचायती राज को मजबूत करना चाहती है, तो उसे जल्दबाजी छोड़कर 1993 के मॉडल को अपनाना होगा-पहले तैयारी, फिर परिसीमन।











