आरके सिन्हा: राजनीति के सौरमण्डल से टूट कर बिखर गया गंगा और सोन की दोमट मिट्टी से बना सितारा
शाहाबाद की माटी ने देश दुनिया को अनेक ऐसे व्यक्तित्व दिए हैं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा, संघर्ष और कर्मठता से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई. इन्हीं में एक नाम डॉ. रविन्द्र किशोर सिन्हा यानी आरके सिन्हा का भी रहा।

आरा: शाहाबाद की माटी ने देश दुनिया को अनेक ऐसे व्यक्तित्व दिए हैं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा, संघर्ष और कर्मठता से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई. इन्हीं में एक नाम डॉ. रविन्द्र किशोर सिन्हा यानी आरके सिन्हा का भी रहा। कोईलवर प्रखंड के बहियारा गांव के रहने वाले आरके सिन्हा का शुक्रवार को निधन हो गया। हालांकि उनका जन्म बक्सर के उनके पूर्वजों के गांव में हुआ था लेकिन बहियारा उनका पैतृक गांव है। उनके निधन से राजनीतिक, पत्रकारिता, सामाजिक और व्यावसायिक जगत में शोक की लहर है। जनसंघ के दौर से राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले आरके सिन्हा ने पत्रकारिता, उद्यमिता, सामाजिक सेवा और संसदीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई। एक पत्रकार से लेकर देश की प्रमुख निजी सुरक्षा कंपनियों में शामिल एसआइएस ग्रुप के संस्थापक और राज्यसभा सांसद तक का उनका सफर कई मायनों में प्रेरणादायक रहा।
जनसंघ से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
आरके सिन्हा का राजनीतिक जीवन भारतीय जनसंघ के दौर में शुरू हुआ। वर्ष 1966 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय से प्रभावित होकर वे जनसंघ से जुड़े। आगे चलकर वे भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल हुए। पार्टी के शुरुआती दौर से ही संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय रहे और बिहार भाजपा में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। उन्होंने पार्टी संगठन के विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। वर्ष 2014 में भाजपा ने उन्हें बिहार से राज्यसभा भेजा। वे 2014 से 2020 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। संसद में उन्होंने गृह, विदेश, श्रम एवं रोजगार समेत विभिन्न विषयों से जुड़ी संसदीय समितियों में भी काम किया।
पत्रकारिता से सार्वजनिक जीवन की शुरुआत
आरके सिन्हा की पहचान केवल एक राजनेता और उद्यमी के रूप में ही नहीं थी। उनका शुरुआती जीवन पत्रकारिता से भी जुड़ा रहा। राजनीतिक विज्ञान और विधि की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता को अपना पेशा बनाया। हिंदुस्थान समाचार से प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में जुड़े और अपराध तथा राजनीतिक खबरों की रिपोर्टिंग की। वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्होंने युद्ध संवाददाता के रूप में भी काम किया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले छात्र आंदोलन को उन्होंने करीब से देखा और अपने अनुभवों को पुस्तक 'जन आंदोलन' में दर्ज किया। इस पुस्तक को जेपी आंदोलन के महत्वपूर्ण दस्तावेजों में गिना जाता है। बाद के वर्षों में हिंदुस्थान समाचार से उनका जुड़ाव और गहरा हुआ. वर्ष 2016 में वे इस समाचार एजेंसी के निदेशक मंडल के अध्यक्ष बने.
भोजपुरी भाषा और संस्कृति से था गहरा लगाव
भोजपुर की माटी और भोजपुरी से उनका जुड़ाव उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा था. भोजपुरी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रति उनकी विशेष रुचि थी. भोजपुरी भाषा के प्रचार-प्रसार और साहित्यिक गतिविधियों से भी उनका जुड़ाव रहा. भोजपुरी पत्रिका के संपादन से लेकर भाषा और संस्कृति के संरक्षण से जुड़े प्रयासों तक उनकी सक्रियता रही. राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और व्यावसायिक पहचान बनाने के बावजूद अपनी मातृभूमि और भाषा-संस्कृति के प्रति उनका लगाव बना रहा. वे जब भी अपनो से मिलते या भोजपुरी भाषा भाषी से मिलते भोजपुरी में ही बतियाते.ये आदत उन्हें उनके माटी से आजीवन जोड़े रहने में कामयाब रहा.बहियारा और भोजपुर क्षेत्र से उनका संबंध केवल पारिवारिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी था।
दो लोगों से शुरू किया था एसआइएस ग्रुप का सफर
आरके सिन्हा की व्यावसायिक यात्रा भी काफी दिलचस्प रही। वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद सेवानिवृत्त सैनिकों के अनुभव और क्षमताओं का उपयोग करने तथा उन्हें रोजगार उपलब्ध कराने की सोच ने उन्हें निजी सुरक्षा सेवा के क्षेत्र में उद्यम स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। वर्ष 1974 में उन्होंने पटना से सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज (एसआइएस) की शुरुआत की। शुरुआती दौर में सीमित संसाधनों और छोटी टीम के साथ शुरू हुआ यह संस्थान आगे चलकर देश-विदेश में निजी सुरक्षा और बिजनेस सपोर्ट सेवाओं से जुड़ा बड़ा समूह बना। एसआइएस ने भारत के साथ ऑस्ट्रेलिया में भी अपना कारोबार विस्तार किया। इस समूह के विस्तार के साथ बड़ी संख्या में युवाओं और पूर्व सैनिकों को रोजगार के अवसर मिले। एक पत्रकार के रूप में शुरू हुआ उनका सफर उद्यमिता के क्षेत्र में एक बड़ी व्यावसायिक पहचान तक पहुंचा।
सामाजिक सरोकारों और शिक्षा के क्षेत्र में भी सक्रियता
आरके सिन्हा का कार्यक्षेत्र कारोबार तक सीमित नहीं रहा। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और ग्रामीण विकास से जुड़ी गतिविधियों में भी उनकी रुचि रही। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में संस्थानों की स्थापना और संचालन से जुड़ी जिम्मेदारियां निभायीं। आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में मदद पहुंचाने के लिए अवसर ट्रस्ट के माध्यम से भी पहल की। सामाजिक कार्यों में सामूहिक विवाह, पुस्तकालय, मंदिर निर्माण, एंबुलेंस सेवा और आपदा राहत जैसे कार्यों से उनका जुड़ाव रहा। एसआइएस समूह और उससे जुड़ी सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से कौशल विकास तथा रोजगार सृजन के प्रयास भी किए गए।
बहियारा में गोशाला और जैविक खेती को दिया बढ़ावा
अपने पैतृक गांव बहियारा से उनका विशेष लगाव रहा. गांव के विकास और कृषि आधारित गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उन्होंने यहां देशी गायों की गोशाला और जैविक खेती से जुड़े कार्य शुरू कराये। आद्या मिल्क एंड ऑर्गेनिक प्रोडक्ट प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से गांव में देशी गायों के पालन, दुग्ध उत्पादन और जैविक कृषि को प्रोत्साहित करने की पहल की। वर्ष 2021 में बहियारा पहुंचकर उन्होंने गोशाला और जैविक कृषि से जुड़े कार्यों का जायजा भी लिया था। उनका मानना था कि गांवों की आर्थिक मजबूती के लिए कृषि और उससे जुड़े व्यवसायों को बढ़ावा देना जरूरी है। पिछली बार वे बीमार होने से पहले अपने गांव बहियारा में हीं थे। तबियत नासाज होने पर पटना गए, जहां स्थिति चिंताजनक होने पर उन्हें सिंगापुर के अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जहां वे इलाजरत रहे।
पत्रकार, राजनेता, उद्यमी और समाजसेवी के रूप में रहे याद
आरके सिन्हा का जीवन कई क्षेत्रों में सक्रियता और बदलाव की कहानी रहा। पत्रकारिता से सार्वजनिक जीवन में प्रवेश, जनसंघ और भाजपा के संगठनात्मक सफर, राज्यसभा की सदस्यता, एसआइएस जैसे बड़े व्यावसायिक समूह की स्थापना और सामाजिक कार्यों में भागीदारी ने उन्हें बहुआयामी व्यक्तित्व बनाया। भोजपुर के कोईलवर स्थित बहियारा गांव से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाले इस व्यक्तित्व के निधन से क्षेत्र ने अपना एक महत्वपूर्ण सामाजिक और सार्वजनिक जीवन से जुड़ा चेहरा खो दिया है। उनकी राजनीतिक सक्रियता, पत्रकारिता के अनुभव, उद्यमिता और अपनी मातृभूमि से जुड़ाव की स्मृतियां लंबे समय तक याद की जाती रहेंगी।
भोजपुर से दीपक गुप्ता की रिपोर्ट













