अंग्रेजों के जमाने के जेलर......सत्तर के दशक में यह किस्सा तब का है जब फिल्म शोले की कास्टिंग चल रही थी। असरानी उस दौर में इंडस्ट्री में एक स्थापित और व्यस्त अभिनेता बन चुके थे। एक शाम असरानी को निर्देशक रमेश सिप्पी का फोन आया और उन्होंने असरानी को अपने ऑफिस आने के लिए कहा। असरानी को लगा कि सिप्पी साहब किसी रोल या नई फिल्म के सिलसिले में चर्चा करना चाहते हैं।
जब असरानी दफ्तर पहुंचे, तो वहाँ पहले से रमेश सिप्पी के साथ लेखक सलीम खान और जावेद अख्तर मौजूद थे। असरानी के कुर्सी पर बैठते ही जावेद अख्तर ने अचानक टेबल पर हाथ पटक कर कड़क आवाज़ में बोलना शुरू किया…"हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं... हा हा! आधे इधर जाओ, आधे उधर जाओ... बाकी हमारे पीछे आओ!"
जावेद अख्तर का ये रूप देखकर असरानी बुरी तरह घबरा गए। उन्होंने अपने इंटरव्यू में बताया था कि उन्हें पहली नजर में लगा कि शायद जावेद अख्तर साहब का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है या उन्हें कोई दिमागी #दौरा_पड़ा है।
असरानी को डरता देख रमेश सिप्पी जोर से हंस पड़े और उन्होंने कहा, "ये जेलर का किरदार है, जो खुद को दुनिया का सबसे चालाक और ताकतवर आदमी समझता है। वह बेहद रौब जमाने की कोशिश करता है, पर असल में है एक नंबर का बेवकूफ और डरपोक। तुम इसे कैसे करोगे?"
असरानी साहब पहले ही इंडस्ट्री में स्थापित हो चुके थे और कई फिल्में भी कर चुके थे, इसलिए उन्हें किसी भी फिल्म में बिना ऑडिशन के ही रोल मिल जाया करते थे। लेकिन जब शोले के जेलर की बारी आई तो रमेश सिप्पी ने उनसे कहा कि यह सिर्फ 3-4 दिन का ही काम है, लेकिन इसके लिए हमें तुम्हारा लुक टेस्ट यानी ऑडिशन लेना होगा..क्योंकि फिल्म में बड़े-बड़े सितारे बिग बी , धर्मेंद्र, संजीव कुमार हैं, इसलिए उनके इस छोटे रोल को यादगार बनाने के लिए हमें #लाउड_कॉमेडी और अजीब बॉडी लैंग्वेज की जरूरत होगी।
असरानी साहब बिना ईगो पर बात लिए,... मान गए..
इसके बाद रमेश सिप्पी ने अपने ऑफिस की दराज खोली और द्वितीय विश्व युद्ध की एक मोटी, ऐतिहासिक किताब निकाली जिसमें कुछ पिक्चर्स भी थी…उन्होंने वह किताब असरानी के हाथ में थमाई और और हिटलर की तस्वीरों को दिखाकर कहा,"तुम्हें इस तानाशाह की तरह मूंछें रखनी हैं, इसकी तरह अकड़कर चलना है और इसी के स्टाइल में सैल्यूट करना है।"
अब असरानी के सामने एक बड़ी दुविधा थी। हिटलर इतिहास का सबसे क्रूर और #खूंखार_विलेन था। अगर असरानी उसकी हूबहू नकल करते, तो दर्शक हंसने के बजाय डर जाते या नफरत करते। इसके समाधान के लिए असरानी ने हॉलीवुड के महान कॉमेडियन #चार्ली_चैपलिन की साल 1940 की मशहूर फिल्म #द_ग्रेट_डिक्टेटर देखी इस फिल्म में महान कॉमेडियन चार्ली चैपलिन ने हिटलर का मजाक उड़ाते हुए उसकी #पैरोडी की थी।
असरानी ने वहीं से सीखा कि कैसे एक तानाशाह की क्रूर अकड़ को ओवर-एक्टिंग और लाउड कॉमेडी में बदलकर दर्शकों को हंसाया जा सकता है। कास्टिंग फाइनल होने के बाद सबसे बड़ा काम था किरदार की आवाज तय करना।
असरानी साहब FTII के पढ़े हुए एक बेहद ट्रेंड एक्टर थे। उन्हें पता था कि आवाज का इस्तेमाल कैसे करना है। उन्होंने इसके लिए हिटलर के भाषण देने के तरीके को कॉपी किया..हिटलर जब भाषण देता था, तो वह बहुत चिल्लाकर, हाथ हवा में लहराकर और अपनी आवाज को हाई पिच करके बोलता था और धीरे धीरे लो कर लेता था..
असरानी साहब ने अपने डायलॉग बोलते समय इसी लाउड पिच का इस्तेमाल किया, जिससे उनका रौब जमाना और भी फनी लगने लगा।। असरानी साहब ने इस किरदार को अपनी चाल के दम पर जिंदा किया था। उन्होंने सामान्य चाल चलने की बजाय ब्रिटिश और जर्मन फौजियों के मार्च पास्ट को पकड़ा
वे जब भी जेल की गैलरी में चलते, अपने पैरों को जरूरत से ज्यादा ऊपर उठाते थे। उनके दोनों हाथ हमेशा पीछे बंधे होते थे और हाथ में एक हंटर होता था, जिसे वे लगातार अपनी खाकी वर्दी पर मारकर खुद को बड़ा अफसर दिखाने की नाकाम कोशिश करते थे। उनकी यह कड़क चाल ही उनकी कॉमेडी बन गई, क्योंकि वह चाल जितनी कड़क होती थी, उनका किरदार उतना ही बेवकूफ नजर आता था
ये सारी तैयारी पूरी होने के बाद मेकर्स ने एक विग मेकर को बुलाया। असरानी के बालों को हिटलर की तरह एक तरफ चिपकाया और वैसी ही छोटी टूथब्रश मूंछें लगाई गईं… और अंग्रेजों के जमाने की वर्दी पहनकर असरानी मुंबई के मोहन स्टूडियो ट्रायल के लिए पहुंचे, तो सलीम-जावेद और रमेश सिप्पी ने उनसे कहा
"ज़रा इस गेटअप में चलकर दिखाओ।
असरानी ने जैसे ही अपने पैरों को जरूरत से ज्यादा ऊपर उठाकर कड़क ब्रिटिश मार्च-पास्ट करना शुरू किया और जैसे ही कहा, “हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं... ह हा!" ऑफिस के केबिन से लेकर स्टूडियो के सेट तक हर कोई हंसते-हंसते लोटपोट हो गया।
बिना एक भी सीन शूट किए, सिर्फ उस लुक टेस्ट और असरानी की #बॉडी_लैंग्वेज ने ये तय कर दिया था कि ये किरदार सिनेमा के इतिहास में हमेशा के लिए #अमर होने जा रहा है और असरानी साहब अपने इस ९ मिनट के किरदार से ही लोगों को याद रहेंगे…
और फ़िल्म रिलीज़ के बाद यही हुआ असरानी साहब इस किरदार से इतने लोकप्रिय हुए कि वो किसी भी प्रोग्राम में जाते थे तो लोग उनसे शोले के जेलर की फ़रमाइश ज़रूर करते थे.. वैसे आपकी असरानी साहब का रोल किस फ़िल्म में सबसे ज़्यादा पसंद आया था..? बताइयेगा ज़रूर ...
शोले ऑल टाइम सुपर डुपर हिट साबित हुई.... करीब 5 दशक बाद इसी स्क्रिप्ट से मिलती-जुलती कुछ नयी पटकथा लिखवाई गई । लेखक इस बार सलीम जावेद की जगह कोई दूसरे थे। जिन्होंने शर्त रखी कि हमारा नाम स्क्रीन पर तभी आए जब फिल्म कम से कम 50 दिन तक सफलतापूर्वक देशभर में तहलका मचा दे... निर्माता निर्देशक ने लेखक की शर्त मान ली। ऑडिशन के लिए अंग्रेजों के जमाने वाले जेलर की भूमिका के लिए इस बार गपिल शर्मा और जानी फीवर को बुलाया गया था। डायलॉग थोड़ा बदल दिया गया था ऑडिशन के लिए जो डायलॉग पकड़ाया गया, वह था "पैलेट गन किसने चलवाई......"
अनूप नारायण सिंह