परीक्षा माफियाओं पर शिकंजा कसने की तैयारी, 158 केस होंगे फास्ट-ट्रैक कोर्ट में ट्रांसफर

परीक्षा माफियाओं पर शिकंजा कसने की तैयारी, 158 केस होंगे फास्ट-ट्रैक कोर्ट में ट्रांसफर

देशभर में वर्षों से अदालतों में लंबित परीक्षा और भर्ती घोटालों से जुड़े मामलों के जल्द निष्पादन की दिशा में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। जांच एजेंसी अब उन मामलों को विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों में स्थानांतरित कराने की तैयारी कर रही है, जिनकी जांच पूरी हो चुकी है लेकिन सुनवाई अभी भी लंबित है। इस प्रक्रिया के लिए CBI विभिन्न उच्च न्यायालयों से अनुमति मांगेगी।

जानकारी के अनुसार, वर्तमान में परीक्षा और भर्ती अनियमितताओं से जुड़े कुल 158 मामले विभिन्न अदालतों में विचाराधीन हैं। इनमें कई ऐसे मामले भी शामिल हैं जो दो दशक से अधिक समय से न्यायिक प्रक्रिया में अटके हुए हैं। अब इन्हें लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन अधिनियम, 2026 के तहत गठित विशेष अदालतों में भेजने की योजना बनाई गई है, ताकि इनका समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित किया जा सके।

इस पहल का असर झारखंड पर भी पड़ेगा, जहां परीक्षा संबंधी कथित धांधली के पांच मामलों में CBI अपनी जांच पूरी कर चुकी है, लेकिन मुकदमे अभी तक अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सके हैं। इसके अलावा दिल्ली में ऐसे सबसे अधिक 25 मामले लंबित हैं। तमिलनाडु में 14, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में 10-10, राजस्थान में 8, जबकि बिहार और कर्नाटक में 5-5 मामले ट्रायल का इंतजार कर रहे हैं। हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और महाराष्ट्र में भी कई अहम भर्ती एवं प्रवेश परीक्षा से जुड़े मामले लंबित हैं।

सरकारी अधिकारियों का मानना है कि मुकदमों में लंबी देरी न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करती है। समय बीतने के साथ गवाहों की उपलब्धता कम हो जाती है, उनकी याददाश्त कमजोर पड़ सकती है और बयान बदलने की आशंका भी बढ़ जाती है। वहीं जांच अधिकारियों, सरकारी अधिवक्ताओं और न्यायिक अधिकारियों के लगातार तबादलों के कारण भी मामलों की सुनवाई प्रभावित होती है, जिससे अभियोजन पक्ष की स्थिति कमजोर पड़ सकती है।

इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए संसद द्वारा पारित लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन अधिनियम, 2026 में विशेष प्रावधान किए गए हैं। नए कानून के तहत प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद एक सत्र न्यायालय को विशेष फास्ट-ट्रैक कोर्ट के रूप में अधिसूचित करना अनिवार्य होगा।

कानून के अनुसार, इन अदालतों में मामलों की सुनवाई बिना अनावश्यक स्थगन के प्रतिदिन की जाएगी। चार्जशीट दाखिल होने या किसी अन्य अदालत से मामला स्थानांतरित होने के बाद तीन महीने के भीतर सुनवाई पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में इन मामलों के लिए विशेष सरकारी वकीलों की नियुक्ति की जाएगी।

नई व्यवस्था का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि किसी आरोपी पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) या अन्य कानूनों के तहत भी संबंधित आरोप दर्ज हैं, तो अलग-अलग अदालतों में सुनवाई कराने के बजाय सभी आरोपों की सुनवाई एक ही फास्ट-ट्रैक अदालत में की जाएगी। इससे न्यायिक प्रक्रिया में तेजी आने के साथ-साथ एक ही मामले पर समानांतर सुनवाई की स्थिति से भी बचा जा सकेगा।