राज्यसभा के शून्यकाल में झारखंड की राजधानी रांची स्थित केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान (सीआईपी) को राष्ट्रीय महत्त्व का संस्थान घोषित किए जाने का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। राज्यसभा सांसद डॉ. प्रदीप कुमार वर्मा ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि संसद के पृथक अधिनियम के माध्यम से सीआईपी को यह दर्जा प्रदान किया जाए, ताकि संस्थान को शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय स्तर पर अधिक स्वायत्तता मिल सके।
सदन में अपनी बात रखते हुए डॉ. वर्मा ने कहा कि वर्ष 1918 में स्थापित सीआईपी देश के सबसे पुराने मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में गिना जाता है। उन्होंने बताया कि यह संस्थान केवल मानसिक रोगों के उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि मनोचिकित्सा, नैदानिक मनोविज्ञान, मनोरोग सामाजिक कार्य, नर्सिंग, पुनर्वास, तंत्रिका विज्ञान और सामुदायिक मानसिक स्वास्थ्य जैसे कई क्षेत्रों में लंबे समय से महत्वपूर्ण योगदान देता आ रहा है।
उन्होंने कहा कि संस्थान हर वर्ष करीब 1.17 लाख मरीजों का इलाज करता है, जिनमें बड़ी संख्या अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से जुड़े लोगों की होती है। उनके अनुसार, ऐसे संस्थान को राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक सशक्त बनाने की आवश्यकता है ताकि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का दायरा व्यापक हो सके।
मानसिक स्वास्थ्य की गंभीर होती स्थिति का उल्लेख करते हुए डॉ. वर्मा ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की वर्ष 2024 की रिपोर्ट का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि देश में उस वर्ष 1,70,746 आत्महत्याओं के मामले दर्ज किए गए। इन मामलों में दिहाड़ी मजदूरों, गृहिणियों, स्वरोजगार से जुड़े लोगों, वेतनभोगी कर्मचारियों, बेरोजगारों, विद्यार्थियों, निजी क्षेत्र के कर्मियों, व्यवसायियों और कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों की बड़ी हिस्सेदारी रही। उन्होंने कहा कि यह स्थिति दर्शाती है कि मानसिक स्वास्थ्य का संकट समाज के लगभग हर वर्ग को प्रभावित कर रहा है और इसके समाधान के लिए मजबूत संस्थागत व्यवस्था की जरूरत है।
डॉ. वर्मा ने यह भी बताया कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी विभागीय संसदीय स्थायी समिति ने अपनी 148वीं रिपोर्ट में सीआईपी को राष्ट्रीय महत्त्व का संस्थान घोषित करने की अनुशंसा की थी। इसके अलावा दिसंबर 2023 में भी राज्यसभा में विशेष उल्लेख के माध्यम से यह मांग सामने रखी गई थी।
उन्होंने केंद्रीय बजट 2026-27 में रांची स्थित सीआईपी और तेजपुर के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान को क्षेत्रीय उत्कृष्टता केंद्र के रूप में विकसित करने की घोषणा का स्वागत करते हुए कहा कि यह निर्णय सीआईपी को अधिक अधिकार और स्वायत्तता देने की दिशा में महत्वपूर्ण अवसर साबित हो सकता है।
भूमि संबंधी विषय पर भी सांसद ने सरकार का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार सीआईपी के पास लगभग 229.29 एकड़ और रांची तंत्रिका मनोचिकित्सा एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान के पास करीब 322.94 एकड़ भूमि दर्ज है। इस प्रकार दोनों संस्थानों के पास कुल 552.23 एकड़ भूमि उपलब्ध है। हालांकि पुराने गजट और राजस्व अभिलेखों में कुल 891.532 एकड़ भूमि का उल्लेख मिलता है, जिससे करीब 339.302 एकड़ भूमि का अंतर सामने आता है। उन्होंने इस अंतर की स्वतंत्र जांच कर वर्तमान स्वामित्व, राजस्व रिकॉर्ड, हस्तांतरण और वास्तविक कब्जे की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की।
अपने संबोधन में डॉ. वर्मा ने कहा कि संसद पहले भी अलग-अलग केंद्रीय कानूनों के जरिए कई प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों को राष्ट्रीय महत्त्व का दर्जा दे चुकी है। उन्होंने निमहांस और एम्स का उदाहरण देते हुए कहा कि सीआईपी के लिए भी इसी प्रकार का विधायी कदम उठाना पूरी तरह उपयुक्त और आवश्यक होगा।
अंत में उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान, रांची को संसद के पृथक अधिनियम के माध्यम से राष्ट्रीय महत्त्व का संस्थान घोषित करते हुए उसे मानसिक स्वास्थ्य, तंत्रिका विज्ञान, चिकित्सा शिक्षा, प्रशिक्षण, अनुसंधान और रोगी सेवाओं के क्षेत्र में प्रभावी ढंग से कार्य करने के लिए आवश्यक वैधानिक, शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय स्वायत्तता जल्द से जल्द प्रदान की जाए।