झारखंड सरकार राज्य के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रस्तावित ‘क्लस्टर कॉलेज मॉडल’ को लागू करने से पहले अब इसकी व्यापक समीक्षा करेगी। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग को निर्देश दिया है कि नई व्यवस्था के हर पहलू का दोबारा आकलन किया जाए और ऐसा ढांचा तैयार किया जाए, जिससे विद्यार्थियों को किसी तरह की असुविधा न हो।
दरअसल, शिक्षा विभाग ने शैक्षणिक सत्र 2026 से राज्यभर में क्लस्टर आधारित कॉलेज प्रणाली लागू करने की तैयारी लगभग पूरी कर ली थी। इस संबंध में प्रारूप तैयार कर कैबिनेट के समक्ष रखने की प्रक्रिया भी चल रही थी। लेकिन मुख्यमंत्री ने इस व्यवस्था की व्यवहारिक चुनौतियों को देखते हुए प्रस्ताव में बदलाव की जरूरत बताई। अब विभाग संशोधित ड्राफ्ट तैयार करेगा, जिसे आगामी कैबिनेट बैठक में पेश किए जाने की संभावना है।
सूत्रों के अनुसार सरकार विशेष रूप से उन इलाकों को लेकर सतर्क है, जहां केवल एक या दो कॉलेज संचालित हैं। ऐसे क्षेत्रों में क्लस्टर प्रणाली लागू नहीं करने पर विचार किया जा रहा है। सरकार को आशंका है कि यदि किसी कॉलेज को सिर्फ एक विशेष संकाय तक सीमित कर दिया गया, तो अन्य विषयों के विद्यार्थियों को दूर-दराज के कॉलेजों में जाना पड़ेगा। इसका सबसे अधिक असर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों पर पड़ सकता है।
प्रस्तावित मॉडल के तहत कॉलेजों को विषयवार विभाजित करने की योजना थी। यानी कुछ संस्थानों में केवल विज्ञान विषयों की पढ़ाई होती, जबकि अन्य कॉलेजों को कला, वाणिज्य या बिजनेस स्टडीज जैसे विशेष क्षेत्रों के लिए निर्धारित किया जाना था। शिक्षा विभाग का मानना था कि इस व्यवस्था से शिक्षकों, प्रयोगशालाओं और अन्य संसाधनों का केंद्रीकृत उपयोग संभव होगा।
रांची के कुछ कॉलेजों को उदाहरण के तौर पर विशेष विषयों के केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना पर भी चर्चा चल रही थी। इसमें कुछ कॉलेजों को विज्ञान एवं शिक्षा संकाय के लिए और कुछ को वाणिज्य एवं प्रबंधन अध्ययन के लिए प्राथमिकता देने का विचार शामिल था।
उच्च शिक्षा विभाग का तर्क है कि राज्य के कई कॉलेज लंबे समय से शिक्षकों और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। विषय आधारित क्लस्टर मॉडल लागू होने से विशेषज्ञ शिक्षकों और संसाधनों को एक जगह केंद्रित किया जा सकेगा, जिससे छात्रों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिल सकता है।
हालांकि, इस प्रस्ताव के खिलाफ छात्र संगठनों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। ABVP, AJSU समेत कई छात्र संगठनों ने विभिन्न जिलों में प्रदर्शन और आंदोलन किए। छात्रों का कहना है कि इस व्यवस्था से विशेष रूप से छात्राओं और ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। कई छात्र संगठनों ने यह भी आशंका जताई कि महिला कॉलेजों में कुछ विषय बंद होने पर छात्राओं को दूसरे संस्थानों में जाना पड़ेगा, जिससे सुरक्षा और परिवहन संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
शिक्षकों और कॉलेज प्रशासन ने भी इस नीति को लेकर चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि यदि कुछ विषयों में नामांकन कम हो गया तो क्षेत्रीय और जनजातीय भाषाओं की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है। साथ ही अलग-अलग विषयों के लिए छात्रों को कई कॉलेजों के बीच आना-जाना पड़ेगा, जिससे आर्थिक बोझ और समय दोनों बढ़ेंगे।
अब शिक्षा जगत की निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। माना जा रहा है कि संशोधित प्रस्ताव में छात्रों की पहुंच, ग्रामीण क्षेत्रों की जरूरतों और क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण जैसे मुद्दों को विशेष प्राथमिकता दी जा सकती है।