ACB की कार्रवाई पर भड़का प्रशासनिक सेवा संघ, आंदोलन की दी चेतावनी

ACB की कार्रवाई पर भड़का प्रशासनिक सेवा संघ, आंदोलन की दी चेतावनी

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
Updated at : Jul 13, 2026, 12:02:00 PM

झारखंड के बुढ़मू अंचल अधिकारी (सीओ) सच्चिदानंद कुमार वर्मा की गिरफ्तारी को लेकर राज्य में नया प्रशासनिक विवाद खड़ा हो गया है। झारखंड प्रशासनिक सेवा संघ ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) की कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे कानून और संवैधानिक प्रक्रियाओं के विपरीत बताया है। संघ ने स्पष्ट किया है कि यदि संबंधित अधिकारी को न्याय नहीं मिला तो पूरे राज्य में चरणबद्ध आंदोलन शुरू किया जाएगा।

संघ की ओर से रविवार को आयोजित आपात बैठक के बाद जारी बयान में कहा गया कि गिरफ्तारी के दौरान निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। आरोप लगाया गया कि एसीबी की टीम ने तड़के लगभग तीन बजे सरकारी आवास से अंचलाधिकारी को हिरासत में लिया, जबकि परिवार को समय पर इसकी जानकारी भी नहीं दी गई। संघ का कहना है कि यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गिरफ्तारी संबंधी तय दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है।

प्रशासनिक सेवा संघ का दावा है कि इस मामले में अंचलाधिकारी को कथित रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ नहीं पकड़ा गया और न ही उनके पास से कोई अवैध राशि बरामद हुई। ऐसे में भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018 की धारा 17A के अनुसार सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति के बिना जांच या गिरफ्तारी की कार्रवाई वैध नहीं मानी जा सकती। संघ का कहना है कि चूंकि मामला अधिकारी के आधिकारिक कार्यों से जुड़ा है, इसलिए पूर्व अनुमति आवश्यक थी।

संघ ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार संबंधी मामलों में केवल आरोप पर्याप्त नहीं होते। सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए संगठन ने तर्क दिया कि रिश्वत मांगने या स्वीकार करने के स्पष्ट और प्रत्यक्ष साक्ष्य आवश्यक होते हैं। उनके अनुसार उपलब्ध तथ्यों में अंचलाधिकारी की ओर से किसी प्रकार की मांग या धन स्वीकार करने का प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आया है।

बयान में यह भी कहा गया कि यदि पूरी कार्रवाई सह-आरोपी के कथित बयान पर आधारित है, तो ऐसा बयान अकेले किसी राजपत्रित अधिकारी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का पर्याप्त आधार नहीं बन सकता। संघ का मत है कि पुलिस हिरासत में दिए गए सह-आरोपी के इकबालिया बयान की कानूनी सीमाएं हैं और केवल उसी के आधार पर गिरफ्तारी न्यायसंगत नहीं कही जा सकती।

गिरफ्तारी के समय और तरीके पर भी प्रशासनिक सेवा संघ ने सवाल उठाए हैं। संगठन का कहना है कि पहले एक अन्य आरोपी को शाम के समय गिरफ्तार किया गया, जबकि अंचलाधिकारी को देर रात उनके सरकारी आवास से हिरासत में लिया गया। संघ ने डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी सम्मानित नागरिक या सरकारी अधिकारी की बिना असाधारण परिस्थितियों के रात में गिरफ्तारी उचित नहीं मानी जाती।

इसके अलावा संघ ने अरनेश कुमार मामले का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 35 के तहत पहले नोटिस जारी किया जाना चाहिए था। संगठन का कहना है कि जब अधिकारी के फरार होने या साक्ष्य प्रभावित करने की कोई आशंका नहीं थी, तब बिना नोटिस और प्रारंभिक प्रक्रिया अपनाए सीधे गिरफ्तारी करना कानून की भावना के अनुरूप नहीं है।

संघ ने यह भी आरोप लगाया कि गिरफ्तारी की सूचना अधिकारी के परिजनों को तत्काल उपलब्ध नहीं कराई गई। साथ ही संगठन ने दावा किया कि प्रथम दृष्टया यह मामला भू-माफिया से जुड़े षड्यंत्र का परिणाम प्रतीत होता है और अधिकारी को संरक्षण मिलने के बजाय कार्रवाई का सामना करना पड़ा।

पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र समीक्षा के लिए झारखंड प्रशासनिक सेवा संघ ने अपर सचिव स्तर के अधिकारी की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय फैक्ट-फाइंडिंग समिति गठित करने की घोषणा की है। यह समिति मामले की जांच कर अपनी रिपोर्ट संघ को सौंपेगी।

अपने बयान के अंत में संघ ने स्पष्ट किया कि वह किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार का समर्थन नहीं करता, लेकिन कानून लागू करने के नाम पर यदि निर्धारित प्रक्रिया की अनदेखी की जाती है तो उसका विरोध किया जाएगा। संगठन ने संकेत दिया कि यदि निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित नहीं हुआ तो राज्यव्यापी आंदोलन की रूपरेखा तैयार की जाएगी।