बिहार का अनोखा शक्तिपीठ, जहां पंचमी को खुलता है पट और लगता है 'मछली' का भोग

दशहरे के मौके पर यूं तो पूरे बिहार में मां दुर्गा के जयकारे गूंजते हैं, लेकिन वैशाली जिले के महुआ स्थित सिंघाड़ा गोविंदपुर शक्तिपीठ की बात ही कुछ और है।

वैशाली: दशहरे के मौके पर यूं तो पूरे बिहार में मां दुर्गा के जयकारे गूंजते हैं, लेकिन वैशाली जिले के महुआ स्थित सिंघाड़ा गोविंदपुर शक्तिपीठ की बात ही कुछ और है। यह दरबार केवल अपनी भव्यता के लिए ही नहीं, बल्कि उन अनोखी और सदियों पुरानी परंपराओं के लिए जाना जाता है जो आज भी बिना किसी बदलाव के जीवंत हैं। यहां न तो सप्तमी का इंतजार होता है और न ही आधुनिक मूर्तिकला का प्रयोग। यहां की मान्यताएं इतनी गहरी और चमत्कारी हैं कि जो भी भक्त सच्चे मन से मां के दरबार में माथा टेकता है, उसकी मुराद जरूर पूरी होती है

आमतौर पर दुर्गा पूजा में मां का पट सप्तमी के दिन खुलता है, लेकिन सिंघाड़ा गोविंदपुर के इस शक्तिपीठ का विधान बिल्कुल अलग है। यहां पांचवें दिन को ही मां का पट खोल दिया जाता है। इस दिन स्थापित प्रतिमा का विधिवत नेत्र संस्कार होता है। इसके बाद मां को 56 प्रकार के व्यंजनों का छप्पन भोग लगाया जाता है। इस भोग की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें 'मछली' का प्रसाद भी शामिल होता है और इसी दिन दो बकरों की बलि भी दी जाती है। बलि प्रथा और मनोकामना सिद्धि के लिए यह स्थान कई जिलों और प्रदेशों में विख्यात है।

इस शक्तिपीठ का इतिहास 300 साल से भी अधिक पुराना है। बताया जाता है कि लगभग 304 वर्ष पूर्व स्वर्गीय लीलकु सिंह को मां भगवती ने स्वप्न दिया था। उसी स्वप्न के बाद एक छोटी सी झोपड़ी में मां की पूजा अर्चना प्रारंभ हुई थी। कुछ वर्षों बाद झोपड़ी की जगह मिट्टी के खपरैल मंदिर ने ले ली और आज उसी स्थान पर मां एक बेहद भव्य मंदिर में विराजमान हैं।

यहां की मूर्तिकला आज भी अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है। बरसों से चले आ रहे विधान के अनुसार, भादो माह में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन ही प्रतिमा निर्माण के लिए बांस काटकर लाया जाता है। फिर चौथ चंद पर्व के दिन मंडप का प्रारूप तैयार किया जाता है और अनंत चतुर्दशी के दिन से प्रतिमा में मिट्टी लगाने का काम शुरू होता है। मंडप में नौ देवियों की प्रतिमा बनती है। ऊपरी हिस्से में ब्रह्मा, विष्णु, महेश; मध्य में सरस्वती, लक्ष्मी, गणेश; नीचे कार्तिक व भस्मासुर और बीच में मां दुर्गा की सुर्ख लाल रंग की भव्य प्रतिमा स्थापित होती है।

इस चमत्कारी दरबार के प्रति लोगों की आस्था इतनी गहरी है कि इसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। यहां के स्थानीय निवासी भी मां की महिमा का बखान करते नहीं थकते। स्थानीय लोगों के अनुसार सिंघाड़ा गोविंदपुर की यह मिट्टी हम सबके लिए एक सिद्ध पीठ से कम नहीं है। अपने बचपन से लेकर आज तक यहां के नियमों और परंपराओं में रत्ती भर भी बदलाव नहीं देखा है। जो नियम 300 साल पहले थे, वही आज भी हैं। मां के पट खुलते ही जब 56 भोग और मछली का प्रसाद लगता है, तो पूरा माहौल एक अलग ही अलौकिक ऊर्जा से भर जाता है। यहां मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है, यही कारण है कि दूर-दूर से लोग आकर मां के दरबार में बलि चढ़ाते हैं।"

लोगों का यह भी कहना है कि यह सिर्फ एक मंदिर नहीं है, बल्कि हमारे पूरे इलाके की आत्मा है। जन्माष्टमी के दिन से ही जब बांस कटकर आता है, तभी से पूरे गांव में उत्सव का माहौल बन जाता है। मां की सुर्ख लाल प्रतिमा देखते ही मन को जो शांति मिलती है, वो कहीं और नहीं मिल सकती। आधुनिकता के इस दौर में भी हमारी आस्था अपनी पुरानी जड़ों से जुड़ी हुई है, यही इस मंदिर की सबसे बड़ी खूबी है। लीलकु सिंह के सपने से शुरू हुई यह पूजा आज हम सबकी जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा बन चुकी है। दशहरा के दौरान यहां लगने वाला मेला और लोगों का उत्साह बताता है कि मां का प्रताप कितना बड़ा है।

सिंघाड़ा गोविंदपुर का यह शक्तिपीठ सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह उन अनकही मान्यताओं, विश्वास और उस गहरी आस्था का प्रतीक है, जो समय के साथ और भी ज्यादा मजबूत होती जा रही है। यहां आकर हर किसी को यही महसूस होता है कि मां हर पल अपने बच्चों की पुकार सुन रही हैं।