जब एक फरियादी की मुस्कान बनी विकास वैभव की पहचान

जब से आईपीएस अधिकारी विकास वैभव ने मगध रेंज के जोनल आईजी का प्रभार संभाला है, पुलिस और जनता के बीच वर्षों से खड़ी दीवार धीरे-धीरे टूटती नजर आ रही है।

आम आदमी के लिए थाना सिर्फ एक सरकारी दफ्तर नहीं होता, बल्कि अक्सर एक ऐसी जगह होती है जहां कदम रखते ही दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं। किसी विवाद, अत्याचार या अन्याय का शिकार व्यक्ति जब थाने पहुंचता है तो उसकी सबसे बड़ी चिंता अपराधी नहीं, बल्कि यह होती है कि क्या उसकी बात सुनी जाएगी? क्या उसे न्याय मिलेगा? एक दरोगा या थाना प्रभारी से मिलने में ही जब लोगों का कलेजा कांप जाता हो, तब सोचिए उस व्यवस्था में कितना बदलाव महसूस होता होगा जहां जोनल आईजी खुद अपने दरवाजे जनता के लिए खोल दें। मगध रेंज में आज यही बदलाव दिखाई दे रहा है। जब से आईपीएस अधिकारी विकास वैभव ने मगध रेंज के जोनल आईजी का प्रभार संभाला है, पुलिस और जनता के बीच वर्षों से खड़ी दीवार धीरे-धीरे टूटती नजर आ रही है। 

अब लोगों को यह एहसास होने लगा है कि पुलिस मुख्यालय केवल अधिकारियों का कार्यालय नहीं, बल्कि उनकी समस्याओं के समाधान का भी केंद्र है।विकास वैभव ने पदभार संभालते ही गया, नवादा, औरंगाबाद, जहानाबाद और अरवल जिलों में हर महीने के प्रथम शनिवार को पुलिस-पब्लिक संवाद की नई परंपरा शुरू की। यह केवल एक बैठक नहीं, बल्कि जनता और पुलिस के बीच भरोसे का नया अध्याय है। लोग सीधे अपनी शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं, अपनी पीड़ा सुना रहे हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी बातों पर कार्रवाई भी हो रही है।

उनकी कार्यशैली का सबसे बड़ा संदेश साफ है-वर्दी जनता की सेवा के लिए है, जनता पर रौब दिखाने के लिए नहीं।रविवार, जो अधिकांश अधिकारियों के लिए आराम का दिन होता है, विकास वैभव के लिए जनता के बीच जाने का दिन बन चुका है। कभी वे अरवल में होते हैं, कभी गया में, तो कभी किसी सुदूर इलाके में। वे फाइलों पर भरोसा करने वाले अधिकारी नहीं हैं; वे जमीन पर उतरकर सच देखने में विश्वास रखते हैं। 

यही कारण है कि पिछले कुछ महीनों में कई भ्रष्ट और लापरवाह पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई हुई है। अनुशासनहीनता उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं। चाहे कोई कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, यदि वह अपने कर्तव्य में लापरवाही बरतता है तो कार्रवाई तय मानी जाती है। कई पुलिसकर्मियों पर गिरी गाज ने पूरे महकमे को यह संदेश दे दिया है कि अब जवाबदेही केवल नियम पुस्तिका का शब्द नहीं, बल्कि वास्तविकता है।

लेकिन विकास वैभव की लोकप्रियता का कारण केवल उनकी प्रशासनिक सख्ती नहीं है। उनकी सबसे बड़ी ताकत है संवेदनशीलता। वे फरियादी में केवल एक आवेदनकर्ता नहीं देखते, बल्कि एक पीड़ित इंसान को देखते हैं जिसकी उम्मीदें व्यवस्था से जुड़ी होती हैं। शायद यही वजह है कि आज बिहार के गांवों, कस्बों और शहरों में फिर से विकास वैभव की चर्चा होने लगी है। लोग उनके पद की नहीं, उनकी कार्यशैली की बात कर रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि पुलिस वही है, कानून वही है, वर्दी वही है, लेकिन काम करने का तरीका बदल गया है। और जब व्यवस्था का तरीका बदलता है तो लोगों की उम्मीदें भी बदल जाती हैं।

विकास वैभव केवल एक आईपीएस अधिकारी नहीं हैं। "लेट्स इंस्पायर बिहार" जैसे सामाजिक अभियान के माध्यम से उन्होंने यह साबित किया है कि समाज को बदलने के लिए केवल सरकारी आदेश नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना भी जरूरी होती है। शिक्षा, समता और उद्यमिता के क्षेत्र में उनका योगदान हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुका है।उनके पुलिस जीवन की उपलब्धियां भी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। 

बगहा के बीहड़ों में डाकुओं के आत्मसमर्पण से लेकर रोहतासगढ़ क्षेत्र में नक्सली प्रभाव को कमजोर करने तक, उन्होंने हर चुनौती का सामना साहस और रणनीति के साथ किया। पटना के एसएसपी के रूप में प्रभावशाली लोगों के खिलाफ की गई कार्रवाई आज भी लोगों को याद है।लेकिन शायद उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि अपराधियों की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि आम लोगों का विश्वास जीतना है।आज मगध रेंज में लोग कहते हैं कि यदि समस्या है तो उसे सुना जाएगा, यदि अन्याय हुआ है तो उस पर कार्रवाई होगी। 

यही विश्वास किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत होता है। यदि यही मॉडल आगे भी कायम रहता है, तो आने वाले वर्षों में मगध रेंज केवल अपराध नियंत्रण के लिए नहीं, बल्कि जन-केंद्रित पुलिसिंग के एक आदर्श मॉडल के रूप में याद की जाएगी।क्योंकि किसी अधिकारी की असली पहचान उसकी कुर्सी नहीं होती, बल्कि उन लोगों की दुआएं होती हैं जिनकी जिंदगी में उसने उम्मीद की रोशनी जगाई हो।और आज मगध की धरती पर हजारों लोग यही कह रहे हैं-आईजी साहब के दफ्तर का दरवाजा खुला है, इसलिए अब न्याय की उम्मीद भी जिंदा है।

अनूप नारायण सिंह