बिहार सरकार की यूनिक पहल जीविका परियोजना राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में बदलाव की पटकथा लिख रही है। इसके माध्यम से गांव की आधी आबादी न केवल अपने पैर पर खडी हो रही है बल्कि सफलता की नई इबारत को लिख रही है। गरीबी और अभाव के बीच घुटती जिंदगियों को जीविका ने न सिर्फ बाहर निकाला है, बल्कि उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया है।
नालंदा जिले के कतरीसराय प्रखंड स्थित मायापुर गांव की चंचला सिन्हा के लिए कुछ साल पहले तक जिंदगी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थी। पति दिहाड़ी मजदूर थे और अनिश्चित आमदनी के बीच पांच सदस्यों के परिवार का पेट पालना व बच्चों की पढ़ाई एक दैनिक चुनौती थी। तब चंचला ने भारत जीविका महिला स्वयं सहायता समूह का दामन थामा और मात्र 10 रुपये की साप्ताहिक बचत से अपने सपनों को सींचना शुरू किया। हौसला बढ़ा, तो उन्होंने 15,000 रुपये का पहला ऋण लेकर घर के पीछे देसी मुर्गी पालन की नींव रखी। दूसरे चरण में 30,000 रुपये का ऋण लेकर उन्होंने उन्नत नस्ल की दो बकरियां खरीदीं, जिनका कुनबा आज बढ़कर आठ हो गया है। समूह में अपनी बेहतरीन साख के दम पर चंचला ने 50,000 रुपये का बड़ा लोन लिया और दो दुधारू गायें भी खरीद लीं। आज चंचला प्रतिदिन 8 से 10 लीटर दूध स्थानीय बाजार में बेचती हैं। जिस परिवार की मासिक आय कभी 3,000 रुपये से भी कम थी, आज वही चंचला मिश्रित पशुपालन के दम पर हर महीने 18,000 से 20,000 रुपये की शानदार आमदनी कर रही हैं।
खगड़िया जिले के अलौली प्रखंड के रोन गांव की नूतन देवी की कहानी भी उद्यम और जीवटता की एक शानदार मिसाल है। इंटरमीडिएट तक पढ़ीं नूतन के भीतर कुछ कर गुजरने की तमन्ना तो थी, लेकिन संसाधनों और मार्गदर्शन के घोर अभाव ने उनके कदम रोक रखे थे। साल 2008 में उन्होंने अपनी किस्मत बदलने की ठानी और सरस्वती जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ गईं। शुरुआत 10,000 रुपये के छोटे से ऋण और एक सिलाई मशीन से हुई। सिलाई से होने वाली कमाई ने घर के खर्चों में बड़ी राहत दी। इसके बाद नूतन ने बड़ा जोखिम लिया और 70,000 रुपये का ऋण लेकर एक हार्डवेयर की दुकान खोल ली। जीविका के ही मार्गदर्शन से उन्हें प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम की जानकारी मिली, जिसके तहत बैंक से 10 लाख रुपये की सहायता राशि लेकर उन्होंने अपनी हार्डवेयर दुकान को एक बड़े कारोबार में तब्दील कर दिया। नूतन का सफर यहीं नहीं थमा। शिक्षा के प्रति अपने जुड़ाव के कारण उन्होंने सरकारी लाइसेंस प्राप्त कर अपना एक कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र शुरू कर दिया। आज नूतन दीदी के इस केंद्र में करीब 150 छात्र-छात्राएं डिजिटल शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
चंचला और नूतन दीदी की ये कहानियां महज दो महिलाओं की सफलता तक सीमित नहीं हैं, यह बिहार की बदलती ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आईना है। जीविका ने यह साबित कर दिया है कि अगर महिलाओं को सही समय पर थोड़ा सा वित्तीय संबल और उचित मार्गदर्शन मिल जाए, तो वे सिर्फ अपना घर ही नहीं संवारतीं, बल्कि पूरे समाज के आर्थिक ढांचे को मजबूत कर देती हैं।