खबर बिहार के बगहा से है, कहावत है जहां चाह होती है, वहां राह निकल ही आती है। इसे रामनगर के सोनखर शिवपुर में ग्रामीणों नें चरिर्तार्थ किया है। पश्चिम चंपारण ज़िला में लोगों ने दिन रात एक क़र राह हीं नहीं, पूरा पुल बनाक़र सिस्टम को आईना दिखाया है।
दरअसल रामनगर प्रखंड के सोनखर पंचायत स्थित शिवपुर कॉलोनी में कई गावों को जोड़ने वाली पहाड़ी नदी पर ग्रामीणों नें आपसी सहयोग औऱ श्रमदान से पुल का निर्माण किया है।
बताया जा रहा है कि अधिकारीयों औऱ जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाते-लगाते आधी सदी बीत गई, लेकिन एक अदद पुल नहीं बना लिहाजा ग्रामीणों ने चंदा जुटाया, खुद श्रमदान किया और करीब ढाई लाख रुपये की लागत से पहाड़ी नदी पर 60 फीट लंबा लोहे का पुल तैयार कर दिया। यह कहानी सिर्फ एक पुल की नहीं, बल्कि सिस्टम को आईना दिखाने वाली मिसाल की है।
पश्चिम चंपारण जिले के रामनगर प्रखंड की सोनखर पंचायत के शिवपुरी गांव में यही वह पुल है। जिसे सरकार ने नहीं, बल्कि गांव के लोगों ने अपने दम पर बनाया है। करीब 60 फीट लंबा यह लोहे का पुल अब हजारों लोगों की जिंदगी आसान बना रहा है। लेकिन इसके पीछे छिपी कहानी सिस्टम की नाकामी की गवाही दे रहा है। ग्रामीण बताते हैं कि पिछले करीब 50 वर्षों से इस पहाड़ी नदी पर स्थायी पुल की मांग की जा रही थी।
हर साल बरसात में बांस और लकड़ी का बना चचरी पुल बह जाता था। फिर शुरू होता था जान जोखिम में डालकर नदी पार करने का सिलसिला। यहीं वज़ह है कि अब लोगों नें एकजुटता से नज़ीर पेश किया है। स्कूल जाते बच्चे... खेतों तक पहुंचते किसान... मरीज... महिलाएं... सभी को उफनती नदी बमुश्किल पार करनी पड़ती थी।
लिहाजा गुहार के बाद जब सरकारी फाइलें आगे नहीं बढ़ी..तब पूरा गांव चल पड़ा। किसी ने सौ रुपये दिए...किसी ने हजार.. किसी ने मजदूरी की... तो किसी ने लोहे और निर्माण सामग्री का इंतजाम कराया। फ़िर क्या करीब ढाई लाख रुपये का चंदा जुटा क़र दिन-रात श्रमदान कर ग्रामीणों ने अपने हाथों से यह मजबूत लोहे का पुल तैयार कर दिया है।
आरोप है कि सरकार से कई बार मांग की गईं , लेकिन पुल नहीं बना। आखिरकार गांव के लोगों ने मिलकर चंदा किया और खुद पुल बना दिया... अब इस पुल से स्कूली बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकेगी ... किसानों की खेती प्रभावित नहीं होगी ... और बरसात में गांव का संपर्क भी नहीं भाँग होगा औऱ ना हीं किसी मरीज का अस्पताल जाते वक़्त रास्ते में दम निकलेगा...!
यह पुल केवल लोहे का ढांचा नहीं... बल्कि ग्रामीणों की एकता, आत्मनिर्भरता और जज्बे की पहचान बन चुका है । विकास के दावे औऱ सरकारी योजनाओं के दौर में अगर किसी गांव को अपना पुल खुद बनाना पड़े, तो यह सिर्फ ग्रामीणों की सफलता की कहानी हीं नहीं, बल्कि व्यवस्था पर बड़ा सवाल भी है।
बता दें की बिहार के पश्चिम चंपारण ज़िला के इस छोटे से गांव के लोगों ने बता दिया है कि अगर इरादे मजबूत हों तो असंभव भी संभव हो सकता है। लेकिन सवाल अब भी वही है...क्या जनता को अपनी बुनियादी जरूरतें भी खुद ही पूरी करनी पड़ेंगी। बहरहाल रामनगर के शिवपुर कॉलोनी के लोगों के अनूठी पहल क़र एकजुटता दिखाते हुए बेपरवाह सिस्टम को आईना दिखाया है जिसकी चर्चा ज़ोर शोर से हो रही है।
बगहा से परवेज आलम की रिपोर्ट