आरके सिन्हा को याद कर भावुक हुए शिवानंद, बोले उनसे मेरा था पारिवारिक रिश्ता
बीजेपी के संस्थापक सदस्य रहे पूर्व राज्यसभा सांसद आरके सिन्हा के निधन पर बिहार के राजनीतिक गलियारे में शोक की लहर है। देश व विभिन्न प्रदेशों के नेता उनको अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं।

पटना: बीजेपी के संस्थापक सदस्य रहे पूर्व राज्यसभा सांसद आरके सिन्हा के निधन पर बिहार के राजनीतिक गलियारे में शोक की लहर है। देश व विभिन्न प्रदेशों के नेता उनको अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं। इसी क्रम में वरिष्ठ राजनेता शिवानंद तिवारी ने भी आरके सिन्हा के निधन पर शोक जताया है। अपने आधिकारिक फेसबुक पेज पर उन्होंने एक भावुक याद को शेयर करते हुए लिखा है कि उनके निधन की खबर सुनकर मन बहुत दुखी है।
शिवानंद तिवारी ने लिखा है कि रविन्द्र किशोर सिन्हा के निधन पर मेरी श्रद्धांजलि। रविन्द्र किशोर सिन्हा नहीं रहे। उनके निधन की खबर सुनकर मन बहुत दुखी है। उनसे मेरा संबंध केवल परिचय या राजनीतिक मेलजोल का ही नहीं था, बल्कि एक पुराना पारिवारिक रिश्ता था।
उनके सबसे बड़े भाई देवेंद्र, जिन्हें हम डीके. के नाम से जानते थे, पटना हाई स्कूल में मेरे सहपाठी थे। उनके पिता जी बिहार विधानसभा में पदाधिकारी थे। उसी समय से उनके परिवार से हमारा संबंध बना। मैंने रविन्द्र को बिल्कुल शुरुआती दिनों से संघर्ष करते हुए देखा है। साइकिल पर घूमना, इधर-उधर जाना और फिर दैनिक अखबारों में थोड़ा-बहुत लिखना। एक साधारण शुरुआत से उन्होंने अपनी जिंदगी का सफर शुरू किया था। धीरे-धीरे उन्होंने अपने परिश्रम, लगन और उद्यमशीलता से कारोबार की दुनिया में एक बड़ी जगह बनाई। आज उनका स्थापित किया हुआ व्यावसायिक समूह एक विशाल संस्थान का रूप ले चुका है। लेकिन इस व्यावसायिक सफलता के बावजूद राजनीति से उनका संबंध हमेशा बना रहा। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा से जुड़े रहे। राम मंदिर का मामला हो या संगठन से जुड़ा कोई दूसरा प्रसंग, वे दिल खोलकर सहयोग करते थे। हालाँकि राजनीति में हमलोग अलग-अलग विचारधारा के थे लेकिन हमारा व्यक्तिगत संबंध हमेशा अंतरंग बना रहा।
उनसे मेरे संबंधों का एक बहुत निजी प्रसंग है, जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता। रविन्द्र किडनी की बीमारी से ग्रसित थे। दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में उनका किडनी प्रत्यारोपण हुआ था। संयोग से उसी समय मेरी पत्नी को भी किडनी की समस्या हुई और वे एम्स में भर्ती थीं। उनका भी किडनी का प्रत्यारोपण होना था। उस समय रविन्द्र ने मुझे सलाह दी कि किडनी प्रत्यारोपण के बाद मरीज की देखभाल और संक्रमण से बचाव की व्यवस्था गंगाराम अस्पताल में बेहतर है। उन्होंने केवल सलाह ही नहीं दी, बल्कि मेरे अनुपस्थित रहने के बावजूद अपने बेटे ऋतुराज को मेरे यहाँ भेजा। ऋतुराज मेरी पत्नी को लेकर गंगाराम अस्पताल गए और वहां उन्हें भर्ती कराया।
हमारे पारिवारिक संबंधों का एक और प्रसंग है। बिहार आंदोलन के दिनों में, जब हम लोग लगातार जेल जा रहे थे और बाहर आ रहे थे, उस समय परिवार पर किस तरह का दबाव था, मेरी पत्नी को किन परिस्थितियों से गुजरना पड़ रहा था, इस पर रविन्द्र ने उनका इंटरव्यू किया था, जो ‘प्रदीप’ अखबार में प्रकाशित हुआ था। रविन्द्र किशोर ने अपने शुरुआती जीवन में काफी संघर्ष किया है। फिर जीवन में एक मोड़ आया और कारोबार की दुनिया में अपना एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया। लेकिन राजनीति और सामाजिक जीवन में भी उनकी सक्रियता बनी रही। अपने गांव और अपनी मिट्टी से भी उनका लगाव था। हम दोनों एक ही जिले के रहने वाले थे। गांव में खेती को लेकर भी उन्होंने कई तरह के प्रयोग किए थे। पिछले काफी समय से वे अस्वस्थ थे। सिंगापुर में उनका इलाज चल रहा था। लंबे समय से उनकी शारीरिक स्थिति ऐसी हो गई थी, जिसकी वजह से लगभग डाक्टरी सहायता से उनका प्राण चल रहा था।अंत में रितुराज उनको दिल्ली ले आए थे और वहीं उन्होंने अंतिम सांस ली।
रविन्द्र किशोर के नहीं रहने से मेरा एक पुराना आत्मीय संबंधों वाला व्यक्ति चला गया। उनके परिवार, उनकी पत्नी और उनके बेटे ऋतुराज के प्रति मेरी हार्दिक संवेदना है। मुझे पूरा विश्वास है कि रविन्द्र किशोर ने अपने पीछे जो विशाल ढाँचा छोड़ा है, उसको रितुराज सहित परिवार के अन्य लोग उसको और आगे बढ़ाएँगे।













