दहेज मामले में हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी, 20 साल पुरानी सजा रद्द
दहेज मामले में हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी, 20 साल पुरानी सजा रद्द
झारखंड हाईकोर्ट ने दहेज मांग के एक पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए गढ़वा की निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने माना कि जिस कानूनी संशोधन के आधार पर दोषसिद्धि की गई थी, वह कथित घटना के समय प्रभावी नहीं था। ऐसे में उस संशोधित प्रावधान को पूर्व प्रभाव (Retrospective Effect) से लागू नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय की एकलपीठ ने कामाख्या नारायण तिवारी की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत आरोप सिद्ध करने में सफल नहीं हुआ। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामला वर्ष 1984 की कथित दहेज मांग से जुड़ा है, जबकि दहेज निषेध अधिनियम में संशोधन वर्ष 1986 में लागू हुआ था।
फैसले में कहा गया कि 1986 के संशोधन के बाद ही दहेज की परिभाषा में विवाह के बाद किसी भी समय की गई मांग को शामिल किया गया। यह संशोधन 19 नवंबर 1986 से लागू हुआ और इसे पूर्व तिथि से लागू नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में संविधान के अनुच्छेद 20(1) का भी उल्लेख किया और कहा कि किसी व्यक्ति को ऐसे कानूनी प्रावधान के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जो कथित अपराध के समय लागू ही नहीं था।
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, विवाह वर्ष 1979 में हुआ था। अभियोजन का आरोप था कि वर्ष 1984 में आरोपी और उसके परिजनों ने मोटरसाइकिल की मांग की तथा मांग पूरी नहीं होने पर विवाहिता शशि कुमारी को प्रताड़ित किया गया। बाद में उनकी मृत्यु हो गई। इस प्रकरण में ट्रायल कोर्ट ने हत्या के आरोप से आरोपी को पहले ही बरी कर दिया था, लेकिन दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत छह महीने के कारावास और 5,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी।
गवाहों के बयानों का परीक्षण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि सभी गवाहों ने मोटरसाइकिल की मांग विवाह के बाद किए जाने की बात कही है। किसी भी गवाह ने यह नहीं बताया कि दहेज की मांग विवाह से पहले या विवाह के समय की गई थी, जबकि घटना के समय लागू कानून के तहत यही शर्त आवश्यक थी। इन्हीं आधारों पर अदालत ने निचली अदालत का दोषसिद्धि आदेश और सजा दोनों निरस्त कर दिए।
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