आदिवासी अस्मिता और धार्मिक पहचान पर केंद्रीय सरना समिति की दो टूक

आदिवासी अस्मिता और धार्मिक पहचान पर केंद्रीय सरना समिति की दो टूक

आदिवासी अस्मिता और धार्मिक पहचान पर केंद्रीय सरना समिति की दो टूक
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By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Urvashi
: Jun 02, 2026, 7:13:00 PM

राजधानी रांची के करमटोली स्थित प्रेस क्लब में मंगलवार को केंद्रीय सरना समिति ने आदिवासी समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर प्रेस वार्ता आयोजित की। इस दौरान संगठन के पदाधिकारियों ने आदिवासी पहचान, धार्मिक वर्गीकरण, सांस्कृतिक संरक्षण और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े विषयों पर अपनी राय रखी।

केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष फूलचंद तिर्की ने कहा कि आदिवासी समाज वर्तमान समय में वैचारिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। उन्होंने उन विचारों का विरोध किया जिनमें सरना और सनातन धर्म को एक बताया जाता है या फिर सरना एवं ईसाई समुदाय को एक ही धार्मिक पहचान के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की जाती है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आदिवासी समुदाय की अपनी अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान है, जिसे किसी अन्य धर्म या विचारधारा के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा आदिवासियों के लिए प्रयुक्त “वनवासी” शब्द पर भी आपत्ति जताते हुए कहा कि आदिवासी समाज स्वयं को आदिवासी के रूप में पहचानता है और उसकी यही पहचान स्वीकार की जानी चाहिए। तिर्की ने आगामी 2026-27 की जनगणना का उल्लेख करते हुए समाज के लोगों से अपील की कि वे धर्म संबंधी कॉलम में अपने धर्म के रूप में सरना का उल्लेख करें।

प्रेस वार्ता में मौजूद बिरसा वाहिनी फाउंडेशन की संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रिया मुंडा ने कहा कि देश के कई राज्यों में अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान लागू हैं और झारखंड के कई जिलों में पेसा कानून भी प्रभावी है। इसके बावजूद आदिवासी समाज के प्राकृतिक संसाधनों, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा को लेकर चुनौतियां बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि समाज में विभाजन या वैमनस्य फैलाने वाली गतिविधियों का विरोध किया जाएगा और ऐसे प्रयासों के खिलाफ सामाजिक स्तर पर कार्रवाई की जाएगी।

केंद्रीय सरना समिति महिला मोर्चा की अध्यक्ष एंजेल लकड़ा ने कहा कि धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों को अपने चुने हुए धर्म का पालन करने की पूरी स्वतंत्रता है। हालांकि उन्होंने कहा कि सरना धर्म की विशिष्ट पहचान को किसी अन्य धार्मिक पहचान के साथ जोड़ने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, समाज में भ्रम और मतभेद पैदा करने वाली प्रवृत्तियों से बचना आवश्यक है।

कार्यक्रम में विभिन्न सामाजिक और सरना संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इनमें बिरसा वाहिनी फाउंडेशन के निदेशक विजय मुंडा, सरना आदिवासी विकास एकता मंच महुआडांड़ (लातेहार) के अध्यक्ष मंगलदेव नगेसिया, संरक्षक विजय कुमार नगेसिया, रांची जिला सरना समिति के अध्यक्ष अमर तिर्की, बोकारो जिला सरना समिति के अध्यक्ष विनय मुर्मू, बेरमो सरना समिति के अध्यक्ष राजेश उरांव, समाजसेवी सबिता कच्छप, वर्षा गाड़ी, लोहरदगा जिला सरना समिति के दिलेश्वर उरांव, महासचिव संजय तिर्की, संरक्षक भुवनेश्वर लोहरा, किशन लोहरा, सोनू उरांव, पंचम तिर्की, सोहन कच्छप सहित कई अन्य लोग उपस्थित रहे।

प्रेस वार्ता में वक्ताओं ने आदिवासी समाज की अलग धार्मिक पहचान, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा को लेकर एकजुटता बनाए रखने पर जोर दिया।