सारंडा में कमजोर हुआ माओवादी नेटवर्क, मिसिर बेसरा का करीबी डॉक्टर जंगल छोड़कर फरार
सारंडा में कमजोर हुआ माओवादी नेटवर्क, मिसिर बेसरा का करीबी डॉक्टर जंगल छोड़कर फरार
झारखंड के सारंडा और कोल्हान क्षेत्र में सुरक्षाबलों की लगातार कार्रवाई का असर अब माओवादी संगठन पर दिखाई देने लगा है। सुरक्षा सूत्रों के अनुसार प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) के वरिष्ठ नेता और एक करोड़ रुपये के इनामी नक्सली मिसिर बेसरा को हाल ही में बड़ा झटका लगा है। लंबे समय से उसके साथ रहकर इलाज करने वाला निजी चिकित्सक रफीक उर्फ मंजीत कथित तौर पर जंगल छोड़कर अपने गृह राज्य पंजाब लौट गया है।
जानकारी के मुताबिक रफीक पेशे से एमबीबीएस डॉक्टर है और पंजाब का निवासी बताया जाता है। कहा जा रहा है कि वह माओवादी विचारधारा से प्रभावित होकर संगठन के संपर्क में आया था और बाद में शीर्ष नेताओं के भरोसेमंद सहयोगियों में शामिल हो गया। मिसिर बेसरा उम्र संबंधी कई बीमारियों, विशेषकर मधुमेह, से जूझ रहा है और रफीक ही जंगलों में उसका इलाज करता था। हालांकि हाल के महीनों में सुरक्षा बलों द्वारा चलाए जा रहे व्यापक अभियान और बढ़ती घेराबंदी के बीच उसने संगठन से दूरी बना ली और क्षेत्र छोड़ दिया।
सुरक्षा एजेंसियों के रिकॉर्ड के अनुसार मिसिर बेसरा 1990 के दशक से माओवादी गतिविधियों से जुड़ा हुआ है। वह संगठन की केंद्रीय समिति, पोलित ब्यूरो और केंद्रीय सैन्य आयोग से भी जुड़ा रहा है। उस पर कई बड़े हमलों की साजिश और नेतृत्व करने के आरोप हैं। वर्ष 2004 में सुरक्षाबलों पर हुए एक बड़े हमले में भी उसका नाम सामने आया था, जिसमें कई जवान मारे गए थे। वर्ष 2007 में उसे रांची से गिरफ्तार किया गया था, लेकिन दो साल बाद बिहार के लखीसराय कोर्ट परिसर पर हुए माओवादी हमले के दौरान वह फरार हो गया। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) भी उससे जुड़े मामलों की जांच कर रही है।
इधर, मिसिर बेसरा को लेकर हाल के समय में एक मानवीय पहलू भी चर्चा में आया था। उसके बेटे ने सोशल मीडिया के माध्यम से वीडियो जारी कर पिता से हिंसा का रास्ता छोड़कर घर लौटने की अपील की थी। परिवार की ओर से यह संदेश दिया गया था कि वह अब बाकी जीवन अपने परिजनों के बीच बिताए। सूत्रों के मुताबिक माओवादी गतिविधियों में शामिल होने के बाद उसका पारिवारिक जीवन बिखर गया था। पत्नी अलग हो गई, जबकि बेटे ने संघर्ष के बीच पढ़ाई पूरी कर नौकरी की राह चुनी। बताया जाता है कि बेटे ने कई बार पूर्व उग्रवादियों और स्थानीय संपर्कों के जरिए जंगलों तक संदेश पहुंचाने की कोशिश भी की, लेकिन अब तक कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली।
सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि निचले स्तर के उग्रवादियों की तुलना में शीर्ष माओवादी नेताओं को आत्मसमर्पण के लिए तैयार करना कहीं अधिक कठिन है। उनका कहना है कि मिसिर बेसरा और उसके करीबी अब भी संगठन की वैचारिक लाइन से जुड़े हुए हैं। पुनर्वास योजनाओं, प्रशासनिक प्रयासों और पारिवारिक अपीलों के बावजूद इन नेताओं के रुख में बदलाव नहीं देखा जा रहा है। यही वजह है कि सुरक्षा एजेंसियों के लिए शीर्ष स्तर के माओवादी नेतृत्व को मुख्यधारा में लाना अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।