बिहार में चल रहे चर्चित डस्टबिन घोटाले पर राजद सांसद सुधाकर सिंह ने तथ्यों के साथ सरकार पर बड़ा हमला बोला है. उन्होंने कहा कि डस्टबिन तो कचरा रखने के लिए होता है, लेकिन वर्तमान में राज्य सरकार ने खुद इतना कचरा फैला दिया है कि कोई डस्टबिन उसे नहीं समेट सकता. कहा कि बीएमएसआईसीएल ने साल 2023 में एक निविदा जारी की थी. यह निविदा माइक्रोवेव बेस्ड मेडिकल वेस्ट स्टेरलाइजेशन यूनिट, कस्टमाइज्ड बायोडिग्रेडेबल बैग और मास्टर बींस फॉर माइक्रोवेव के लिए निकाली गई थी.
उन्होंने बताया कि इस पूरी खरीद प्रक्रिया के लिए कुल 305.53 करोड़ रुपये का बजट तय किया गया था. इस भारी-भरकम बजट में से जमीन पर मुश्किल से केवल 29.05 करोड़ रुपये ही खर्च हुए. बाकी बचे 276.38 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का बड़ा घोटाला कर लिया गया है. यह 15,490 रुपये का खरीदा गया डस्टबिन है, जिसकी बाजार में अधिकतम वास्तविक कीमत केवल 1,500 रुपये के आसपास है. राजद सांसद सुधाकर सिंह, "डस्टबिन में डालने वाला बीन बैग जो उच्च गुणवत्ता वाला होता है, वह बाजार में इस क्षमता का केवल 7 से 9 रुपये में आसानी से मिल है. लेकिन बीएमएसआईसीएल ने उसे 109 रुपये प्रति बैग की दर पर खरीदा है. यह बाजार भाव से 10 से 11 गुना अधिक कीमत पर की गई खरीद है."
सुधाकर सिंह ने डस्टबिन दिखाते हुए कहा कि कागजों पर यह 75 लीटर का दिख रहा है. लेकिन जब उन्होंने खुद इसमें पानी डालकर चेक किया तो इसमें मात्र 60 लीटर ही पानी अटा. यानी डस्टबिन की क्षमता बताने में भी भारी घोटाला किया गया है. कहा कि पहले जब निविदा निकलती थी तो सामान बनाने वाली कंपनी यानी फर्स्ट पार्टी ही भाग लेती थी. लेकिन इस बार निविदा में थर्ड पार्टी के भाग लेने का नया नियम ला दिया गया. इसका सीधा मतलब यह है कि बिचौलियों को निविदा में शामिल होने का खुला आमंत्रण दिया गया. उन्होंने सबसे बड़ा सवाल उठाते हुए कहा कि जिस मशीन के वेस्ट को रखने के लिए इतने महंगे डस्टबिन खरीदे गए, वह मशीन कहीं फंक्शनल यानी चालू ही नहीं है. स्वास्थ्य विभाग में 13 मई 2024 को 23 माइक्रोवेव बेस्ट मेडिकल वेस्ट स्टेरलाइजेशन सिस्टम की आपूर्ति का उल्लेख है, जिसमें प्रति मशीन 15.62 लाख रुपये की राशि का जिक्र है.
सुधाकर सिंह ने कहा कि राज्य में एक-दो निगम को छोड़ दें तो बीएमएसआईसीएल जैसे तमाम निगम सीधे तौर पर मुख्यमंत्री और विकास आयुक्त के अधीन होते हैं. ऐसे घोटाले में सीधे तौर पर राज्य के विकास आयुक्त और बीएमएसआईसीएल के वे तमाम अधिकारी दोषी हैं, जो इस 2 वर्ष के घोटाले के कालखंड के दौरान अपने पद पर रहे. इसके लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री भी पूरी तरह दोषी हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि डस्टबिन की खरीद में मंत्री की कोई भूमिका नहीं है. इस पूरे प्रकरण में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने सिर्फ एक जगह हस्ताक्षर किए हैं और इसलिए वह थोड़े रूप से दोषी हैं. नियम के अनुसार किसी निगम में अगर किसी एक यूनिट सामान की कीमत 10 लाख रुपये से अधिक होती है, तो खरीद के लिए मंत्री का अनुमोदन लेना होता है. मंत्री ने केवल 23 मशीन की खरीद के लिए हस्ताक्षर किए थे.
सुधाकर सिंह ने कहा, "बिहार में मंत्री नाम मात्र के हैं और वह एक चपरासी की हैसियत रखते हैं. उनके पास कोई वास्तविक अधिकार नहीं होता है. इसी हक की लड़ाई को लेकर मैंने भी पूर्व में कृषि मंत्री का पद छोड़ दिया था. क्योंकि बीज निगम और किसानों से संबंधित जो भी निगम थे, वे कृषि मंत्री के प्रति जवाबदेह नहीं थे."
सुधाकर सिंह ने प्रशांत किशोर पर भी निशाना साधते हुए कहा कि वे नए-नए विधायक बने हैं. वे कहते हैं कि यह घोटाला मंगल पांडेय के कालखंड में नहीं, बल्कि उनसे पहले तेजस्वी यादव के स्वास्थ्य मंत्री रहते शुरू हुआ था और इस पर वह और अधिक पढ़ेंगे. उन्होंने कहा कि यह वही प्रशांत किशोर हैं जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सलाहकार रहने के दौरान कई निगम बनवाए और मंत्रियों के अधिकार छीन लिए. उन्होंने सात निश्चय योजना के माध्यम से बजट राशि की लूट कर मुख्यमंत्री कार्यालय तक पैसा पहुंचने का रास्ता तैयार किया था.
सुधाकर सिंह ने अंत में कहा कि वह इस पूरे मामले को लेकर हाईकोर्ट जाएंगे और डस्टबिन घोटाले की उच्च स्तरीय जांच की मांग करेंगे. पहले जो 300 करोड़ रुपये का टेंडर निकलता था, उसमें 30 से 35 करोड़ रुपये का घोटाला होता था. लेकिन अब इस सरकार में पूरा का पूरा पैसा ही घोटाला हो जा रहा है. वे डस्टबिन घोटाले के दोषियों की पहचान कर उन्हें सजा दिलाने के लिए आखिरी तक कानूनी लड़ाई लड़ेंगे. यह विवाद उस समय सामने आया जब बिहार के सरकारी अस्पतालों के लिए मेडिकल वेस्ट डस्टबिन की खरीद की दरें सामने आईं. इसमें प्रति यूनिट डस्टबिन की कीमत 15,490 रुपये आंकी गई थी. विपक्ष का आरोप है कि बाजार में सामान्य तौर पर जो डस्टबिन 500 से 1,500 रुपये के आसपास मिलता है, उसे कई गुना अधिक कीमत पर खरीदा गया. इसी कीमत के आधार पर आरजेडी ने सरकार पर निशाना साधते हुए 617 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप लगाया है.
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह खरीद स्वास्थ्य विभाग से जुड़े संस्थागत टेंडर और मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट के लिए बताई जा रही है. उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक इस मामले में टेंडर साल 2023 में फाइनल किए जाने का दावा सामने आया है. विवाद की जड़ उस दौर की खरीद प्रक्रिया में है, जबकि इसका राजनीतिक असर आज देखने को मिल रहा है. यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल बन गया है. आरोपों में पूर्व स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है. राजद का दावा है कि जिस अवधि में यह खरीद प्रक्रिया हुई, उस समय स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी मंगल पांडेय के पास थी. दूसरी तरफ इसी मुद्दे को लेकर तेजस्वी यादव के स्वास्थ्य मंत्री रहने के कार्यकाल को लेकर भी दावे हो रहे हैं. ऐसे में यह मामला एक ही राजनीतिक कार्यकाल तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग सरकारों में चली खरीद प्रक्रियाओं से जुड़ा है. हालांकि यह जांच में दस्तावेजों के आधार पर स्पष्ट होना बाकी है.
जन सुराज के सूत्रधार सह बांकीपुर विधायक प्रशांत किशोर ने डस्टबिन खरीद को लेकर कड़े सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि अगर 500 से 1,000 रुपये की कीमत वाला डस्टबिन करीब 15 हजार रुपये में खरीदा गया है, तो यह बेहद गंभीर मामला है. प्रशांत किशोर ने कहा कि जिस विभाग में ऐसी खरीद हुई है, उस विभाग से जुड़े मंत्री और अधिकारी इसके लिए सीधे तौर पर जवाबदेह होने चाहिए. उन्होंने इस मामले में तेजस्वी यादव और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय दोनों को लेकर सवाल खड़े किए हैं.
बांकीपुर के जन सुराज पार्टी के विधायक प्रशांत किशोर ने कहा, "इसकी खरीद की प्रक्रिया तब शुरू हुई थी जब महागठबंधन सरकार में तेजस्वी यादव स्वास्थ्य मंत्री थे. इसे अंतिम रूप तब दिया गया जब एनडीए सरकार आई और मंगल पांडेय स्वास्थ्य मंत्री बने. यदि इतने महंगे दाम पर कूड़ेदान खरीदे गए हैं, तो उस विभाग से जुड़े मंत्री और संबंधित अधिकारी दोनों ही समान रूप से दोषी हैं. दोनों के कार्यकाल की जांच होनी चाहिए." वहीं डस्टबिन विवाद में नाम आने पर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव हत्थे से उखड़ गए हैं. उन्होंने प्रशांत किशोर के बयान पर तीखा पलटवार करते हुए उनसे ही सीधा सवाल पूछ लिया है. तेजस्वी यादव ने कथित 617 करोड़ रुपये के डस्टबिन घोटाले को लेकर प्रशांत किशोर की टिप्पणी पर पूछा कि उनका स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय से आखिर क्या संबंध है? उन्होंने पीके से इस रिश्ते को लेकर सफाई की मांग की है.
नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने कहा कि अगर खरीद में कोई भी गड़बड़ी हुई है तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और सरकार को इस पर जवाब देना चाहिए. हर चीज का ठीकरा सिर्फ तेजस्वी पर फोड़ने से कुछ नहीं होने वाला है. अगर मैंने घोटाला किया है तो मुझे जेल में डालो. लगातार उठ रहे सवालों के बीच बिहार के स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने बड़ा कदम उठाया है. उन्होंने डस्टबिन खरीद में कथित अनियमितता की जांच के आदेश दे दिए हैं. बेगूसराय से मिली लिखित शिकायत के आधार पर स्वास्थ्य विभाग के विशेष सचिव को पूरे मामले की पड़ताल करने को कहा गया है. स्वतंत्र एजेंसी से भी जांच कराने की मांग सामने आई है. इसका मतलब है कि फिलहाल सरकारी स्तर पर भी मामला जांच के दायरे में आ गया है.
अनूप नारायण सिंह