पटना: किसान नेता राकेश टिकैत ने राज्य सरकार पर निशाना साधा है। बुधवार को राजधानी में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि बिहार में प्रस्तावित 11 सैटेलाइट टाउनशिप परियोजनाओं और हाल में लाए गए बिहार सिटी डेवलपमेंट एक्ट, 2026 को लेकर किसानों, भू-स्वामियों और आम नागरिकों के अधिकारों पर गंभीर सवाल हैं । इस पूरे मॉडल की समीक्षा से यह आशंका है कि यदि समय रहते पारदर्शिता, सामाजिक प्रभाव आकलन, उचित मुआवजा, पुनर्वास और किसानों की सहमति सुनिश्चित नहीं की गई, तो विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर कृषि भूमि का हस्तांतरण और जमीन के कारोबार को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि विकास का विरोध नहीं है, लेकिन ऐसा विकास स्वीकार नहीं किया जा सकता जिसकी कीमत किसान अपनी जमीन, आजीविका और सामाजिक सुरक्षा खोकर चुकाए ।
टिकैत ने कहा कि बिहार सरकार ने पटना, दरभंगा, छपरा, सोनपुर, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, गया, पूर्णिया, सीतामढ़ी, मुंगेर और सहरसा में बड़े पैमाने पर सैटेलाइट टाउनशिप विकसित करने की घोषणा की है । इन परियोजनाओं के लिए लाखों एकड़ भूमि को चिह्नित किया जा रहा है । उनका कहना था कि बिहार सिटी डेवलपमेंट एक्ट, 2026 को लेकर कई महत्वपूर्ण आपत्तियां हैं । इस कानून के तहत शहरों की स्थापना, विकास, नियंत्रण और प्रबंधन के लिए व्यापक शक्तियां प्रस्तावित हैं । पहले से मौजूद RFCTLARR Act, 2013 और बिहार भू-अर्जन नियमावली, 2014 में किसानों के हितों तथा सामाजिक प्रभाव आकलन, सहमति, पुनर्वास और मुआवजे के संबंध में जो सुरक्षा प्रावधान हैं, उनका नए कानून में किस तरह संरक्षण होगा । सबसे महत्वपूर्ण चिंता यह है कि किसानों की जमीन को केवल शहरी विकास की जमीन मानकर नहीं देखा जा सकता । जमीन किसान के लिए सिर्फ संपत्ति नहीं बल्कि आजीविका, सामाजिक सुरक्षा और आने वाली पीढ़ियों की आर्थिक नींव होती है ।
लैंड पूलिंग व्यवस्था को लेकर भी कई सवाल हैं । किसानों की जमीन लेकर उसका एक हिस्सा विकसित रूप में वापस देने की बात की जा रही है, लेकिन किसानों के सामने कई व्यावहारिक प्रश्न हैं । किसानों को वापस मिलने वाली जमीन का मूल्यांकन किस आधार पर होगा? किसान को किस स्थान और किस गुणवत्ता की जमीन मिलेगी? उस जमीन पर किसान के अधिकार क्या होंगे? विकसित जमीन की कीमत बढ़ने पर उस मूल्य वृद्धि में किसान की हिस्सेदारी क्या होगी? लैंड पूलिंग की किसी भी व्यवस्था में किसान को केवल जमीन देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि विकास प्रक्रिया का वास्तविक साझेदार बनाया जाना चाहिए । नगर नियोजन योजना के अंतर्गत भूमि उपयोग का एक प्रस्तावित वितरण दिया गया है । इसमें सड़क के लिए 22 प्रतिशत तक, नामित प्राधिकरण/नियोजक प्राधिकरण/पात्र विकासकर्ता द्वारा बिक्री हेतु 15 प्रतिशत, पार्क/खेल मैदान/उद्यान/विद्यालय/अस्पताल आदि के लिए 5 प्रतिशत, सामाजिक एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के आवास के लिए 3 प्रतिशत और भू-स्वामियों को वापस दी जाने वाली भूमि के लिए 55 प्रतिशत का उल्लेख है । साथ ही यह भी लिखा है कि ये प्रतिशत योजना की वित्तीय व्यवहार्यता के अनुसार बदल सकते हैं ।
इसका सीधा सवाल है कि किसान की जमीन के बदले उसे वास्तव में क्या मिलेगा? किस आधार पर मुआवजा तय होगा? भूमि के वर्तमान बाजार मूल्य का निर्धारण कैसे होगा? भविष्य में बढ़ने वाले भूमि मूल्य में किसान की हिस्सेदारी क्या होगी? भूमि देने के बाद किसान और उसके परिवार की आजीविका कैसे सुरक्षित होगी? कानून में भूमि के बदले दिए जाने वाले मुआवजे की स्पष्ट फार्मूला/जिक्र का अभाव है तथा पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन के स्पष्ट प्रावधानों को लेकर गंभीर प्रश्न हैं ।
सबसे गंभीर प्रश्नों में से एक यह है कि बड़े पैमाने पर भूमि परिवर्तन और शहरीकरण से पहले Social Impact Assessment (SIA) और सामाजिक ऑडिट की व्यवस्था कितनी मजबूत है । नए कानून में सामाजिक ऑडिट अथवा सामाजिक प्रभाव आकलन की व्यवस्था नहीं है । साथ ही सार्वजनिक और निजी उद्देश्य के बीच स्पष्ट अंतर, जमीन लेने के मामले में सहमति और पुनर्वास-पुनर्स्थापन से संबंधित प्रावधानों की अनुपस्थिति पर भी गंभीर सवाल हैं । यह सिर्फ कानूनी विषय नहीं है । इसका सीधा संबंध हजारों परिवारों के भविष्य से है । यदि किसी गांव की कृषि भूमि को टाउनशिप, कॉरिडोर, अपार्टमेंट, मॉल या व्यावसायिक परियोजना में बदल दिया जाता है, तो सरकार को केवल जमीन की कीमत नहीं देखनी चाहिए । उसे यह भी देखना चाहिए कि उस जमीन से कितने परिवारों की आजीविका चलती है? कितने खेतिहर मजदूर प्रभावित होंगे? सिंचाई और जल स्रोतों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? स्थानीय बाजार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का क्या होगा? विस्थापित परिवारों का पुनर्वास कहां और कैसे होगा? जमीन खोने के बाद अगली पीढ़ी के पास आय का स्थायी साधन क्या होगा? किसान को केवल चेक देकर विस्थापित कर देना पुनर्वास नहीं है ।
उन्होंने सवाल उठाया कि बिहार सिटी डेवलपमेंट अथॉरिटी (BCDA) के गठन को लेकर भी महत्वपूर्ण प्रश्न हैं । इसमें अध्यक्ष/उपाध्यक्ष और सदस्यों की संरचना में निर्वाचित प्रतिनिधियों, स्वतंत्र/न्यायिक सदस्यों और सार्वजनिक भागीदारी के अभाव पर आपत्ति दर्ज है । यदि किसी प्राधिकरण को हजारों एकड़ भूमि के उपयोग, पुनर्गठन, विकास और नियोजन से जुड़े महत्वपूर्ण अधिकार दिए जा रहे हैं, तो उसमें स्थानीय जनता, निर्वाचित प्रतिनिधियों, किसानों और स्वतंत्र विशेषज्ञों की भागीदारी क्यों नहीं होनी चाहिए? लोकतंत्र में जनता की जमीन से जुड़े निर्णय केवल सरकारी कार्यालयों में बैठकर नहीं लिए जा सकते । विवादों के निपटारे तथा सरकार द्वारा अंतिम निर्णय लेने से जुड़े प्रावधानों पर भी न्यायिक अधिकारों के केंद्रीकरण की आशंका है । सरकार यदि बिहार को आधुनिक बनाना चाहती है तो उसका स्वागत है । लेकिन आधुनिक बिहार का अर्थ यह नहीं हो सकता कि गांवों की उपजाऊ जमीन को बड़े रियल एस्टेट प्रोजेक्टों के लिए उपलब्ध करा दिया जाए । हमें स्मार्ट गांव, मजबूत कृषि, बेहतर सिंचाई, स्थानीय रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण उद्योग चाहिए। सैटेलाइट टाउनशिप के नाम पर यदि कृषि भूमि धीरे-धीरे रियल एस्टेट बाजार में बदलती है तो इसका सबसे बड़ा नुकसान किसान और ग्रामीण समाज को होगा । आज किसान जमीन बेचकर कुछ लाख या करोड़ रुपये पा सकता है, लेकिन जमीन बेचने के बाद उसकी नियमित कृषि आय समाप्त हो जाएगी । कुछ वर्षों में वही परिवार आर्थिक संकट में पहुंच सकता है । कोरोना महामारी संकट के समय बड़ी संख्या में लोग शहरों से अपने गांव लौटे थे और गांव तथा जमीन उनके लिए सुरक्षा का आधार बनी । कृषि भूमि केवल आर्थिक संपत्ति नहीं है । यह किसान परिवार की आजीविका, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी होती है । इसलिए कृषि भूमि के उपयोग में बदलाव करते समय सरकार को दीर्घकालिक प्रभावों का भी मूल्यांकन करना चाहिए ।
उनका कहना था कि इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से सरकार से मांग है। इसके तहत बिहार सिटी डेवलपमेंट एक्ट, 2026 की तत्काल तत्काल समाप्त की जाए और किसान विरोधी प्रावधानों को वापस लिया जाए साथ ही प्रत्येक परियोजना के लिए अनिवार्य रूप से Social Impact Assessment और Social Audit कराये जाने, भूमि अधिग्रहण एवं मुआवजे में RFCTLARR Act, 2013 के किसान हितैषी प्रावधानों को कमजोर न करने, लैंड पूलिंग में किसानों को मिलने वाली जमीन, उसके मूल्य और अधिकारों की स्पष्ट कानूनी गारंटी दी जाने, सर्किल रेट और वास्तविक बाजार मूल्य के अंतर को दूर करने के लिए पारदर्शी मूल्य निर्धारण व्यवस्था बनाने, सैटेलाइट टाउनशिप से संबंधित सभी प्रस्ताव, क्षेत्रफल, मास्टर प्लान और भूमि उपयोग की जानकारी सार्वजनिक करना शामिल है। ।
सैटेलाइट टाउनशिप का मॉडल जनहित और सार्वजनिक विकास का मॉडल नहीं है यह जमीन के बड़े पैमाने पर पुनर्वितरण और रियल एस्टेट कारोबार का नया रास्ता हैं । बिहार के किसानों की जमीन कोई खाली पड़ी हुई संपत्ति नहीं है। यह उनकी रोटी, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है। बिहार को ग्रीनलैंड सैटेलाइट राजशाही नहीं, हमें स्मार्ट गांव चाहिए। यदि हमारी मांगों को एक माह में नहीं माना जाता है तो संयुक्त किसान मोर्चा और बिहार के सभी किसान संगठन नवंबर में पटना में व्यापक किसान मार्च आयोजित किया जाएगा । और जब तक यह कानून वापस नहीं लिया जाता हैं तब तक किसान धरना पर बैठेंगे । यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि किसानों की जमीन, आजीविका, अधिकार और भविष्य से जुड़े सवालों की लड़ाई है। किसानों के भूमि संबंधी मुद्दों को लेकर सड़क से सदन तक किसानों की आवाज उठायेंगे ।