'इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा' उर्दू के मशहूर शायर बशीर बद्र का निधन, इंदिरा गांधी ने पाकिस्तानी पीएम को सुनाई थी कहानी

मशहूर उर्दू शायर, आधुनिक गजल के बेमिसाल उस्ताद और पद्मश्री सम्मान से सम्मानित बशीर बद्र का गुरुवार को निधन हो गया। मशहूर शायर ने 91 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया।

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Amit Kumar
Updated at : May 28, 2026, 4:53:00 PM

मशहूर उर्दू शायर, आधुनिक गजल के बेमिसाल उस्ताद और पद्मश्री सम्मान से सम्मानित बशीर बद्र का गुरुवार को निधन हो गया।  मशहूर शायर ने  91 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके निधन से साहित्य, कला और उर्दू अदब से जुड़े लोगों में शोक की लहर दौड़ गई। डॉ. बशीर बद्र लंबे समय से डिमेंशिया (स्मृतिलोप) और उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे। पिछले कई वर्षों से उनकी तबीयत लगातार खराब चल रही थी और वे सार्वजनिक कार्यक्रमों से भी दूर हो गए थे। भोपाल में इलाज के दौरान लंबी बीमारी की वजह से उनका निधन हो गया।

मशहूर शायर बशीर बद्र  के निधन की खबर सुनकर लाखों प्रशंसक को शोक की लहर है। उन्हें आधुनिक गजल के उस्ताद माना जाता है. साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। डॉ. बशीर बद्र लंबे समय से डिमेंशिया (स्मृतिलोप) और उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे। बीमारी के चलते उनकी स्मरण शक्ति लगभग खत्म हो चुकी थी और वे अपने करीबियों को पहचानने में भी असमर्थ हो गए थे। 

पिछले कुछ महीनों से उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही थी और उन्होंने सार्वजनिक जीवन से लगभग दूरी बना ली थी। बशीर बद्र भले ही अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनकी शायरी हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेगी।  उनकी गजलें आने वाली पीढ़ियों को भी मोहब्बत, इंसानियत और जिंदगी के एहसास सिखाती रहेंगी। उर्दू अदब की दुनिया में उनका जाना एक ऐसा नुकसान माना जा रहा है, जिसकी भरपाई शायद कभी नहीं हो पाएगी। 

बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को यूपी के अयोध्या में हुआ था।  उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) से अपनी उच्च शिक्षा और पीएचडी पूरी की और वहां उर्दू के प्रोफेसर के रूप में भी सेवाएं दीं।  बाद में वे मेरठ कॉलेज में उर्दू विभाग के प्रमुख और लेक्चरर रहे, जहां उन्होंने लगभग 17 वर्षों तक शिक्षण कार्य किया।  वे उर्दू, फारसी, हिंदी और अंग्रेजी भाषा पर शानदार पकड़ रखते थे। 

बद्र साहब को आम बोलचाल की सरल, रूमानी और बेहद प्रभावशाली भाषा में गजलें लिखने के लिए जाना जाता है। उन्होंने कई प्रसिद्ध किताबें लिखीं, जिनमें 'इमकान', 'आहटें', 'कुल्लियात-ए-बशीर बद्र' और 'उजाले अपनी यादों के' शामिल हैं। अपनी नफासत भरी शायरी और बेहद सरल अंदाज के कारण बशीर बद्र ने गजल को सिर्फ साहित्यिक मंचों तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि आम लोगों की जिंदगी का हिस्सा बना दिया। 

उनका मशहूर शेर-“कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से…”आज भी लोगों की जुबान पर रहता है। उनकी ग़ज़लों की खासियत यह थी कि वे मुश्किल अल्फाज़ के बजाय आसान भाषा में गहरी बातें कह जाते थे। यही वजह रही कि उनकी शायरी सिर्फ मुशायरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि आम लोगों के दिलों में बस गई। 

बशीर बद्र ने भारत के बंटवारे के वक्त भी कई शायरी लिखीं, जो आज तक लोगों के जहन में हैं। शिमला समझौते के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के जुल्फिकार अली भुट्टो को बशीर बद्र की बंटवारे के वक्त लिखा एक शेर सुनाया था। ये शेर था  

"दुश्मनी जमके करो लेकिन ये गुंजाइश रहे 

जब कभी हम दोस्त बन जाएं तो शर्मिन्दा ना हों."

उर्दू शायरी के जरिए मोहब्बत की बातें करने वाले बशीर बद्र को साल 1987 में मेरठ के सांप्रदायिक दंगों में नफरत का सामना करना पड़ा था।  इन दंगों में उनका घर जला दिया गया था।  इस हादसे में उनकी कई ऐतिहासिक अप्रकाशित रचनाएं और कविताएं हमेशा के लिए नष्ट हो गईं।  इस घटना के बाद ही वे हमेशा के लिए भोपाल शिफ्ट हो गए थे।