भोजपुरी के पहले महानायक कुणाल सिंह, 250 से अधिक फिल्म, मंत्री के बेटे को भा गया फिल्मी दुनिया

भोजपुरी सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्हें केवल अभिनेता कहना उनके योगदान को छोटा करना होगा। कुणाल सिंह ऐसा ही एक नाम हैं। आज भोजपुरी फिल्मों में महानायक, सुपरस्टार और मेगास्टार जैसे विशेषण सहजता से इस्तेमाल होते हैं।

भोजपुरी सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्हें केवल अभिनेता कहना उनके योगदान को छोटा करना होगा। कुणाल सिंह ऐसा ही एक नाम हैं। आज भोजपुरी फिल्मों में महानायक, सुपरस्टार और मेगास्टार जैसे विशेषण सहजता से इस्तेमाल होते हैं, लेकिन जिस दौर में भोजपुरी सिनेमा अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहा था, उस समय एक अभिनेता ने इस भाषा की फिल्मों को सिनेमाघरों में दर्शकों की पहली पसंद बनाया। वह अभिनेता थे—कुणाल सिंह। उन्हें भोजपुरी सिनेमा का ‘अमिताभ बच्चन’ भी कहा गया और जितेंद्र से उनकी शक्ल की समानता के कारण उस दौर में उनकी तुलना बॉलीवुड के लोकप्रिय स्टार जितेंद्र से भी होती रही। चार दशक से अधिक के करियर में उनके नाम 250 से अधिक फिल्मों में काम करने का उल्लेख मिलता है। मंत्री के बेटे को राजनीति नहीं, फिल्मों की दुनिया खींच रही थी.

कुणाल सिंह का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था जहां राजनीति और सार्वजनिक जीवन कोई नई चीज नहीं थी। उनके पिता बुद्धदेव सिंह यादव कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, विधायक और बाद में बिहार सरकार में मंत्री रहे। कुणाल सिंह ने खुद कई मौकों पर बताया है कि जब वह मुंबई फिल्मों में काम करने पहुंचे, तब उनके पिता मंत्री थे। बुद्धदेव सिंह का राजनीतिक जीवन विधायक से शुरू होकर मंत्री पद तक पहुंचा और वह चाहते थे कि बेटा परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाए, राजनीति अथवा पारिवारिक जिम्मेदारियों में आए। लेकिन बेटे के मन में कुछ और ही था।

उस समय बॉलीवुड में जितेंद्र अपने चरम पर थे। कुणाल सिंह का चेहरा-मोहरा जितेंद्र से काफी मिलता था। आर्थिक रूप से उन्हें संघर्ष करने की वैसी मजबूरी भी नहीं थी जैसी मुंबई आने वाले अधिकांश नए कलाकारों की होती है। बावजूद इसके फिल्मी दुनिया में पहचान बनाने का रास्ता उन्होंने अपनी मेहनत से चुना।दिसंबर 1977 में वह मुंबई पहुंचे। शुरुआती दौर आसान नहीं था। यहां तक कि एक रंगमंच निर्देशक ने उन्हें यह तक कह दिया था कि अभिनय उनके बस की बात नहीं। लेकिन इस टिप्पणी ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि जिद और मजबूत कर दी।

‘कल हमारा है’ से शुरू हुआ फिल्मी सफर

कुणाल सिंह को पहला बड़ा फिल्मी अवसर हिंदी फिल्म ‘कल हमारा है’ में मिला। गिरिश रंजन निर्देशित यह फिल्म 1980 में आई और बिहार-उत्तर प्रदेश में इसे अच्छा रिस्पॉन्स मिला। कुणाल सिंह ने इसमें टांगा चालक की भूमिका निभाई। इसी फिल्म के बाद उनके लिए भोजपुरी सिनेमा के दरवाजे खुलने लगे। इसके बाद 1981 में आई ‘धरती मैया’ ने उन्हें भोजपुरी सिनेमा में स्थापित कर दिया। इसमें उन्होंने एक भटके हुए युवक की भूमिका निभाई। फिर 1983 में आई ‘गंगा किनारे मोरा गांव’ ने कुणाल सिंह को वह लोकप्रियता दी, जिसने उन्हें भोजपुरी सिनेमा का बड़ा सितारा बना दिया।

फिल्म की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जाता है कि वाराणसी के एक सिनेमाघर में यह करीब 16 महीने तक चली। यहीं से भोजपुरी फिल्मों में कुणाल सिंह का वह दौर शुरू हुआ, जब निर्माता की नजर में फिल्म का सबसे भरोसेमंद चेहरा वही थे। एक के बाद एक हिट और कुणाल सिंह बन गए ‘भोजपुरी के महानायक’.‘धरती मैया’ और ‘गंगा किनारे मोरा गांव’ की सफलता के बाद कुणाल सिंह भोजपुरी सिनेमा के सबसे बड़े नायकों में शामिल हो गए। उनकी फिल्मों में गांव, परिवार, प्रेम, संघर्ष, सामाजिक रिश्ते और भोजपुरी समाज की संवेदनाएं दिखाई देती थीं। यही वजह थी कि उनका दर्शक वर्ग केवल युवा नहीं था; परिवार के लोग भी उनकी फिल्मों को देखने सिनेमाघरों तक पहुंचते थे।

उनकी कई फिल्मों ने सिल्वर जुबली, गोल्डन जुबली और प्लेटिनम जुबली तक मनाई। अमर उजाला से बातचीत में कुणाल सिंह ने भी उस दौर को याद करते हुए बताया था कि उनकी कई फिल्में 25, 50 और 75 सप्ताह तक सिनेमाघरों में चलीं। उनकी फिल्मों में ‘बिहारी बाबू’, ‘दुल्हा गंगा पार के’, ‘बेटी उधार के’, ‘सोहाग बिंदिया’, ‘धरती की आवाज’, ‘दगाबाज बलमा’ और ‘हमार दुल्हा’ जैसे नाम शामिल हैं। ‘दगाबाज बलमा’ 1988 की भोजपुरी फिल्म थी, जिसका निर्देशन उनकी पत्नी आरती भट्टाचार्य ने किया था और इसमें कुणाल सिंह मुख्य भूमिका में थे।

भोजपुरी फिल्मों की लंबी फेहरिस्त

कुणाल सिंह के करियर की पूरी फिल्मोग्राफी अलग-अलग स्रोतों में अलग-अलग संख्या में दर्ज है। धरती मैया (1981), गंगा किनारे मोरा गांव (1983), हमार भौजी, बिहारी बाबू (1985), दुल्हा गंगा पार के (1986), बेटी उधार के (1986), सोहाग बिंदिया (1986), धरती की आवाज (1987), दगाबाज बलमा (1988), हमार दुल्हा (1989), बैरी कंगना (1992), दुल्हा मिलल दिलदार (2005), राजा भोजपुरिया (2005), लंदन वाली से नेह लगावली (2007), बांके बिहारी एमएलए (2007), राम बलराम (2007), जय मैया अंबा भवानी (2008), सइयां अनाड़ी बा हमार (2008), भैया के साली (2008), सास रानी बहू नौकरानी (2009), मल्ल युद्ध (2011), डॉक्टर बाबू (2012), कजरा मोहब्बत वाला (2013), दबंग मोरा बलमा (2013), संसार (2013), लाल दुपट्टे वाली (2014), राजा जी आई लव यू (2014), दरिया दिल (2014), भोजपुरीया नायक द बॉस (2014), सइयां तूफानी (2015), गुलामी (2015), मोकामा 0 KM (2016), तेरे जैसा यार कहां (2017), शहंशाह (2017), माई के अचरा बाबूजी के दुलार (2017), ससुराल (2017), बिहारी सरदार (2017), प्रेम प्यार में (2017), बैरी कंगना-2 (2018), भौजी पटानिया (2018), चोर पुलिस (2019), 9MM पिस्टल (2021), आशिकी (2022), आंगन की लक्ष्मी (2023), रंग दे बसंती (2024) और ये है स्वर्ग हमारा (2025)।

इनमें कई फिल्मों में वह वरिष्ठ कलाकार या सहायक भूमिका में नजर आए, जबकि अपने स्वर्णिम दौर में वह लगभग हर फिल्म के केंद्रीय नायक थे।जब भोजपुरी सिनेमा ठहर गया, कुणाल सिंह ने टीवी की ओर रुख किया.भोजपुरी सिनेमा का एक दौर ऐसा भी आया जब फिल्मों का निर्माण लगभग ठहर गया। सिनेमाघरों में भोजपुरी फिल्मों की संख्या कम होती गई और पूरी इंडस्ट्री संकट में पहुंच गई।

कुणाल सिंह ने उस दौर में खुद को निष्क्रिय नहीं होने दिया। पत्नी आरती भट्टाचार्य, जो खुद अभिनेत्री, लेखिका और निर्देशक रही हैं, के साथ उन्होंने प्रोडक्शन के क्षेत्र में काम किया। आगे चलकर परिवार की अगली पीढ़ी भी इसी क्षेत्र में आई। उनके बेटे आकाश सिंह ने 2013 की हिंदी फिल्म ‘ब्लडी इश्क’ से अभिनय की शुरुआत की, जिसका निर्माण Aashawari Media Pvt. Ltd. के बैनर के तहत हुआ और कुणाल सिंह निर्माता थे। आरती भट्टाचार्य फिल्म की लेखिका थीं।

यह दौर बताता है कि कुणाल सिंह केवल अभिनेता नहीं थे; उन्होंने कैमरे के सामने से लेकर प्रोडक्शन की जिम्मेदारी तक सिनेमा को समझने और आगे बढ़ाने का काम किया।भोजपुरी सिनेमा लौटा तो फिर लौटे कुणाल सिंह.जब भोजपुरी फिल्मों का नया दौर शुरू हुआ और रवि किशन, मनोज तिवारी, निरहुआ, पवन सिंह तथा खेसारी लाल यादव जैसे कलाकारों ने भोजपुरी सिनेमा को नई पीढ़ी का दर्शक दिया, तब कुणाल सिंह ने भी वापसी की।

अब वह फिल्म के युवा नायक नहीं, बल्कि उस नायक की विरासत के प्रतीक थे जिसने भोजपुरी सिनेमा के पुराने दौर को लोकप्रिय बनाया था। ‘मोकामा 0 KM’, ‘गुलामी’, ‘तेरे जैसा यार कहां’, ‘शहंशाह’, ‘बैरी कंगना-2’, ‘भौजी पटानिया’, ‘आशिकी’ जैसी फिल्मों में उन्होंने नई पीढ़ी के कलाकारों के साथ काम किया।2022 की ‘आशिकी’ में वह खेसारी लाल यादव और आम्रपाली दुबे के साथ दिखाई दिए। बाद के वर्षों में भी उनकी सक्रियता बनी रही। ‘आंगन की लक्ष्मी’, ‘रंग दे बसंती’ और ‘ये है स्वर्ग हमारा’ जैसी फिल्मों में उनकी मौजूदगी यह बताती है कि भोजपुरी सिनेमा के इस दिग्गज ने उम्र को कभी अपने अभिनय के रास्ते की दीवार नहीं बनने दिया. राजनीति में भी उतरे, लेकिन मुकाबला आसान नहीं था.

उनके पिता बुद्धदेव सिंह यादव स्वयं विधायक और मंत्री रहे थे

जिस परिवार से वह आए थे, राजनीति उनके लिए अनजान जमीन नहीं थी। उनके पिता बुद्धदेव सिंह यादव स्वयं विधायक और मंत्री रहे थे। कुणाल सिंह ने अपने पिता के राजनीतिक जीवन को बचपन से देखा था। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर पटना साहिब से चुनाव लड़ा.सामने थे बॉलीवुड के ‘बिहारी बाबू’ शत्रुघ्न सिन्हा, जो भाजपा के उम्मीदवार थे। बिहार के दो फिल्मी चेहरों के बीच यह मुकाबला बेहद चर्चित हुआ। तत्कालीन मीडिया ने इसे ‘बिहारी बाबू बनाम भोजपुरी बाबुआ’ तक कहा। 

कुणाल सिंह की कहानी दिलचस्प इसलिए भी है कि वह राजनीति के ऐसे घराने से निकले थे जहां उनके लिए राजनीति का रास्ता खुला हुआ था। पिता मंत्री थे, संसाधनों की कमी नहीं थी, परिवार की अपनी राजनीतिक पहचान थी। लेकिन उन्होंने आसान रास्ता छोड़कर अभिनय का रास्ता चुना। मुंबई पहुंचे तो उन्हें संघर्ष करना पड़ा। जिस अभिनेता से शक्ल मिलती थी, वह उस समय हिंदी सिनेमा का बड़ा सितारा था। लेकिन कुणाल ने किसी की नकल करके नहीं, बल्कि भोजपुरी समाज की अपनी भाषा, संस्कृति और संवेदना को पर्दे पर जीकर अपनी पहचान बनाई।‘कल हमारा है’ से शुरू हुआ यह सफर ‘धरती मैया’ और ‘गंगा किनारे मोरा गांव’ से होते हुए भोजपुरी सिनेमा के उस मुकाम तक पहुंचा, जहां कुणाल सिंह सिर्फ अभिनेता नहीं रहे—वह स्वयं भोजपुरी सिनेमा की एक पहचान बन गए।

राष्ट्रकवि दिनकर सम्मान से लेकर राष्ट्रपति भवन में सम्मानित होने तक उनका सफर इस बात का प्रमाण है कि भोजपुरी सिनेमा के शुरुआती स्वर्णिम दौर को समझना हो तो कुणाल सिंह को समझना जरूरी है। 2012 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने उन्हें राष्ट्रकवि दिनकर सम्मान से सम्मानित किया था।आज भोजपुरी सिनेमा में कई नायक हैं, कई सुपरस्टार हैं और कई करोड़ों की कमाई करने वाले सितारे हैं। लेकिन ‘पहला महानायक’ कहे जाने का गौरव जिस पीढ़ी के कलाकारों ने हासिल किया, उसमें कुणाल सिंह का नाम सबसे ऊपर आता है।क्योंकि उन्होंने सिर्फ फिल्में नहीं कीं—उन्होंने उस दौर में भोजपुरी सिनेमा को दर्शक, पहचान और स्टारडम दिया, जब इस उद्योग को खुद अपने अस्तित्व के लिए लड़ना पड़ रहा था।

अनूप नारायण सिंह की रिपोर्ट