जल-जंगल-जमीन की लड़ाई के योद्धा को श्रद्धांजलि, नेमरा से फिर गूंजेगा झारखंड आंदोलन का इतिहास

जल-जंगल-जमीन की लड़ाई के योद्धा को श्रद्धांजलि, नेमरा से फिर गूंजेगा झारखंड आंदोलन का इतिहास

झारखंड आंदोलन के प्रमुख शिल्पकार और दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि पर सोमवार को उनका पैतृक गांव रामगढ़ जिले का नेमरा और लुकैयाटांड़ राज्य की राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र बनने जा रहा है। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को केवल श्रद्धांजलि सभा नहीं, बल्कि झारखंड आंदोलन के इतिहास, संघर्ष और उस विचारधारा को याद करने का अवसर माना जा रहा है, जिसने अलग राज्य के निर्माण की नींव रखी।

शिबू सोरेन का राजनीतिक और सामाजिक जीवन आदिवासियों, मूलवासियों और वंचित तबकों के अधिकारों की लड़ाई से जुड़ा रहा। उन्होंने ग्रामीण इलाकों में व्याप्त शोषण, महाजनी प्रथा और सामाजिक असमानता के खिलाफ आवाज बुलंद की। शुरुआती दौर में गांव-गांव जाकर लोगों को संगठित करने वाले शिबू सोरेन ने जल, जंगल और जमीन के अधिकारों को आंदोलन का मुख्य आधार बनाया। यही संघर्ष आगे चलकर झारखंड राज्य आंदोलन की सबसे मजबूत पहचान बना और लोगों ने उन्हें सम्मानपूर्वक 'दिशोम गुरु' की उपाधि दी।

सत्तर और अस्सी के दशक में अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर आंदोलन निर्णायक चरण में पहुंचा। इस दौरान झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के माध्यम से आंदोलन को संगठित स्वरूप मिला। आंदोलन के दौरान कई चुनौतियां सामने आईं, कानूनी कार्रवाई और राजनीतिक दबाव भी झेलने पड़े, लेकिन शिबू सोरेन अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटे। उन्होंने केवल राजनीतिक संघर्ष तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि शिक्षा और सामाजिक जागरूकता को भी समान महत्व दिया। लुकैयाटांड़ में स्थापित सोना सोबरन स्कूल उनके इसी दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।

पहली पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, गांडेय विधायक कल्पना सोरेन, राज्य सरकार के मंत्री, विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता, झामुमो कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में आम लोगों के शामिल होने की संभावना है। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण लुकैयाटांड़ स्थित सोना सोबरन स्कूल परिसर में स्थापित दिशोम गुरु शिबू सोरेन की आदमकद प्रतिमा का अनावरण होगा। इसे उनके योगदान और संघर्ष की स्थायी स्मृति के रूप में देखा जा रहा है।

झारखंड के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में शिबू सोरेन की लोकप्रियता आज भी स्पष्ट दिखाई देती है। राज्य के अनेक समर्थक उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए उनके नाम या चित्र का टैटू तक बनवाते हैं। समर्थकों के बीच उनकी पहचान केवल एक वरिष्ठ राजनेता की नहीं, बल्कि झारखंड की अस्मिता, अधिकारों की लड़ाई और सामाजिक न्याय के प्रतीक के रूप में बनी हुई है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि का यह आयोजन उनके संघर्ष, विचारों और झारखंड आंदोलन की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण अवसर होगा। यह दिन केवल श्रद्धांजलि अर्पित करने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राज्य के विकास, सामाजिक एकता और अधिकारों की रक्षा के संकल्प को दोहराने का भी संदेश देगा।