भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अपने महत्वाकांक्षी चंद्रयान-4 मिशन के लिए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट एक संभावित लैंडिंग क्षेत्र की पहचान कर ली है। वैज्ञानिकों ने चंद्रयान-2 ऑर्बिटर से प्राप्त हाई-रेजोल्यूशन तस्वीरों के आधार पर मॉन्स माउटन (MM-4) इलाके को उतरने के लिहाज से सबसे उपयुक्त माना है।
हालांकि ISRO ने स्पष्ट किया है कि लैंडिंग स्थल पर अंतिम निर्णय मिशन के लॉन्च के करीब लिया जाएगा।
मॉन्स माउटन चंद्रमा के साउथ पोल के नजदीक स्थित एक ऊंचा पर्वतीय क्षेत्र है, जिसकी ऊंचाई लगभग 6,000 मीटर बताई जाती है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसकी चोटी अपेक्षाकृत सपाट है, जिससे लैंडर को सुरक्षित उतारने में मदद मिल सकती है।
यह क्षेत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यहां लंबे समय तक सूर्य की रोशनी मिलने की संभावना रहती है। साथ ही इस इलाके में वॉटर आइस की मौजूदगी की संभावना भी जताई गई है, जो भविष्य के चंद्र अभियानों के लिए बेहद अहम साबित हो सकती है।
मिली जानकारी के अनुसार, इस संभावित लैंडिंग साइट से जुड़ी स्टडी को लूनर एंड प्लैनेटरी साइंस कॉन्फ्रेंस (LPSC 2026) में प्रस्तुत किया गया। इस अध्ययन के लिए चंद्रयान-2 ऑर्बिटर पर लगे ऑर्बिटर हाई रेजोल्यूशन कैमरा (OHRC) की तस्वीरों का उपयोग किया गया।
OHRC कैमरा चंद्र सतह की लगभग 32 सेंटीमीटर प्रति पिक्सल रेजोल्यूशन वाली तस्वीरें उपलब्ध कराता है। इससे छोटे क्रेटर, ढलान, पत्थर और सतह की बनावट तक साफ दिखाई देती है, जिससे संभावित खतरे वाले इलाकों को पहले ही चिन्हित किया जा सकता है।
वैज्ञानिकों ने मॉन्स माउटन क्षेत्र में चार अलग-अलग संभावित लैंडिंग स्थानों का मूल्यांकन किया, जिसमें MM-4 को सबसे सुरक्षित विकल्प बताया गया।
स्टडी के अनुसार:
इस इलाके में औसत ढलान करीब 5 डिग्री है, जबकि लैंडर 10 डिग्री तक के ढलान पर उतरने में सक्षम है।
यहां बड़े पत्थरों की संख्या कम पाई गई और अधिकांश बोल्डर 0.3 मीटर से छोटे हैं।
MM-4 क्षेत्र में लगातार 11 से 12 दिन तक सूर्य की रोशनी मिलने की संभावना है।
पृथ्वी के साथ रेडियो संचार भी इस क्षेत्र से बेहतर बना रह सकता है, जिससे मिशन के दौरान संपर्क में बाधा आने की आशंका कम होती है।
करीब 2104 करोड़ रुपये की लागत वाले चंद्रयान-4 मिशन का मुख्य उद्देश्य चंद्रमा की मिट्टी और चट्टानों के नमूने एकत्र कर उन्हें पृथ्वी पर वापस लाना है। इसे ISRO का अब तक का सबसे चुनौतीपूर्ण मून मिशन माना जा रहा है।
मिशन के तहत दो अलग-अलग रॉकेट इस्तेमाल किए जाएंगे। हैवी-लिफ्टर LVM-3 और ISRO का भरोसेमंद PSLV अलग-अलग पेलोड लेकर अंतरिक्ष में भेजे जाएंगे।
चंद्रयान-4 मिशन को दो स्टैक में विभाजित किया गया है।
स्टैक 1 में डिसेंडर मॉड्यूल (लैंडिंग और सैंपल कलेक्शन) तथा एसेंडर मॉड्यूल (सैंपल के साथ वापसी के लिए) शामिल रहेगा।
स्टैक 2 में प्रोपल्शन मॉड्यूल, ट्रांसफर मॉड्यूल और री-एंट्री मॉड्यूल शामिल होंगे, जो सैंपल को सुरक्षित पृथ्वी तक पहुंचाने में भूमिका निभाएंगे।
ISRO के वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि सब कुछ योजना के अनुसार रहा, तो चंद्रयान-4 भारत को चंद्रमा से सैंपल वापस लाने वाले चुनिंदा देशों की सूची में मजबूती से शामिल कर सकता है।