बाबूलाल का सिब्बल पर तीखा हमला, कहा- मनमुताबिक फैसला न आने पर न्यायपालिका की साख पर उठाते हैं सवाल

भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने वरिष्ठ अधिवक्ता एवं राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल को पत्र लिखकर न्यायपालिका के प्रति उनके रवैये, दोहरे मापदंडों और राजनीतिक बयानों पर कड़ा हमला बोला है।

रांची : भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने वरिष्ठ अधिवक्ता एवं राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल को पत्र लिखकर न्यायपालिका के प्रति उनके रवैये, दोहरे मापदंडों और राजनीतिक बयानों पर कड़ा हमला बोला है। मरांडी ने आरोप लगाया है कि जब अदालत का फैसला पक्ष में आता है तो न्याय प्रणाली सही लगती है, लेकिन प्रतिकूल स्थिति बनते ही सिब्बल सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता पर ही सवाल खड़े करने लगते हैं।

21 फरवरी 2024 के पत्र का दिया हवाला

बाबूलाल मरांडी ने पत्र में उल्लेख किया कि उन्होंने 21 फरवरी 2024 (पत्रांक 173/BLM/24) को भी सिब्बल को पत्र लिखकर इसी प्रवृत्ति पर आपत्ति जताई थी। दो साल बीत जाने के बाद भी उनके सार्वजनिक आचरण में कोई बदलाव नहीं आया है। मरांडी ने सवाल उठाया कि जब बात आपके अनुकूल नहीं होती, तो क्या आपका अहंकार इतना आहत हो जाता है कि आप सीधे सर्वोच्च न्यायालय की विश्वसनीयता पर उँगली उठाने लगते हैं? क्या सर्वोच्च न्यायालय को आपकी दलीलों के अनुसार ही काम करना चाहिए?

PMLA मामलों और SC/ST एक्ट के दुरुपयोग पर घेरा 

मरांडी ने सिब्बल द्वारा हेमंत सोरेन के साथ एक पॉडकास्ट में दिए गए बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि सिब्बल ने दावा किया था कि उनके खिलाफ चार पीएमएलए मामले हैं, जबकि हकीकत यह है कि ये सभी मामले राजनीतिक जन-आंदोलनों से जुड़े थे और न्यायालय में खारिज हो चुके हैं। मरांडी ने कहा कि गलत जानकारी फैलाने के लिए वे चाहते तो एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज करा सकते थे, लेकिन सार्वजनिक जीवन में इस कानून का व्यक्तिगत या राजनीतिक लाभ के लिए दुरुपयोग करना सही नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि हेमंत सोरेन सरकार ने राजनेताओं और अधिकारियों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट का दुरुपयोग करने का रिकॉर्ड बनाया है, जो संभवतः सिब्बल जैसे कानूनी सलाहकारों के इशारे पर हुआ है।

'जनता के पैसे से भारी-भरकम फीस ले रही सरकार'

पत्र में झारखंड सरकार द्वारा सिब्बल और उनकी टीम को दी जाने वाली कानूनी फीस पर भी सवाल उठाए गए हैं। मरांडी ने कहा कि सिब्बल ने झारखंड सरकार और उसके नेताओं का बचाव करने के लिए राजकोष से करोड़ों रुपये फीस, सलाह और चार्टर्ड प्लेन के नाम पर लिए हैं। यदि इन पैसों का उपयोग राज्य के विकास में होता, तो गरीब, दलित और आदिवासी परिवारों के लिए कई कॉलोनियां बनाई जा सकती थीं।डीजीपी नियुक्ति जैसे मामलों में, जहाँ सुप्रीम कोर्ट ने खुद सवाल खड़े किए हैं, सिब्बल सरकार के गैर-कानूनी फैसलों को बचाने के लिए ढाल बने हुए हैं।

'वकील, नेता या पॉडकास्टर—अपनी भूमिका स्पष्ट करें'

बाबूलाल मरांडी ने कपिल सिब्बल को सलाह दी कि वे अपनी भूमिका स्पष्ट करें। आप नेता, वकील या पॉडकास्टर में से कोई एक भूमिका तय करें। एक भूमिका में राजनीतिक माहौल बनाना, दूसरी में उसकी पैरवी करना और फैसला पक्ष में न आने पर न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा कर देना यह आचरण बेहद गंभीर सवाल खड़े करता है।" मरांडी ने अंत में कहा कि सर्वोच्च न्यायालय किसी वरिष्ठ अधिवक्ता की इच्छा या प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि संविधान से चलता है। अदालत को असहमत होने का पूरा अधिकार है और सिब्बल को भी यह परिपक्वता दिखानी चाहिए।

रांची से सुजीत कुमार की रिपोर्ट