झारखंड में स्थित पारसनाथ का तराई, जो कभी माओवादी संगठन की सबसे सुरक्षित शरणस्थली और नक्सलियों का नैहर कहा जाता था। आज यह इलाका सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों के बाद लगभग नक्सल मुक्त हो चुका है। अब यहाँ नक्सलियों की गोली की तड़तड़ाहट की आवाज नहीं, सुरक्षा बलों की बूट की आवाज गूंजती है। इस बूट की आवाज से स्थानीय ग्रामीणों को भय नहीं, सुकून महसूस होता है। गृह मंत्री अमित शाह के नक्सली मुक्त झारखंड अभियान के बाद पारसनाथ, टुंडी, गोमियां, दनियाँ समेत कई प्रमुख नक्सलियों के गढ़ माने जाने वाला क्षेत्रों में आज शांति का माहौल है।
पारसनाथ की जिस धरती से भाकपा (माओवादी) के कई बड़े कमांडर निकले, जहां से संगठन को नेतृत्व और कैडर मिलते थे, वहीं पर अब गिरफ्तारी, मुठभेड़ों और आत्मसमर्पण की लगातार घटनाओं ने माओवादी नेटवर्क की जड़ें लगभग ध्वस्त कर दी है। कहा जाता है कि बंगाल के नक्सलबाड़ी से उठे आंदोलन की लपटें झारखंड में पारसनाथ की तराई, धनबाद के टुंडी और गिरिडीह के पीरटांड़ इलाके तक पहुंचीं। जहां एमसीसी के संस्थापक नेताओं में गिने जाने वाले कन्हाई चटर्जी ने संगठन का विस्तार किया। दुर्गम जंगलों और पहाड़ी भूगोल ने इस क्षेत्र को वर्षों तक माओवादियों का अभेद्य गढ़ बनाए रखा था। यही कारण था कि स्थानीय लोग इसे 'नक्सलियों का नैहर' कहने लगे थे।
एक समय ऐसा भी था, जब झारखंड, बिहार और पड़ोसी राज्यों में सक्रिय लगभग हर बड़े माओवादी दस्ते में पारसनाथ क्षेत्र का कोई न कोई कैडर मौजूद रहता था। इसी इलाके के कई सदस्य संगठन के शीर्ष पदों पोलित ब्यूरो और सेंट्रल कमेटी तक पहुंचे। एक करोड़ रुपये के इनामी पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा पीरटांड़ प्रखंड के मदनाडीह गांव का रहने वाला बताया जाता है। वहीं पतिराम मांझी उर्फ अनल दा, जो संगठन की सेंट्रल कमेटी का सदस्य था और जिस पर भी एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित था, पीरटांड़ के झरहा गांव का निवासी था। अनल दा जनवरी 2026 में पश्चिमी सिंहभूम के सारंडा जंगल में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया।
पारसनाथ क्षेत्र में संगठन को एक के बाद एक बड़े झटके लगे। नागो और प्रभा गिरफ्तार हुए, साहेबराम मारा गया, रामदयाल और बलबीर ने आत्मसमर्पण किया, जबकि जया की इलाज के दौरान मौत हो गई। वही पीरटांड़ के नावाडीह निवासी 25 लाख रुपये के इनामी अजय महतो उर्फ टाइगर की गिरफ्तारी ने संगठन को एक और बड़ा झटका दिया है। संगठन को फिर से मजबूत करने की कोशिश करने वाले नेताओं में विवेक, साहेबराम मांझी, कृष्णा हांसदा और रणविजय प्रमुख थे। इनमें विवेक मुठभेड़ में मारा गया, साहेबराम भी ढेर हुआ और कृष्णा पहले ही गिरफ्तार हो चुका था।
पारसनाथ में माओवादी नेटवर्क को पहली बड़ी चोट 6 मार्च 2018 को लगी थी, जब तत्कालीन एसपी सुरेंद्र कुमार झा के नेतृत्व में डुमरी के अकबकीटांड़ में छापेमारी कर 15 माओवादियों को एक साथ गिरफ्तार किया गया था। इस कार्रवाई में 25 लाख रुपये के इनामी स्पेशल एरिया कमेटी सदस्य सुनील मांझी भी पकड़ा गया था। मौके से बरामद महत्वपूर्ण दस्तावेजों ने पुलिस को संगठन के नेटवर्क तक पहुंचने में बड़ी मदद दी। इसके बाद लगातार चल रहे संयुक्त अभियानों ओर खुफिया तंत्र के कारण कभी माओवादियों का सबसे सुरक्षित गढ़ माने जाने वाले पारसनाथ में संगठन अब पहले जैसा प्रभाव नहीं रहा।
पारसनाथ का वह दौर, जब इसे माओवादी संगठन की सबसे मजबूत नर्सरी माना जाता था, अब काफी पीछे छूट चुका है। झारखंड पुलिस, सीआरपीएफ ओर झारखंड जगुआर द्वारा अभियान चला कर लाल नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया गया। अब यहां शांति है। जिस क्षेत्र में कभी दिन के उजाले में भी कोई अनजान व्यक्ति आने-जाने से डरते थे यहां तक की सुरक्षा बल भी आसानी से नहीं पहुंच पाए थे वहां आज आम आदमी भी बेखौफ होकर जा रहे हैं।
संवाददाता विकाश कश्यप की रिपोर्ट