झारखंड में उग्रवाद के खिलाफ जारी सुरक्षा अभियान के तहत सुरक्षाबलों ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) के शीर्ष नेताओं में शामिल सेंट्रल कमेटी सदस्य और एक करोड़ रुपये के इनामी नक्सली मिसिर बेसरा को संयुक्त कार्रवाई के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया। इस अभियान में उसके साथ संगठन से जुड़े दो अन्य सक्रिय सदस्यों समेत कुल पांच लोगों को हिरासत में लिया गया है।
सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक, गिरिडीह और धनबाद की सीमा से सटे इलाके में विशेष अभियान चलाया जा रहा था। इसी दौरान खुफिया सूचना के आधार पर कार्रवाई करते हुए सुरक्षाबलों ने एक टाटा मैजिक वाहन को रोका, जिसमें मिसिर बेसरा अपने साथियों के साथ सवार था। घेराबंदी कर उसे बिना किसी बड़े प्रतिरोध के गिरफ्तार कर लिया गया।
गिरफ्तारी के बाद सभी आरोपियों से केंद्रीय और राज्य स्तर की सुरक्षा एजेंसियां संयुक्त रूप से पूछताछ कर रही हैं। अधिकारियों का मानना है कि पूछताछ के दौरान माओवादी संगठन के नेटवर्क, रणनीति और अन्य सक्रिय कैडरों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आ सकती हैं।
मिसिर बेसरा लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों की वांछित सूची में शामिल था। वह झारखंड के अलावा बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में माओवादी गतिविधियों के संचालन में अहम भूमिका निभाता रहा है। उसके खिलाफ सुरक्षाबलों पर हमलों, हत्या, लेवी वसूली और विस्फोट जैसी कई गंभीर वारदातों में शामिल होने के आरोप दर्ज हैं।
अधिकारियों का कहना है कि संगठन के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े इस बड़े चेहरे की गिरफ्तारी माओवादी नेटवर्क के लिए बड़ा झटका साबित हो सकती है। साथ ही, इससे उग्रवाद विरोधी अभियानों को और मजबूती मिलने तथा संगठन की शेष गतिविधियों पर प्रभावी अंकुश लगाने में मदद मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
ऐसे बना माओवाद का बड़ा चेहरा
झारखंड के गिरिडीह जिले के एक साधारण ग्रामीण परिवेश से निकलकर मिसिर बेसरा ने ऐसा रास्ता चुना, जिसने उसे देश के सबसे कुख्यात और वांछित माओवादी नेताओं की सूची में ला खड़ा किया। करीब चार दशकों तक भूमिगत रहकर सक्रिय रहे इस माओवादी कमांडर पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित था। सुरक्षा एजेंसियों के रिकॉर्ड के मुताबिक उसके खिलाफ झारखंड, बिहार, ओडिशा समेत कई राज्यों में 200 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज बताए जाते हैं। संगठन के भीतर वह भास्कर, सुनीर्मल, प्रधान जी और सागर सहित कई छद्म नामों से पहचाना जाता था।
मिसिर बेसरा का जन्म वर्ष 1960 में गिरिडीह जिले के मदनाडीह गांव में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा गांव में पूरी करने के बाद वह उच्च शिक्षा के लिए धनबाद चला गया। वहां उसने राजनीति विज्ञान में स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। इसी दौरान वह वामपंथी विचारधारा और उस समय चल रहे उग्र छात्र आंदोलनों के प्रभाव में आया। झारखंड आंदोलन के दौर में उसकी वैचारिक दिशा बदली और उसने सशस्त्र माओवादी आंदोलन का रास्ता अपना लिया।
व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो युवावस्था में उसका विवाह मोनासी देवी से हुआ और दोनों का एक बेटा सिद्धार्थ हुआ। हालांकि 1980 के दशक में उसने परिवार से दूरी बनाकर माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) का दामन थाम लिया। बाद में एमसीसी और पीपुल्स वॉर ग्रुप के विलय से गठित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) में उसकी जिम्मेदारियां लगातार बढ़ती गईं और वह संगठन के शीर्ष नेतृत्व में शामिल हो गया। वर्षों तक घर नहीं लौटने के कारण उसकी पत्नी ने बाद में दूसरा विवाह कर लिया।
परिवार से उसका संबंध समय के साथ लगभग पूरी तरह समाप्त हो गया। उसके बेटे सिद्धार्थ के अनुसार, बचपन में पिता कुछ अवसरों पर घर आए थे, लेकिन उसके बाद उनसे कभी मुलाकात नहीं हुई और न ही कोई संपर्क बना रहा।
झारखंड राज्य गठन के बाद संगठन में मिसिर बेसरा का प्रभाव और बढ़ा। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, वर्ष 2003 और 2004 में पश्चिम सिंहभूम में हुए बड़े आईईडी हमलों की रणनीति तैयार करने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। इन हमलों में कई सुरक्षाकर्मियों की जान गई थी। इसके बाद उसे माओवादी संगठन के केंद्रीय सैन्य आयोग में अहम जिम्मेदारियां सौंपी गईं और पूर्वी भारत में संगठन के नेटवर्क को मजबूत करने का दायित्व भी मिला।
जांच एजेंसियों का मानना है कि शीर्ष माओवादी नेता गणपति के साथ मिलकर उसने झारखंड और आसपास के क्षेत्रों में संगठन के विस्तार और गतिविधियों को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लंबे समय तक वह सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में गिना जाता रहा।
वर्ष 2009 में बिहार के चर्चित लखीसराय जेलब्रेक मामले में भी उसका नाम सामने आया। इस घटना में हथियारबंद माओवादियों ने पुलिस अभिरक्षा में ले जाए जा रहे कैदियों पर हमला कर एक प्रमुख माओवादी नेता को छुड़ा लिया था। उस घटना ने देशभर में सुरक्षा व्यवस्था और माओवादी नेटवर्क की क्षमता को लेकर व्यापक चर्चा छेड़ दी थी।
करीब 40 वर्षों तक भूमिगत रहकर सक्रिय रहने वाला मिसिर बेसरा भारतीय माओवादी आंदोलन के सबसे प्रभावशाली चेहरों में माना जाता रहा। उसकी कहानी इस बात का उदाहरण है कि किस तरह एक सामान्य छात्र वैचारिक उग्रवाद की राह पर बढ़ते हुए देश के सबसे वांछित माओवादी नेताओं में शामिल हो गया।