आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय (AKU) में कुलपति के नीतिगत और वित्तीय अधिकारों पर कुलाधिपति द्वारा लगायी गयी रोक के अगले ही दिन एक निजी एजेंसी की सेवा अवधि बढ़ाये जाने का मामला सामने आया है। विश्वविद्यालय द्वारा 16 सितंबर 2026 को जारी पत्र में Sixth Sense Security and Management Solutions Pvt. Ltd. की सेवा अवधि 30 अगस्त 2026 से 30 दिनों यानी 28 सितंबर 2026 तक विस्तारित करने की सूचना दी गयी है। इस फैसले को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या इसके लिए कुलाधिपति की पूर्व अनुमति ली गयी थी।
राज्यपाल सचिवालय ने 15 सितंबर 2026 को AKU के कुलपति को स्पष्ट निर्देश दिया था कि अगले आदेश तक वे कुलाधिपति की पूर्व अनुमति के बिना कोई नीतिगत निर्णय नहीं लेंगे। साथ ही सामान्य प्रशासनिक खर्च को छोड़कर किसी वित्तीय निर्णय अथवा वित्तीय स्वीकृति के लिए भी कुलाधिपति की पूर्व अनुमति आवश्यक कर दी गयी थी। आदेश में इन निर्देशों का तत्काल और कड़ाई से अनुपालन करने को कहा गया था। 2076.pdf इस कार्रवाई और कुलपति के अधिकारों पर लगायी गयी पाबंदियों की स्वतंत्र मीडिया रिपोर्टों में भी पुष्टि हुई है।
इसके बावजूद 16 सितंबर को जारी हुआ एक्सटेंशन पत्र
सामने आये विश्वविद्यालय के पत्र संख्या 014/HR/046/AKU/2024-5710, दिनांक 16.09.2026 में Sixth Sense Security and Management Solutions Pvt. Ltd. के Manager (Operations) को सूचित किया गया है कि विश्वविद्यालय द्वारा पूर्व निर्धारित शर्तों के अनुरूप एजेंसी की अवधि 30 अगस्त 2026 से 30 दिनों के लिए, अर्थात 28 सितंबर 2026 तक, बढ़ायी जाती है। पत्र कुलसचिव के स्तर से जारी हुआ है और उसमें यह भी अंकित है कि कार्रवाई “माननीय कुलपति महोदय के आदेशानुसार” की गयी।
इसी दिन विश्वविद्यालय की ओर से एक अन्य अधिसूचना, पत्रांक 5710, को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने संबंधी पत्र संख्या 5743 भी जारी किया गया। इस घटनाक्रम ने प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर और सवाल खड़े कर दिये हैं।
सबसे बड़ा सवाल—क्या राजभवन से ली गयी थी अनुमति?
मामले में महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि निजी एजेंसी की संविदात्मक सेवा अवधि बढ़ाना यदि नीतिगत अथवा वित्तीय दायित्व उत्पन्न करने वाला निर्णय है, तो 15 सितंबर के कुलाधिपति के आदेश के बाद इसके लिए पूर्व अनुमति आवश्यक थी या नहीं और, यदि आवश्यक थी, तो क्या ऐसी अनुमति प्राप्त की गयी थी?
राज्यपाल सचिवालय के आदेश में केवल routine administrative expenditure को वित्तीय प्रतिबंध से बाहर रखा गया है। 2076.pdf ऐसे में एजेंसी को 30 दिनों का सेवा विस्तार किस प्रशासनिक और वित्तीय आधार पर दिया गया, यह विश्वविद्यालय के स्पष्टीकरण का विषय है।
फिलहाल उपलब्ध दोनों पत्रों में कुलाधिपति की पूर्व अनुमति का कोई उल्लेख दिखाई नहीं देता। इसलिए इसे सीधे तौर पर “राजभवन के आदेश का उल्लंघन” घोषित करने के बजाय यह सवाल महत्वपूर्ण है कि विश्वविद्यालय प्रशासन यह स्पष्ट करे कि फैसला किस सक्षम प्राधिकार और किस अनुमति के आधार पर लिया गया।
गौरतलब है कि कुलपति के अधिकारों पर प्रतिबंध का मामला पहले ही सार्वजनिक हो चुका है। कुलाधिपति के आदेश के मुताबिक बिना पूर्व अनुमति नीतिगत और बड़े वित्तीय फैसले नहीं लिये जा सकते।
अब नजर इस बात पर है कि राजभवन इस सेवा-विस्तार के मामले को किस रूप में देखता है और विश्वविद्यालय प्रशासन कुलाधिपति की पूर्व अनुमति से संबंधित कोई दस्तावेज प्रस्तुत करता है या नहीं।