उत्तर बिहार का सबसे बड़ा महावीरी अखाड़ा मेला, मोनिया बाबा की परंपरा में आस्था और एकता का संगम

महाराजगंज (उत्तर बिहार)। उत्तर बिहार का सबसे बड़ा महावीरी अखाड़ा मेला-मोनिया बाबा का मेला-सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि आस्था, एकता और परंपरा का अनोखा संगम है।

महाराजगंज (उत्तर बिहार)। उत्तर बिहार का सबसे बड़ा महावीरी अखाड़ा मेला-मोनिया बाबा का मेला-सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि आस्था, एकता और परंपरा का अनोखा संगम है। यह मेला हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक रहा है, जिसकी शुरुआत सन 1923 में महाराजगंज स्थित नागा बाबा मठ के महंत स्वामी महादेवदास एवं उनके गुरु-शिष्य भाई कृपाल आनंद जी महाराज ने की थी। उस दौर में जब देश गुलाम था और स्वतंत्रता संग्राम अपनी गति पकड़ रहा था, यह मेला समाज को जोड़ने और युवाओं को संगठित करने का माध्यम बना।  

आजादी के आंदोलन का केंद्र बना था मेला

ब्रिटिश हुकूमत के दमनकारी दौर में इस मेले का आयोजन स्वतंत्रता सेनानियों के लिए मिलन स्थल साबित हुआ। भीड़ के बीच योजनाएं बनतीं और गांव-गांव के युवकों को शस्त्र प्रशिक्षण दिया जाता। संतों ने महान संत मोनिया बाबा के नाम पर इस मेले की नींव रखी थी ताकि जाति-धर्म से ऊपर उठकर समाज एक सूत्र में बंध सके। जुलूस और अखाड़ों की परंपरा। भादो मास की कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को भव्य जुलूस से मेले का आगाज़ होता है और अमावस्या के दिन महावीरी झंडे का मेला लगता है। 

परंपरा के अनुसार, सबसे पहला बड़ा अखाड़ा नागा मठ से निकलता है, इसके बाद शहर और गांवों के अन्य अखाड़े शामिल होते हैं। महाराजगंज और आसपास के गांवों के करीब 25 अखाड़े इसमें हिस्सा लेते हैं।जुलूस में हजारों लोग अस्त्र-शस्त्र लेकर करतब दिखाते हैं। भीड़ का आलम ऐसा होता है मानो इंसानों का सैलाब उमड़ पड़ा हो। हाथी, घोड़े और ऊंटों से सजे अखाड़े शहर घूमते हुए मोनिया बाबा के समाधि स्थल तक पहुंचते हैं और वहां मेला सज जाता है। 

आस्था और आर्जन का संगम 

कहा जाता है कि मोनिया बाबा के दरबार में आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी होती है। अमावस्या से शुरू हुआ यह मेला पूरे एक महीने तक चलता है। यह न सिर्फ आस्था और परंपरा का उत्सव है बल्कि स्थानीय व्यापारियों के लिए बड़ी कमाई का अवसर भी है। मेले में उमड़ने वाली भीड़ जमकर खरीदारी करती है, जिससे कारोबारियों की आर्थिक गतिविधियां चरम पर पहुंच जाती हैं। 

संजीवनी बनी परंपरा

आजादी के बाद भी यह परंपरा लगातार जारी रही है। हर साल महाराजगंज का यह मेला गुलजार रहता है। प्रशासनिक सतर्कता और लोगों की आस्था इस आयोजन को और खास बना देती है। यह मेला आज भी उत्तर बिहार में सामूहिक एकता और सांस्कृतिक धरोहर का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।

अनूप नारायण सिंह