इप्टा द्वारा राज्य स्तरीय नाट्योत्सव 2 से 4 अक्टूबर को आयोजित

बिहार इप्टा के 80वें स्थापना वर्ष के अवसर पर इप्टा की जनपक्षधर सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए राज्य स्तरीय नाट्योत्सव 'सच का रंगमंच: रंगों और विचारों का उत्सव' का आयोजन दो, तीन और चार अक्टूबर को सहरसा की धरती पर में किया जा रहा है।

सहरसा : सहरसा इप्टा द्वारा राज्य स्तरीय नाट्योत्सव को लेकर तैयारी तेज कर दी गई है। बिहार इप्टा के 80वें स्थापना वर्ष के अवसर पर इप्टा की जनपक्षधर सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाते हुए राज्य स्तरीय नाट्योत्सव 'सच का रंगमंच: रंगों और विचारों का उत्सव' का आयोजन दो, तीन और चार अक्टूबर को सहरसा की धरती पर में किया जा रहा है। यह नाट्योत्सव बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा, लोक-स्मृतियों, जनजीवन और समकालीन सामाजिक सरोकारों को रंगमंच के एक साझा मंच पर लाने का प्रयास है। 

संयोजक राजन कुमार ने कहा- इस अवसर पर भागलपुर इप्टा, मधुबनी इप्टा, सहरसा इप्टा, छपरा इप्टा, कटिहार इप्टा व पटना इप्टा की नाट्य प्रस्तुतियां इस उत्सव का प्रमुख आकर्षण होंगी

संयोजक राजन कुमार ने बताया कि इस अवसर पर भागलपुर इप्टा, मधुबनी इप्टा, सहरसा इप्टा, छपरा इप्टा, कटिहार इप्टा और पटना इप्टा की नाट्य प्रस्तुतियां इस उत्सव का प्रमुख आकर्षण होंगी। नाट्य मंचन के पूर्व 'रंग चबूतरा' पर गीत, नृत्य और लघु नाटकों की प्रस्तुतियां लोकजीवन के रंगों और जनसंस्कृति की जीवंत अभिव्यक्ति को सामने रखेंगी। रंग-विमर्श और 'रंगमंच की बातें, इप्टा के संग' जैसे युवा संवाद कार्यक्रमों के माध्यम से रंगमंच की सामाजिक भूमिका, बदलते समय की चुनौतियों और नई पीढ़ी की आकांक्षाओं पर सार्थक संवाद होगा। 

2 अक्टूबर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के दिन इस नाट्योत्सव का आरंभ होना अपने आप में गहरा सांकेतिक महत्व रखता है

उन्होने बताया कि दो अक्टूबर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के दिन इस नाट्योत्सव का आरंभ होना अपने आप में गहरा सांकेतिक महत्व रखता है। गांधी के लिए सत्य केवल एक नैतिक मूल्य नहीं, बल्कि सार्वजनिक और सामाजिक जीवन का आधार था। इप्टा की सांस्कृतिक परंपरा भी मनुष्य की गरिमा, सत्य, शांति, समानता और न्याय के पक्ष में खड़े होने की रही है। 'सच का रंगमंचः रंगों और विचारों का उत्सव' इसी सांस्कृतिक संकल्प को आज के समय के सवालों से जोड़ते हुए अभिव्यक्ति देता है। इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रसन्ना ने सच के रंगमंच के माध्यम से देश को जोड़ने का आह्वान किया है। 

बिहार का यह नाट्योत्सव उसी आह्वान को अपनी स्थानीय जमीन, अपनी भाषाओं, अपनी लोक परंपराओं और अपने सामाजिक अनुभवों के साथ आगे बढ़ाने का प्रयास है

बिहार का यह नाट्योत्सव उसी आह्वान को अपनी स्थानीय जमीन, अपनी भाषाओं, अपनी लोक परंपराओं और अपने सामाजिक अनुभवों के साथ आगे बढ़ाने का प्रयास है। हमारा विश्वास है कि रंगमंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज से संवाद करने, सवाल उठाने, संवेदना जगाने और बेहतर समाज की कल्पना को स्वर देने की सशक्त सांस्कृतिक भूमि है। इस नाट्य महोत्सव की तैयारी में डॉ. दीपक कुमार गुप्ता, संजय सारथी, अनिल कुमार, विनय कसौधन, एसएस हिमांशु, विनय कसौधन व रमेश पासवान सहित अन्य जुटे हुए हैं।

सहरसा से विकास कुमार की रिपोर्ट