बिहार की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे हैं जिनकी पहचान किसी बड़े राजनीतिक परिवार, पार्टी के संगठन या सत्ता के संरक्षण से नहीं, बल्कि लंबे संघर्ष और अपने प्रभाव क्षेत्र में लगातार मौजूदगी से बनी है। पूर्णिया जिले की रुपौली की राजनीति में शंकर सिंह ऐसा ही एक नाम हैं। कभी लोजपा के टिकट पर विधानसभा पहुंचने वाले शंकर सिंह ने करीब दो दशक बाद निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में फिर रुपौली की सियासत में अपनी ताकत साबित की।
शंकर सिंह पहली बार फरवरी-मार्च 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर रुपौली से विधायक निर्वाचित हुए थे। लेकिन उस समय बिहार में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और कुछ ही महीनों बाद नवंबर 2005 में दोबारा चुनाव हुए, जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद भी उन्होंने रुपौली की राजनीति नहीं छोड़ी। 2010, 2015 और 2020 के विधानसभा चुनावों में वे लगातार मजबूत दावेदार के रूप में मैदान में रहे और दूसरे स्थान पर रहे।
शंकर सिंह की राजनीति का सबसे दिलचस्प अध्याय 2024 का रुपौली विधानसभा उपचुनाव रहा। लोजपा (रामविलास) से अलग होकर उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा। सामने सत्तारूढ़ जदयू के कलाधर मंडल और राजद की बीमा भारती जैसे स्थापित राजनीतिक चेहरे थे। इसके बावजूद शंकर सिंह ने दोनों दलों के उम्मीदवारों को पीछे छोड़ते हुए जीत हासिल की। उन्हें 67,782 वोट मिले, जबकि जदयू के कलाधर मंडल को 59,578 वोट मिले। जीत का अंतर 8,204 वोट रहा। बीमा भारती तीसरे स्थान पर रहीं। यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि यह केवल एक निर्दलीय उम्मीदवार की जीत नहीं मानी गई, बल्कि रुपौली में लंबे समय से बनी दलीय राजनीतिक धुरी को चुनौती के रूप में भी देखी गई। करीब 19 साल बाद शंकर सिंह फिर विधानसभा पहुंचे।
शंकर सिंह की सार्वजनिक छवि को समझने के लिए रुपौली और पूर्णिया के उस दौर को भी देखना पड़ता है, जब राजनीति में स्थानीय प्रभाव, व्यक्तिगत नेटवर्क और क्षेत्रीय वर्चस्व की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हुआ करती थी। मीडिया रिपोर्टों में उनके शुरुआती दौर का संबंध 'लिबरेशन आर्मी' नाम से चर्चित एक संगठन/गुट से जोड़ा गया है और इसी दौर में उनका क्षेत्र के दूसरे प्रभावशाली समूहों से टकराव भी बताया गया है। इन पुराने दावों को उनके राजनीतिक जीवन के संदर्भ के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि किसी आपराधिक आरोप की अंतिम पुष्टि के रूप में। इसी पृष्ठभूमि ने शंकर सिंह को एक ऐसी राजनीतिक पहचान दी, जिसमें पारंपरिक पार्टी संगठन से ज्यादा व्यक्तिगत प्रभाव और जमीनी संपर्क को महत्व मिला। यही कारण है कि चुनावी राजनीति में लगातार उतार-चढ़ाव के बावजूद वे रुपौली में अपना आधार बनाए रखने में सफल रहे।
राजपूत राजनीति का एक मजबूत स्थानीय चेहरा। पूर्णिया और सीमांचल की राजनीति को केवल जातीय समीकरणों से समझना संभव नहीं है, लेकिन शंकर सिंह की पहचान राजपूत समाज के बीच प्रभाव रखने वाले प्रमुख स्थानीय राजनीतिक चेहरों में जरूर की जाती है। 2024 के चुनाव में उनकी जीत ने यह संकेत भी दिया कि सामाजिक पहचान के साथ-साथ व्यक्तिगत राजनीतिक नेटवर्क और उम्मीदवार की अपनी स्वीकार्यता कई बार बड़े दलों के चुनावी गणित को चुनौती दे सकती है। उनकी राजनीति की खासियत यही है कि वे किसी एक चुनावी जीत के बाद पैदा हुआ चेहरा नहीं हैं।
2005 की पहली जीत से लेकर 2010, 2015 और 2020 की चुनावी पराजयों और फिर 2024 की निर्दलीय जीत तक उनका राजनीतिक सफर लगातार संघर्ष का सफर रहा है।पूर्णिया की राजनीति में क्यों महत्वपूर्ण हैं शंकर सिंह?पूर्णिया की राजनीति में शंकर सिंह का महत्व केवल रुपौली की एक विधानसभा सीट तक सीमित नहीं है। उनकी कहानी यह बताती है कि सीमांचल की राजनीति में स्थानीय स्तर पर मजबूत व्यक्तिगत नेटवर्क रखने वाला नेता किस तरह बड़े राजनीतिक दलों के सामने भी अपनी जगह बना सकता है।
2024 में उनका निर्दलीय जीतना खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण था कि उन्होंने किसी बड़े दल के चुनाव चिह्न के सहारे नहीं, बल्कि अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक पहचान के आधार पर चुनाव लड़ा। उन्होंने लोजपा से अपने पुराने रिश्ते की राजनीतिक पूंजी और वर्षों के जमीनी संपर्क को एक स्वतंत्र राजनीतिक ताकत में बदल दिया। यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है।
शंकर सिंह की कहानी इसलिए भी दिलचस्प है कि इसमें सत्ता से ज्यादा संघर्ष, पार्टी से ज्यादा व्यक्तिगत संगठन और चुनावी हार से ज्यादा राजनीतिक धैर्य दिखाई देता है। रुपौली की जनता ने उन्हें एक बार 2005 में विधानसभा भेजा, करीब दो दशक तक वे चुनावी राजनीति में संघर्ष करते रहे और 2024 में उसी जमीन पर निर्दलीय उम्मीदवार बनकर फिर विधानसभा पहुंच गए।
बिहार की बदलती राजनीति में जहां चुनाव लगातार अधिक संसाधन, संगठन और गठबंधन आधारित होते जा रहे हैं, वहां शंकर सिंह जैसे नेताओं की मौजूदगी यह सवाल खड़ा करती है कि क्या मजबूत स्थानीय जनाधार और व्यक्तिगत राजनीतिक पहचान आज भी किसी बड़े दल के संगठन को चुनौती दे सकती है? रुपौली का जवाब कम से कम एक बार हां में सामने आ चुका है।
अनूप नारायण सिंह