भरत तिवारी एनकाउंटर: हत्या की FIR के बावजूद तत्कालीन SDPO राजेश कुमार शर्मा की नई पोस्टिंग, कानून क्या कहता है?

पटना/आरा। भोजपुर के चर्चित भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले में जगदीशपुर के तत्कालीन एसडीपीओ राजेश कुमार शर्मा की मद्यनिषेध विभाग में पोस्टिंग को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है।

By : स्वराज पोस्ट | Edited By: Amit Kumar
Updated at : Jul 01, 2026, 3:41:00 PM

पटना/आरा। भोजपुर के चर्चित भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले में जगदीशपुर के तत्कालीन एसडीपीओ राजेश कुमार शर्मा की मद्यनिषेध विभाग में पोस्टिंग को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। उनके खिलाफ हत्या समेत गंभीर आरोपों में प्राथमिकी दर्ज होने के बावजूद नई तैनाती दिए जाने पर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं।

हालांकि, कानूनी दृष्टि से केवल एफआईआर दर्ज हो जाने भर से किसी सरकारी अधिकारी की नौकरी समाप्त नहीं होती और न ही उसकी पोस्टिंग पर स्वतः रोक लगती है। यदि अधिकारी निलंबित नहीं है, तो राज्य सरकार सेवा नियमों के तहत उसे किसी भी विभाग में पदस्थापित कर सकती है। कई मामलों में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए संबंधित अधिकारी को घटनास्थल या मूल पद से हटाकर दूसरे विभाग में भेजा जाता है। इसे दंडात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि एक सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था माना जाता है।

लेकिन इस मामले का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब किसी अधिकारी पर हत्या जैसे गंभीर आरोप हों और मामले की जांच अभी जारी हो, तब उसकी नई पोस्टिंग को लेकर स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं। कई विधि विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारी को ऐसी जिम्मेदारी दी जानी चाहिए, जिससे जांच की निष्पक्षता और जनता का भरोसा प्रभावित न हो।

देश की सर्वोच्च अदालत भी समय-समय पर यह स्पष्ट कर चुकी है कि "न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ भी दिखाई देना चाहिए।" यही कारण है कि गंभीर आरोपों वाले अधिकारियों की तैनाती को लेकर पारदर्शिता और संवेदनशीलता की मांग लगातार उठती रही है।

भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में राजेश कुमार शर्मा की नई पोस्टिंग ने इसी बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है। एक पक्ष इसे पूरी तरह कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष मानता है कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक ऐसे अधिकारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से दूर रखा जाना चाहिए ताकि जांच की निष्पक्षता पर कोई सवाल न उठे।

अब बड़ा प्रश्न यह है कि क्या केवल कानूनी प्रावधान पर्याप्त हैं, या फिर गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे अधिकारियों की पोस्टिंग के लिए सरकार को अलग और स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। फिलहाल यह मुद्दा कानून, प्रशासन और जनविश्वास—तीनों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।

अनूप नारायण सिंह